सपने हैं, सपने देखने वाली आँखें हैं और उन स्वप्निल आँखों में है- स्वप्न में जीवन या जीवन में स्वप्न की उधेड़बुन। बस इसी उधेड़बुन से लड़ती और जूझती हुई ...
Wednesday, July 10, 2013
स्त्री का कौन सा रूप हूँ मैं
इस सोच का ग्रास बनती जा रही हूँ
कभी लगता है मैं एक नई लड़की हूँ
नई सोच, नए सपनों, नई उमंगों से भरपूर
पर जबसे तुम्हारे प्रेम में हूँ
नया रूप ही रही हूँ जान
दुनिया सिमटती जा रही है
तुमसे आगे सोचना नहीं चाहती
तुमसे आगे बढ़ना नहीं चाहती
तुमसे आगे कुछ नज़र नहीं आता
ये रूप नई लड़की का तो नहीं लगता
शायद जो मैं हूँ, और
जो मैं होना चाहती हूँ
उसमें द्वंद्व है, विरोधाभास है
मेरे अन्दर की पुरातनता, परंपरा
महज़ आदर्शवादिता तो नहीं?
या ये मेरे संस्कार है, जो
बचपन से ठोक-बजाकर भरे गए है
कहीं भीतर बहुत गहरे में।
इनकी पैठ को चुनौती देना भर
क्यों मुझे तोड़ने को काफ़ी हो जाता है
ये वाकिफ़ियत खुद से
क्या सही है
कितनी सही है
नहीं जानती
जानना चाहती हूँ
खुद को परत दर परत खोलना चाहती हूँ
इसमें क्या रहस्य निहित है
जो मुझसे भी अज्ञात है
खुद को एक ऐसा
बादल बनते देखना चाहती हूँ
जिस पर इन्द्रधनुष छिटक सके
जो बादल
बरसात के बाद का हो
साफ़-सुथरा
निश्छल।
Tuesday, July 9, 2013
Monday, July 8, 2013
Wednesday, July 3, 2013
साहचर्य
मेरा प्रेम आवश्यकता और विकल्प का प्रेम नहीं है
पर तुम नहीं समझते
पुरुष का स्त्री को ये न समझना ही
स्त्री-पुरुष के साहचर्य का निर्धारण करता है
क्योंकि जिस दिन मुझे समझ जाओगे
साहचर्य की इति हो जाएगी
तो अच्छा है
इसी मँझधार में हम दोनों
फंसे रहे
समझकर भी नासमझ यूँ ही
बने रहे।
खोज..
किताबों के बीच
पन्नों के बीच
पंक्तियों के बीच
शब्दों के बीच
बीत रही है कुछ ज़िंदगियाँ
जिनमें
वह खोजती है
कोई चेहरा
कोई मुस्कान
कोई बात
कोई याद
और
कोई इंसान।
Subscribe to:
Posts (Atom)