Thursday, July 11, 2013




वह शख्स
जो थककर बैठ गया
उसका जीवट
उसे जवाब दे गया
जो शख्स
औरों से अलग था
अन्यतम था
जो शख्स
सफलता से बस
एक फर्लांग पर था
जो शख्स
अपने को कहीं से भी
लौटा ले जा सकता था
कितना अजीब लगता है
जब वही शख्स
थककर लौट जाता है
और उसे अपने को
अपनी शख्सियस से अलग करना पड़ता है।

Wednesday, July 10, 2013

फंदा




जिस फंदे की जकड़न में
दुनिया कसी हुई है
समय कसा हुआ है
जिसमें तुम कसे गए
और जकड़ लिए गए
उसी फंदे में
मैंने जकड दिया है
अपनी पल-पल कराहती
इच्छाओं को
रात-दिन आते भयानक
सपनों को
और उसी फंदे में
जकड़कर कस दिया है मैंने
अपने टूटते-बिखरते
साहस को
अपनी पल-पल दम तोडती
जिजीविषा को।




स्त्री का कौन सा रूप हूँ मैं
इस सोच का ग्रास बनती जा रही हूँ
कभी लगता है मैं एक नई लड़की हूँ
नई सोच, नए सपनों, नई उमंगों से भरपूर
पर जबसे तुम्हारे प्रेम में हूँ
नया रूप ही रही हूँ जान
दुनिया सिमटती जा रही है
तुमसे आगे सोचना नहीं चाहती
तुमसे आगे बढ़ना नहीं चाहती
तुमसे आगे कुछ नज़र नहीं आता
ये रूप नई लड़की का तो नहीं लगता
शायद जो मैं हूँ, और
जो मैं होना चाहती हूँ
उसमें द्वंद्व है, विरोधाभास है
मेरे अन्दर की पुरातनता, परंपरा
महज़ आदर्शवादिता तो नहीं?
या ये मेरे संस्कार है, जो
बचपन से ठोक-बजाकर भरे गए है
कहीं भीतर बहुत गहरे में।
इनकी पैठ को चुनौती देना भर
क्यों मुझे तोड़ने को काफ़ी हो जाता है
ये वाकिफ़ियत खुद से
क्या सही है
कितनी सही है
नहीं जानती
जानना चाहती हूँ
खुद को परत दर परत खोलना चाहती हूँ
इसमें क्या रहस्य निहित है
जो मुझसे भी अज्ञात है
खुद को एक ऐसा
बादल बनते देखना चाहती हूँ
जिस पर इन्द्रधनुष छिटक सके
जो बादल
बरसात के बाद का हो
साफ़-सुथरा
निश्छल।

Tuesday, July 9, 2013





इन अनमनाते-से दिनों के धुंधलके में
अनमनाती-सी मैं
और वे भीनी-भीनी
अनमनी-सी यादें
एक-दूसरे का बारी-बारी
अनमना-अनमना कर साथ देती हैं।



विडंबना मेरे जीवन की एक यही है
मैंने प्रेम के सबसे मीठे और सबसे कडवे पल
एक ही प्रियतम से पाए है
और शायद यही
इस धरातल के तमाम प्रेमियों का
यथार्थ है।



औरत और नारी के बीच के
कशमकश को मिटा
मैं
स्त्री बनना चाहती हूँ
औरत अबला बनकर रह जाती है
नारी मूरत बन पूजी जाती है
पर स्त्री होना
एक छटपटाहट है
आगे बढ़ने की
एक अकुलाहट है
अपना रास्ता बनाने की
एक इच्छा है
अपना हक़ पाने की।

Monday, July 8, 2013



देवी बहुत बना लिया है
अब मनुष्य बनाने की बारी है
हम चाहते है खुद को
मनुष्य की तरह देखे जाना
मनुष्य की तरह पढ़े जाना
और मनुष्य की तरह समझे जाना।
इसीलिए हे मनु के वंशजों
हममें ईश्वरत्व की जोत मत जलाओ
बल्कि अपने में थोडा मनुष्यत्व लाओ।