Wednesday, November 26, 2014

इमाम या निज़ाम



दिल्ली स्थित देश की सबसे बड़ी ऐतिहासिक जामा मस्जिद के शाही इमाम सैय्यद अहमद बुखारी ने अपने बेटे के नायब इमाम दस्तारबंदी समारोह में देश के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी को आमंत्रित ना कर पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री नवाज़ शरीफ़ को निमंत्रण भेजा। इमाम सैय्यद बुखारी का यह आचरण उनकी राष्ट्रनिष्ठा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। जहाँ इमाम के काम और सरोकार मज़हबी मामलों तक सीमित होने चाहिए वहीँ इमाम के द्वारा धर्म का ऐसा राजनीतिकरण करना कि स्वयं को इमाम कम निज़ाम होने का दावा अधिक प्रस्तुत करे तो यह उनकी सदाशयता पर सवालिया निशान लगाता है। हालाँकि इमाम ने अपने इस निर्णय को लेकर यह दलील पेश की है कि- "हमने शाबान की दस्तारबंदी के लिए देश और दुनिया में अपने सभी जानने वाले लोगों को न्यौता भेजा है। इसमें नेताओं, धर्मगुरुओं और कई दूसरे क्षेत्रों के लोगों को दावत दी गई है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ साहब को मैंने अपने पारिवारिक रिश्ते की हैसियत से न्यौता दिया है।" किन्तु उनकी यह दलील बेहद बेमानी नज़र आती है चूँकि जामा मस्जिद उनकी कोई पारिवारिक संपत्ति नहीं है जिसे वे व्यक्तिगत उत्सव के रूप में मनाए। इसके इतर इमाम के विरोध में न्यायालय में तीन जनहित याचिकाएं दायर की गई है जिनमें कहा गया है कि जामा मस्जिद को भारतीय पुरातत्व विभाग ने संरक्षित स्मारक घोषित कर रखा है साथ ही जामा मस्जिद दिल्ली वक्फ बोर्ड की संपत्ति है और मौलाना सैयद अहमद बुखारी (शाही इमाम) अपने बेटे को नायब इमाम नहीं नियुक्त कर सकते। इन याचिकाओं के अनुसार, यह जानते हुए कि इमाम वक्फ बोर्ड के कर्मचारी हैं और इमाम की नियुक्ति का अधिकार बोर्ड के पास है, बुखारी ने अपने 19 वर्षीय बेटे को नायब इमाम बना दिया और इसके लिए दस्तारबंदी कार्यक्रम का आयोजन किया जा रहा है, जो कि पूरी तरह गैर इस्लामिक है।

जामा मस्जिद का निर्माण मुगल शासक शाहजहाँ ने कराया था। इस मस्जिद की देख-रेख और मज़हबी कार्यों को संपन्न कराने के लिए शाहजहाँ ने 1656 ई. में उज्बेकिस्तान के बुखारा से सैय्यद अब्दुल ग़फ़ूर शाह बुखारी को बुलाकर उन्हें जामा मस्जिद का पहला इमाम बनाया था। तब से जामा मस्जिद की इमामत इसी परिवार के पास है। आजकल के ज़माने में जब राजे-रजवाड़े नहीं रहे, जामा मस्जिद मुगलिया राजशाही को ढो रहा है। जामा मस्जिद मज़हबी कामों की जगह राजनीति में अनावश्यक दख़लअंदाज़ी भी करता आया है, यह शाही इमाम की अराजकता और एक प्रकार से सत्ता का दुरुपयोग है। शाही इमाम का देश के प्रधानमन्त्री के प्रति अशोभनीय बयान- "पाकिस्तान का प्रधानमंत्री भारत के प्रधानमन्त्री से ज्यादा पसंद है। भारत के मुसलमान नरेंद्र मोदी को अपना नेता नहीं मानते. वह भले ही प्रधानमन्त्री चुने गए हो, किन्तु भारत के मुसलमानों ने उन्हें स्वीकार नहीं किया।" वास्तव में बुखारी को पूरे भारतीय मुस्लिम समुदाय का रहनुमा होने का दम्भ प्रकट करता है। इस बयान से भारतीय मुस्लिमों के सन्दर्भ में आम जनमानस की धारणा पर बहुत बुरा असर पड़ता है। यह ज्यादा चिंताजनक बात है। बुखारी के लिए यह एक खबर हो सकती है, लेकिन यह सच है कि भारतीय मुस्लिम खुद को भारत के प्रधानमंत्री से जोड़ते है, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से नहीं।

यहाँ यह भी ग़ौरतलब है कि ऐसे समय में जब पाकिस्तान बिना किसी उकसावे के संघर्ष-विराम का उल्लंघन कर रहा हो, सीमा पर गोलीबारी कर निरपराध नागरिकों की हत्या कर रहा हो और आतंकवाद को पोषित कर भारत को निरंतर खंडित करने की साज़िश में लगा हुआ हो और तब इमाम बुखारी की पक्षधरता भारत के प्रधानमन्त्री की अपेक्षा पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री के प्रति नज़र आए तो उन्हें अपने राष्ट्रप्रेम और दायित्व के प्रति पुनःविचार करना होगा। इससे अलग भारतीय प्रबुद्ध मुस्लिम वर्ग के द्वारा इमाम बुखारी के विरुद्ध दी गई प्रतिक्रियाएँ राष्ट्रीय पटल पर एक शुभ संकेत हैं जो भारत की एक मज़बूत छवि को प्रकट करते है जो इमाम बुखारी के बयान को किसी भी रूप में धर्मगत प्रतिनिधित्व के रूप में खारिज़ करते हैं।

बहरहाल 20 नवम्बर की सुनवाई में दिल्ली हाई कोर्ट ने बुखारी को करार झटका देते हुए कहा कि उनके द्वारा आयोजित दस्तारबंदी समारोह की कानूनी मान्यता नहीं होगी। इसे आयोजित करने के लिए हाईकोर्ट से, केंद्र सरकार से, एएसआई से और दिल्ली पुलिस से स्वीकृति नहीं ली गई है। दिल्ली वक्फ़ बोर्ड ने अदालत में कहा कि इस मामले में जल्द ही उच्च अधिकारियों की बैठक की जायेगी और यह तय किया जाएगा कि बुखारी ने जो किया है उसके लिए उनके विरूद्ध क्या कार्रवाई की जानी चाहिए। यहाँ एक प्रश्न यह भी उठता है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जामा मस्जिद के इमाम की नियुक्ति राजशाही अंदाज़ में क्यों की जाए। भारतीय मुसलमानों को यह निर्णय लेने का स्वतंत्र अधिकार होना ही चाहिए कि कौन अच्छा इमाम हो सकता है और किसे इस पद पर होना चाहिए।




Tuesday, November 11, 2014

'स्वच्छ भारत अभियान' के मायने







पिछले दिनों अख़बार मीडिया की सुर्ख़ियों का अहम हिस्सा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चलाये जा रहे 'स्वच्छ भारत अभियान' ने घेरे रखा। अपने आप में देखा जाए तो यह कोई पहला प्रयास नहीं है जब एक स्वच्छ भारत की कल्पना को साकार करने का प्रयास किया गया हो, इससे पूर्व भी 'निर्मल भारत अभियान' जैसी कई योजनाएँ और अभियान चलाये गए किन्तु उनमें पर्याप्त सफलता नहीं मिली। ऐसे में यह अभियान भी अपनी सफलता को लेकर सवालों के घेरे में है।

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने गाँधी जयंती के अवसर पर 'स्‍वच्‍छ भारत अभियान' की शुरुआत की। इंडिया गेट से इस अभियान को औपचारिक तौर पर शुरू करने से पहले प्रधानमंत्री ने दिल्ली की वाल्‍मीकि बस्‍ती में जाकर स्वयं झाड़ू लगाई और जैव-शौचालय का उद्घाटन किया। इस अभियान के तहत 2019 में गांधी-जयंती की 150वीं वर्षगाँठ तक देश को स्‍वच्‍छ बनाने का लक्ष्‍य तय किया है। ऐसे में न केवल प्रधानमन्त्री जी ने झाड़ू लगाईं बल्कि कैबिनेट के लगभग सभी मंत्री, अन्य राजनेता सड़कों पर झाड़ू लगाते, साफ़-सफाई के लिए जनता को प्रेरित करते नज़र आए। लाखों कर्मचारियों ने भी इस महत्वपूर्ण कार्य में हाथ बंटाया। एक स्वच्छ भारत की कल्पना देश के प्रत्येक नागरिक की इच्छा है। आम जनता ने भी इस अभियान में जमकर अपनी सहभागिता दर्ज़ कराई। 

प्रधानमंत्री ने इस अभियान को शुरू करते हुए सर्वप्रथम 30,000 व्यक्तियों के साथ शपथ ली कि - न गंदगी करेंगे, न करने देंगे।" उसके बाद उन्होंने भाषण में कहा कि गांवों में कचरे से जैविक खाद तथा बिजली उत्पादन के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से आह्वान किया है कि वे सप्ताह में कम से कम दो घंटे सफाई के लिए दें। स्वच्छता को पर्यटन और भारत के वैश्विक हित से जोड़ते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत के प्रति वैश्विक अवधारणा में व्यापक बदलाव लाने के उद्देश्य से देश के पचास शीर्ष पर्यटन-स्थलों में स्वास्थ्य और स्वच्छता का स्तर विश्वस्तरीय होना ज़रूरी है। 

इस अभियान के तहत बहुत बड़े-बड़े लक्ष्य भी रखे गए हैं। अगले एक वर्ष के भीतर विद्यालयों में एक करोड़ शौचालयों का निर्माण करना इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण क़दम होगा। इसके साथ ही शहरों में ठोस कचरा प्रबंधन का इंतजाम, मैला ढोने की समस्‍या से निजात दिलाना, गाँवों में शौचालयों का निर्माण, खुले में शौच की समस्‍या को खत्‍म करना भी अगले पांच सालों के एजैंडे में है। सरकार के अनुसार स्वच्छ भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए हर गांव को सालाना 20 लाख रुपये दिए जाएंगे। मंत्रालय के अधिकारियों ने यह भी कहा कि सरकार ने अगले पांच साल में देश में 11.11 करोड़ शौचालय बनाने के लिए 1,34,000 करोड़ रुपये खर्च करने की घोषणा की है। यह फौरी तौर पर किए गए वादे हैं जो इस अभियान के साथ किए गए हैं। यहाँ पर प्रश्न यही है कि ये केवल कोरे आश्वासन या सब्ज-बाग़ साबित होंगे या इन्हें अमलीजामा पहनाया जाएगा। यह काबिले-गौर रहेगा कि केंद्र सरकार भारत की लगभग 50 फीसद आबादी की उस पीड़ा को कितना समझती है जिनके पास शौचालय तक की सुविधा नहीं है जिन्हे विवश होकर खुले में आश्रय लेना पड़ता है यह खुले में जाना महिलाओं के साथ अनेक अपराधों का कारण बनता है। देखना यह भी होगा कि क्या यह सत्तापक्ष का किया गया एक स्टंट भर था जिसमें झाड़ू, नेता, मीडिया, कैमरा, एक्शन सबकुछ था। चकाचक सफ़ेद कुरता पहनकर मीडिया को साथ लेकर साफ़-सुथरी सड़कों पर झाड़ू लगाना एक बात है और वास्तविक गन्दगी में उतरकर उसे साफ़ करना नितांत भिन्न। यह सब कुछ भविष्य के गर्भ में है कि सरकार इस अभियान को लेकर कितनी सजग और गंभीर है, समय ही इसका निर्णय भी करेगा। 



इस अभियान की महत्वपूर्ण बात यह है कि यह अभियान गाँधीजी से प्रेरणा लेते हुए दो अक्टूबर से ही प्रारम्भ किया गया चूँकि गाँधीजी ने एक स्वच्छ भारत का सपना देखा था वे इसके लिए प्रयासरत भी रहे। उन्होंने बचपन में ही भारतीयों में स्वच्छता के प्रति उदासीनता की कमी को महसूस कर लिया था। उन्होनें किसी भी सभ्य और विकसित मानव समाज के लिए स्वच्छता के उच्च मानदंड की आवश्यकता को समझा। अपने दक्षिण अफ्रीका के दिनों से लेकर भारत तक वह अपने पूरे जीवन काल में निरंतर बिना थके स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करते रहे। गांधी जी के लिए स्वच्छता एक बहुत ही महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दा था। 1895 में जब ब्रिटिश सरकार ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों और एशियाई व्यापारियों से उनके स्थानों को गंदा रखने के आधार पर भेदभाव किया था, तब से लेकर अपनी ह्त्या के एक दिन पहले 29 जनवरी 1948 तक गांधी जी लगातार सफाई रखने पर जोर देते रहे। उन्होनें एक जगह लिखा भी कि -"हमें स्वच्छता और सफाई का मूल्य पता होना चाहिए ....गन्दगी को हमें अपने बीच से हटाना होगा… क्या स्वच्छता स्वयं ईनाम नहीं है?" 


गन्दगी के प्रति लापरवाह देश के रूप में भारत की छवि हमारे लिए एक दाग़ है और यह दाग़ केवल तभी मिटेगा जब सार्वजनिक सफाई को लेकर लोग अपनी भीतरी गंदगी को दूर करेंगे। गांधीजी के इस स्वच्छता भाव के कई मायने थे एक ओर साफ़-सुथरा-स्वस्थ भारत है तो दूसरी ओर साफ़-सफाई के महत्व से मेहनतकश लोगों के श्रम को सम्मान व पहचान दिलाना। इस दृष्टि से देखे तो भारत में स्वच्छता का परिदृश्य अभी भी निराशाजनक ही है। सदियों से सफाई के काम में लगे लोगों, मैला ढोने वाले लोगों को गरिमा प्रदान करने की कोशिश अभी भी फलीभूत नहीं हो पा रही है। हमने गांधी को एक बार फिर से विफल ही किया है। आजादी के बाद से हमने गाँधी के अभियान को योजनाओं में बदल दिया। योजनाओं को लक्ष्यों, ढांचों और संख्याओं तक सीमित कर दिया गया। पर मुद्दों तक नहीं पहुँचा सके। सही मायने में यदि यह अभियान अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर लेता है तो वही गाँधी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 



इस अभियान को केंद्र सरकार यदि ठीक प्रकार से क्रियान्वित करती है तो यह अभियान भारत के लिए शुक्ल पक्ष के समान रहेगा, इसके दूरगामी परिणाम भारत के विकास एवं प्रगति के लिए सकारात्मक रहेंगे। इस स्तर के अभियान की सफलता के लिए यह ज़रूरी है कि घर, दफ्तर, स्कूल, कालेज, अस्पताल, सड़कें, गली-मोहल्ला, बाजार, रेलवे स्टेशन, बस अड्डा, नदी, तालाब, पार्क और अन्य सार्वजनिक स्थलों की साफ-सफाई के लिए व्यापक जागरूकता पैदा की जाए और भागीदारी सुनिश्चित की जाए। भारतीय गन्दगी जो पर्यटकों के लिए विकर्षण का केंद्र बनती है, यदि उसमें सुधार किया जाता है तो सीधे तौर पर पर्यटन बढ़ेगा। साथ ही भारत में गन्दगी से होने वाली बीमारियां की रोकथाम होगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार गन्दगी से उपजी बीमारियों के कारण प्रत्येक भारतीय को साल में औसत 6500 रूपए का नुक्सान उठाना पड़ता है जिसकी सबसे अधिक मार निम्नवर्ग पर पड़ती है। डॉक्टरों का भी यही कहना है कि स्वच्छता के प्रति सचेत होकर मरीज़ों की संख्या 50 फीसद तक कम की जा सकती है। इस गन्दगी-उन्मूलन एवं स्वच्छता को विस्तृत स्तर पर लेकर जाने की ज़रूरत है जिसमें नगरपालिका को अपनी कूड़ा-निस्तारण व्यवस्था को दुरुस्त करना होगा। सरकार को नगरपालिका को वित्तीय सहायता प्रदान करनी होगी, जिससे कूड़े के रीसाइकिल के साधन जुटाए जा सके। बजबजाती नालियों और सीवेज सिस्टम को ठीक किया जा सके, जगह-जगह घूमते मवेशियों की व्यवस्था की जा सके, कूड़ा बीनने वालों के सम्मान एवं कल्याण के कार्य किए जा सके, इन बुनियादी व्यवस्थाओं को दुरुस्त करके ही सडकों पर झाड़ू लगाना सफल व् सार्थक होगा। विश्व बैंक के एक आँकड़ें के अनुसार अगर साफ़-सफाई पर एक डॉलर खर्च किया जाए तो स्वास्थ्य और शिक्षा आदि पर खर्च होने वाले नौ डॉलर बचाए जा सकते हैं। बहरहाल अभी के लिए आवश्यक है कि केंद्र सरकार इसके लिए भरसक प्रयास करे, साधन जुटाए, और जनता बिना किसी पूर्वग्रह से ग्रसित हुए सरकार को समय दें तथा यथासंभव इस कार्य में अपना सहयोग दे। 

















Wednesday, October 1, 2014

सरोकार के सामने



                                    
                                                        अंग्रेजी और हिंदी में समान रूप से लिखने वाले लेखक सदाशिव श्रोत्रिय अपने दूसरे निबंध-संग्रह 'सतत विचार की ज़रूरत' के साथ एक बार फिर से सामने हैं। वे इससे पहले 'मूल्य संक्रमण के दौर में' निबंध-संग्रह से चर्चा में रह चुके हैं। उनका यह हाल ही में प्रकाशित निबंध-संग्रह उनके पहले निबंध-संग्रह की कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। लेखक ने समय की मांग को समझते हुए पाठकों से सीधे संवाद स्थापित करने का प्रयास किया है। संभवतः इसीलिए उन्होंने निबंधों की दुनिया में कदम बढ़ाया हैं। सदाशिव श्रोत्रिय जी का यह निबंध-संग्रह 'सतत विचार की ज़रूरत' आकारगत रूप से लघु होते हुए भी 33 लघु निबंध संजोए हुए है। इसका प्रत्येक निबंध अपने आप में एक विचारवान एवं गहनतम प्रक्रिया से होकर गुज़रा है जो अपने मौज़ूदा समाज पर सटीक ढंग से विचार-मंथन करता है। लेखक का मानना है कि विचार भाषा की सीढी चढ़कर ही मंथरता पाते हैं तथा परिष्कृत होते हैं। 


बदलते समाज, बदलते जीवन-मूल्यों में लोगों की आत्मकेंद्रितता लेखक की सबसे बड़ी चिंता है, उनके हर निबंध में कमोबेश यह चिंता बनी रहती है। व्यक्ति ने अपनी प्रगति, उन्नति एवं लक्ष्य के लिए स्वास्थ्य , शिक्षा , संस्कृति, धर्म सभी को बाज़ार के बीच ला पटका और क्रय-विक्रय की वस्तु बना दिया। इसी मूलभूत चिंता के इर्द-गिर्द उनके निबंध घूमते है। यही कारण है कि लेखक ने बड़े ही वाज़िब ढंग से धर्म, बाज़ार, संस्कृति, पर्यटन, शिक्षण संस्थानों की भूमिका, स्त्री सशक्तिकरण पर सवाल खड़े किए जिसमें लेखक ने अपने स्तर पर भी तथा समाज के स्तर पर भी सतत रूप से विचार की, आत्म-मंथन की ज़रूरत महसूस की है। 


लेखक के चिंतन के दायरे में मानव और प्रकृति का वर्तमान सम्बन्ध भी है। 'संस्कृति पर सवार पर्यटन' तथा 'प्रकृति से विच्छेद' लेखक की इसी चिंता को व्यक्त करते हैं। सांस्कृतिक विकास के केंद्र रहे मंदिरों में कला, संगीत, साहित्य, दर्शन, स्थापत्य आदि न केवल पल्लवित हुए बल्कि संरक्षित रहे किन्तु उन तीर्थस्थानों को पर्यटन के अनुकूल बनाने के प्रयासों ने उनके मूल स्वरुप को नष्ट कर दिया। 'प्रकृति से विच्छेद' में भी लेखक यही संकेत करता है कि मनुष्य का प्रकृति से चिरकाल से चला आ रहा अटूट सम्बन्ध विच्छेद की ओर है जो हमें आनंद , जीवन और पोषण के हमारे मूल स्रोतों से काटकर रख देगा। लेखक स्वयं धर्म के नाम पर तटस्थ हैं वे न अंधविश्वासी के रूप में उपस्थित होते हैं तथा न ही धर्म की, मंदिरों की मुखालफ़त करते हैं। उनकी चिंता का सबब यही है कि भारतीय समाज पर, उसकी मानसिकता पर पूँजीवाद पूरी तरह से हावी हो चुका है। धर्म व आस्था को बाज़ार ने आ घेरा है। लेखक 'चढ़ावे' के स्थान पर 'आय' शब्द का प्रयोग करता है जो आस्था, भक्ति, श्रद्धा जैसे शब्दों का व्यवसायीकरण होकर बाज़ार, व्यापार, मुनाफे में तब्दील होने की ओर ही संकेत करते हैं। जहां मंदिरों को उद्योग की दृष्टि से देखा जाने लगा है। 


'अतीत के द्वार' निबंध में लेखक ने यही प्रकट किया है कि पर्यटन या भ्रमण एक उद्देश्य को लेकर हुआ करते थे किन्तु आज की कुरकुरे और मैकडोनाल्ड संस्कृति ने इसके मूल मंतव्यों को दरकिनार कर मनोरंजन, आनंद, लुत्फ़ और सैर-सपाटे को तरज़ीह दी है। जिसमें वे स्थान पिकनिक स्पॉट से अधिक कुछ नहीं रह गए हैं। लेखक के लगभग सभी निबंधों में कम-ज्यादा उनकी अपनी पैतृक मिटटी नाथद्वारा का ज़िक्र आता है इसका बहुत बड़ा कारण यह भी है कि मनुष्य के आचार-विचार तथा अनुभव को विस्तार देने में आस-पास, परिवार, पृष्ठभूमि की विशेष भूमिका होती है। वह अपनी अनुभूतियों, परिस्थितियों एवं परिवेश से ही सीखता है। लेखक ने अपने इस अभिन्न अंग को कृति में अनुभव तथा विचार के स्तर पर संजोया है, यह प्रशंसनीय कार्य है। नाथद्वारा में धर्म की जो स्थिति है वह लगभग पूरे भारत का ही अक़्स है। उनका निबंध 'कारवालों के रास्तें ' में लेखक ने मध्यम वर्ग की उस भौतिकतावादी मानसिकता को उघाड़कर रखा है जिसमें सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार आचार-विचार-व्यवहार न होकर साधन-सम्पन्नता है। कार-स्वामी होने की होड़ ने कारों की संख्या में सुरसा के मुँह की-सी बढ़ोतरी ने सड़कों को पार्किंग-स्थलों में तब्दील कर दिया है। नाथद्वारा में कारवालों को सुविधा मुहैया कराने के लिए किस प्रकार पर्यावरण तथा वन्य जीवों की अनदेखी की गई तथा तीस फ़ीट चौड़ी सड़कें बना दी गई। ये निबंध सांस्कृतिक केन्द्रों का औद्योगिक केन्द्रों में परिवर्तित होना परिलक्षित करते हैं, साथ ही भीतर तक मथते भी हैं कि इस शताब्दियों लम्बी प्रक्रिया में लगभग पूरे भारत के जंगलों को इसी बर्बरता से काटा गया। 


लेखक की पैनी नज़र से कोई भी विषय अछूता नहीं रहा है। 'शब्दों की जरूरत' में लेखक स्पष्ट करना चाहते हैं कि"वस्तुएँ शब्दों का विकल्प नहीं हो सकती।" लेखक का मानना है कि किसी भी जनतांत्रिक समाज के स्वस्थ, जागरूक और स्वतंत्र बने रहने के लिए उसके सदस्यों का भाषा पर पर्याप्त अधिकार आवश्यक है। 'योग का बाज़ार' निबंध में लेखक का कहना है कि पतंजलि ने जिस योग को आत्मिक व मानसिक संतुष्टि का मार्ग बताया था उसे आज के बाज़ारवादी दौर में प्रतिष्ठित तो कर दिया गया है पर इसकी आड़ में सैकड़ों व्यापारिक ध्येय से लबरेज़ योगपीठ आसन लगाए बैठे हैं। 


लेखक की अपने समय व उसकी समस्याओं पर गहरी पकड़ है। उनका मानना है कि मीडिया का सरोकार निष्पक्षता के साथ लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखना भी है जिसमें मीडिया भटकाव पर है। 'मीडिया की भूमिका' एक प्रश्न है जिसमें लेखक ने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को कटघरे में खड़ा किया है कि किस प्रकार मीडिया अपने नैतिक दायित्व को भूल विज्ञापनों और सनसनीखेज़ खबरों का अम्बरघाट बनता जा रहा है। वह अपनी मूल प्रकृति रचनात्मकता व निष्पक्षता से कोसों दूर जा रहा है। 


किसी भी समाज व राष्ट्र की प्रगति स्त्रियों को साथ लिए बिना संभव नहीं है। लेखक भी स्त्री के प्रति इसी दृष्टिकोण से इत्तेफाक रखते हैं। उन्होंने 'आधुनिक युवा' तथा 'कामकाजी पत्नियां' निबंध में नारी सशक्तीकरण तथा स्त्री विमर्श के विषयों को केवल लेखिकाओं तक ही सीमित करके नहीं देखा बल्कि वे इसे गाँव-देहात में पढ़ रही छात्राओं तक लेकर जाते हैं। वे नगरीय वातावरण पर भी टीप देते हैं कि "यहाँ के कन्या महाविद्यालय में पढ़ने वाली पचास प्रतिशत से भी अधिक छात्राएँ सिर्फ मौज-मस्ती और पारिवारिक श्रम से बचने से बचने के लिए प्रतिदिन वहां आती हैं।" लेखक 'आधुनिक युवा' में अपने अध्यापकीय अनुभव को सामने रखते हैं कि "छात्राओं के महाविद्यालय में यदि किसी दिन अरुणा राय जैसी किसी विदुषी की वार्ता रख दी जाए तो पचहत्तर प्रतिशत छात्राएं शायद उस दिन कॉलेज ही नहीं आएँगी।" वे गहरे स्तर पर यह प्रश्न उठाते हैं कि केवल कॉलेज जाना भर ही शिक्षा नहीं है। उनका मानना है कि स्त्रियों में दायित्व-बोध का विकास होना चाहिए जो सही मायने में पितृसत्ता को चुनौती दे सके। वे केवल कॉलेज स्तर पर पाक कला, कढ़ाई-बुनाई, मेहंदी आयोजनों तक ही खुद को सीमित न रखें अपितु अकादमिक गतिविधियों को भी जीवन में महत्व व स्थान दें। वे अपने आप को एक ऐसे विवेक से संपन्न करें जिसमें अपने मूल्य हो, पितृसत्ता का पोषण ही निहित न हो। 






यह कहना अनुचित न होगा कि लेखक की सम्प्रेषण क्षमता गज़ब की है। आकार की दृष्टि से यह छोटा-सा निबंध-संग्रह है किन्तु सामाजिक स्थितियों व परिदृश्यों को देखने की प्रेरणा एवं एक सटीक दिशा देता है। मानवीय संबंधों को बहुत ही गहराई एवं संवेदनशीलता से पकड़ता है। साहित्यिक दृष्टि से यह विधा निबंध है किन्तु इन्हें पढ़ना ऐसा है जैसे उपन्यास की दुनिया से गुज़रना। यह प्रशंसनीय है कि इस निबंध-संग्रह के माध्यम से सदाशिव श्रोत्रिय ने वर्तमान भारत की लगभग सभी गुप्त एवं प्रकट समस्याओं को सामने रखा है। पाठक इससे इन पर गंभीरता से विचार कर पाएंगे जिससे चिंतन को बल मिलेगा। 






पुस्तक: सतत विचार की ज़रूरत (निबंध-संग्रह)


लेखक: सदाशिव श्रोत्रिय


बोधि प्रकाशन 


मूल्य - 125/- रूपए 



अनुपमा शर्मा 
हिन्दू कॉलेज एम.ए. हिंदी  


(यह पुस्तक-समीक्षा दैनिक-पत्र 'जनसत्ता' में 24 अगस्त 2014 के पुस्तकायन स्तम्भ में प्रकाशित हो चुकी है, जिसका लिंक नीचे दिया हुआ है।)

Friday, May 23, 2014

सींखचों के पार..





जब से खुद को खुद से और खुद से दुनिया को देखने की एक नज़र पाई है, तब से आस-पास सबकुछ अव्यवस्थित-सा नज़र आता है आस-पास की आबोहवा इतनी जहरीली होती जाए कि सांस लेना दूभर हो जाए तो अपनी चेतना को बटोर कर बची-खुची सम्पूर्ण ताकत के साथ अंतिम प्रयास की ओर झोंक देना अंतिम विकल्प रह जाता है। आज़ाद भारत में नेतागीरी, समाजसेवा और आंदोलन करने वाले तो बहुत हैं. पर सरकार के ख़िलाफ़ विरोध जताने के ‘जुर्म’ में इतना वक़्त क़ैद में किसी ने भी नहीं काटा है, जितना इरोम शर्मिला ने। इरोम के प्रति मैं भावनात्मक जुड़ाव महसूस करती हूँ संभव है कि इरोम पर बात करते हुए मैं अपने पूर्वग्रहों से मुक्त न रह सकूँ किन्तु अन्य भी इसे इसी रूप में ले ऐसा मैं दावा नहीं करती। किन्तु मेरे लिए इरोम चानू शर्मिला !! सिर्फ एक नाम नहीं !!! पिछले तेरह वर्षों से नाक में नली लगा हुआ एक शांत चेहरा, जिसे हम देखते आ रहे हैं, उस शांत चेहरे में भी इरोम का उत्कट आत्मविश्वास, अथक और बेमिसाल साहस और एक बेहद मानवीय आत्मा की पीड़ा को देखा-समझा जा सकता है, जिसने एक सामान्य तमाशबीन बनने से इनकार कर अन्याय के विरुद्ध शांतिपूर्ण ढंग से संघर्ष की ऐसी आवाज़ बुलंद की जो न केवल भारत में अपितु देश-विदेश तक में गूँजी। इरोम शर्मिला की भूख-हड़ताल संसार की सबसे लम्बी भूख-हड़ताल है. पर यह भारतीय लोकतंत्र के लिए गर्व की नहीं बेहिसाब शर्म की बात है। जो महात्मा गांधी का देश हो, जिनका आधार ही सत्याग्रह, अनशन, अहिंसा हो, वही देश इरोम के लिए इतना निर्दयी हो जाएगा यह समझ से परे है। यह मानवीय संवेदनाओं को टटोलने का समय है। 




इरोम ने जब भूख-हड़ताल की शुरुआत की थी, वे 28 साल की युवा थीं। कुछ लोगों को लगा था कि यह कदम एक युवा द्वारा भावुकता में उठाया गया है। लेकिन समय के साथ इरोम के इस संघर्ष की सच्चाई लोगों के सामने आती गई। आज वह एकतालीस साल की हो चुकी हैं। तमाम अवरोधों और मुश्किलों के बावजूद उनकी भूख-हड़ताल आज भी जारी है। भले ही इन वर्षों में इरोम का शरीर और अधिक जर्जर व कमजोर हुआ हो पर कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करने वाली उनकी आन्तरिक ताकत और इच्छाशक्ति बढ़ी है। इसीलिए इसे मात्र भावुकता नहीं कहा जा सकता है बल्कि यह पूर्वोत्तर भारत खासतौर से मणिपुर के ठोस यथार्थ की आँच में पका उनका विचार व दृढ इच्छा शक्ति है जिसके मूल में दमन और परतंत्रता के विरुद्ध दमितो, शोषितों,उत्पीडि़तों द्वारा स्वतंत्रता की दावेदारी है। इरोम शर्मिला के संघर्ष में हमें इसी दावेदारी की अभिव्यक्ति मिलती है। इसके अनन्तर में स्वतंत्रता की छटपटाहट और अदम्य साहस से लबरेज मृत्यु के आगे घुटने न टेकने वाली ताकत है। इसीलिए आज इरोम शर्मिला इस्पात की तरह न झुकने, न टूटने वाली मणिपुर की ‘लौह महिला’ के रूप में जानी जाती हैं। 

बात दो नवम्बर 2000 की है। मणिपुर की राजधानी इम्फाल से सटे मलोम में शान्ति रैली के आयोजन के सिलसिले में इरोम शर्मिला एक बैठक कर रही थीं। उसी समय मलोम बस स्टैण्ड पर सैनिक बलों द्वारा ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाई गईं। इसमें करीब दस निरपराध लोग मारे गये। यह सब इरोम शर्मिला को आहत व व्यथित कर देने वाली घटना थी। वैसे यह कोई पहली घटना नहीं थी जिसमें सुरक्षा बलों ने नागरिकों पर गोलियाँ चलाई हो, दमन ढाया हो पर इरोम शर्मिला के लिए यह दमन का चरम था। इस घटना के बाद इरोम को शान्ति रैली निकाल कर सत्‍ता की कार्रवाइयों का विरोध अपर्याप्त या अप्रासंगिक लगने लगा। लिहाजा उन्होंने ऐलान किया कि अब यह सब बर्दाश्त के बाहर है। यह तो निहत्थी जनता के विरुद्ध सत्‍ता का युद्ध है। उन्होंने माँग की कि मणिपुर में लागू कानून सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (अफस्‍पा) हटाया जाए। इस एक माँग को लेकर उन्होंने नैतिक युद्ध छेड़ दिया। तीन नवम्बर की रात में आखिरी बार अन्न ग्रहण किया और चार नवम्बर की सुबह से उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। उन्होंने 4 नवंबर 2000 को अपना अनशन शुरू किया था, इस उम्मीद के साथ कि 1958 से अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, असम, नगालैंड, मिजोरम और त्रिपुरा में और 1990 से जम्मू-कश्मीर में लागू आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट (एएफएसपीए) को हटाया जा सके। इस भूख हड़ताल के तीसरे दिन सरकार ने इरोम शर्मिला को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आत्महत्या करने का आरोप लगाते हुए धारा 309 के तहत कार्रवाई की गई और न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। तब से वह लगातार न्यायिक हिरासत में हैं। उन्हें नाक से जबरन तरल पदार्थ दिया जा रहा है। गौरतलब है कि धारा 309 के तहत इरोम शर्मिला को एक साल से ज्यादा समय तक न्यायिक हिरासत में नहीं रखा जा सकता। इसलिए एक साल पूरा होते ही उन्हें रिहा करने का नाटक किया जाता है। फिर उन्हें गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत के नाम पर उसी सीलन भरे वार्ड में भेज दिया जाता है और जीवन बचाने के नाम पर नाक से तरल पदार्थ देने का सिलसिला चलाया जाता है। यह हमारे लोकतंत्र की विडम्बना ही है कि एक तरफ इरोम शर्मिला की जान बचाने के लिए उन्हें गिरफ्तार कर उनके नाक से तरल पदार्थ पहुँचाया जा रहा है, वहीं इरोम शर्मिला की माँग कि मणिपुर से अफस्‍पा को हटाया जाय, इस कानून की वजह से जो पीड़ित हैं, उन्हें न्याय दिया जाए तथा इसके लिए जिम्मेदार सैनिक अधिकारियों को दण्डित किया जाए जैसे मुद्दों पर विचार करने तक को सरकार तैयार नहीं है। इस कानून के प्रावधानों के तहत सेना को ऐसा विशेषाधिकार प्राप्त है जिसके अन्तर्गत वह सन्देह के आधार पर बगैर वारण्ट कहीं भी घुसकर तलाशी ले सकती है, किसी को गिरफ्तार कर सकती है तथा लोगों के समूह पर गोली चला सकती है। हमे इस क़ानून की पराकाष्ठा मणिपुर जैसे पूर्वोतर राज्यों में देखने को मिलती है जहाँ ‘आफस्‍पा’ शासन के 53 वर्षों में बीस हजार से ज्यादा नागरिकों को अपनी जानें गंवानी पड़ी है। इसी की देन एक तरफ अपमान, बलात्कार, गिरफ्तारी व हत्या है तो दूसरी तरफ तीव्र घृणा, आत्मदाह, आत्महत्या, असन्तोष व आक्रोश का विस्फोट है। इरोम का संघर्ष आज तक बदस्तूर जारी है। वह न थकी है न पीछे हटने को राज़ी है, इरोम प्रण पर है कि जब तक यह क़ानून बर्खास्त नहीं किया जाएगा वे पानी की एक बूँद तक नहीं लेंगी। 




वास्तविकता तो यह है कि इरोम शर्मिला का यह संघर्ष हमारे लोकतंत्र के खंडित चेहरे को सामने लाता है। यह राज्य-व्यवस्था से लेकर हमारी न्याय-व्यवस्था तक को कठघरे में खड़ा करता है। जहाँ गांधी को अनशन और आंदोलन की स्वतंत्रता मिली, जहाँ हाल ही में अन्ना हज़ारे को भ्रष्टाचार के विरुद्ध इतने विस्तृत पटल पर अनशन और आंदोलन की स्वतंत्रता मिली, वहां इरोम के साथ ऐसा भेदभाव क्यों। विडंबना है कि सरकार ,प्रशासन , मीडिया और समाज तक इरोम के प्रति उपेक्षित है। लगता है यह देश संवेदना की भाषा भूल चुका है। बहरहाल महत्वपूर्ण है इरोम की इच्छाशक्ति, जिसने घुटने नहीं टेके, इस अन्याय-अत्याचार के विरुद्ध। इरोम कहती भी हैं - "मैं शांति और इंसाफ चाहती हूं। मेरा आंदोलन अहिंसात्मक है तथा आफ्सफा को खत्म करने के लिए है। आफ्सफा जैसे कानून को खत्म कर दिया जाय, मैं अपना आंदोलन समाप्त कर दूंगी।" इरोम अपनी इस भावना को अपनी कविता में भी अभिव्यक्त करती है: ‘कैदखाने के कपाट पूरे खोल दो/मैं और किसी राह पर नहीं जाऊँगी/ काँटों की बेडि़याँ खोल दो/होने दो मुझे अंधियार का उजाला’।




( इस लेख को लिखने का उद्देश्य मैगज़ीन के लिए एक लेख लिखना भर नहीं रहा, यह इच्छा रही की सत्ता की आक्रान्ताओं के बीच नियमों की आड़ में हो रहे अन्याय की शिनाख्त के साथ-साथ पड़ताल भी आने वाली पीढ़ी कर सके, इरोम शर्मिला, मनोरमा, सोनी सौरी जैसे नामों से तथा इनके साथ होने वाले अत्याचारों के प्रति मीडिया की दूरी के विरुद्ध आप तक पहुँचने के एक विकल्प के रूप में इसका प्रयोग किया गया है। )




-- (इस लेख को लिखने में एक्टिविस्ट कौशल किशोर के इरोम शर्मिला पर लिखे तथ्यपरक लेख से सहायता ली गई है। ) 







अनुपमा शर्मा 

एम.ए हिंदी उत्तरार्द्ध 




Thursday, July 11, 2013




वह शख्स
जो थककर बैठ गया
उसका जीवट
उसे जवाब दे गया
जो शख्स
औरों से अलग था
अन्यतम था
जो शख्स
सफलता से बस
एक फर्लांग पर था
जो शख्स
अपने को कहीं से भी
लौटा ले जा सकता था
कितना अजीब लगता है
जब वही शख्स
थककर लौट जाता है
और उसे अपने को
अपनी शख्सियस से अलग करना पड़ता है।

Wednesday, July 10, 2013

फंदा




जिस फंदे की जकड़न में
दुनिया कसी हुई है
समय कसा हुआ है
जिसमें तुम कसे गए
और जकड़ लिए गए
उसी फंदे में
मैंने जकड दिया है
अपनी पल-पल कराहती
इच्छाओं को
रात-दिन आते भयानक
सपनों को
और उसी फंदे में
जकड़कर कस दिया है मैंने
अपने टूटते-बिखरते
साहस को
अपनी पल-पल दम तोडती
जिजीविषा को।




स्त्री का कौन सा रूप हूँ मैं
इस सोच का ग्रास बनती जा रही हूँ
कभी लगता है मैं एक नई लड़की हूँ
नई सोच, नए सपनों, नई उमंगों से भरपूर
पर जबसे तुम्हारे प्रेम में हूँ
नया रूप ही रही हूँ जान
दुनिया सिमटती जा रही है
तुमसे आगे सोचना नहीं चाहती
तुमसे आगे बढ़ना नहीं चाहती
तुमसे आगे कुछ नज़र नहीं आता
ये रूप नई लड़की का तो नहीं लगता
शायद जो मैं हूँ, और
जो मैं होना चाहती हूँ
उसमें द्वंद्व है, विरोधाभास है
मेरे अन्दर की पुरातनता, परंपरा
महज़ आदर्शवादिता तो नहीं?
या ये मेरे संस्कार है, जो
बचपन से ठोक-बजाकर भरे गए है
कहीं भीतर बहुत गहरे में।
इनकी पैठ को चुनौती देना भर
क्यों मुझे तोड़ने को काफ़ी हो जाता है
ये वाकिफ़ियत खुद से
क्या सही है
कितनी सही है
नहीं जानती
जानना चाहती हूँ
खुद को परत दर परत खोलना चाहती हूँ
इसमें क्या रहस्य निहित है
जो मुझसे भी अज्ञात है
खुद को एक ऐसा
बादल बनते देखना चाहती हूँ
जिस पर इन्द्रधनुष छिटक सके
जो बादल
बरसात के बाद का हो
साफ़-सुथरा
निश्छल।