Tuesday, May 5, 2015

सामाजिक सरोकारों के सन्दर्भ में स्वयं प्रकाश की कहानियाँ



साहित्य की रचना एक जटिल प्रक्रिया भले ही हो पर इतनी भी नहीं कि उस पर कुछ कहा ही न जा सके। साहित्य-रचना में समय बुनियादी महत्त्व रखता है। रचनाकार एक सफल और सार्थक रचना तभी दे पाता है जब वह अपने मौज़ूदा समय और उसके सरोकारों को उसमें उकेर सके। स्वयं प्रकाश की कहानियाँ भारतीय जीवन के हर्ष-विषाद, उथल-पुथल और मामूली समझी जाने वाली स्थितियों का सटीक विश्लेषण करती हैं जो जीवन सत्य की उन घटनाओं और परिस्थितियों को उदघाटित करती चलती हैं जिनका केंद्र सामान्य जन और उसका जीवन-संघर्ष है। स्वयं प्रकाश पिछले चालीस वर्षों से लिख रहे हैं। उनकी कहानियाँ यथार्थ को उसकी पूर्णता और कटुता के साथ प्रस्तुत करती हैं। उनकी इसी विशिष्टता के कारण उन्हें प्रेमचंद की परम्परा का महत्वपूर्ण कथाकार कहा गया किन्तु वे स्वयं कहते हैं कि - "कहानी की दुनिया में मैं प्रेमचंद को पढ़कर नहीं, चेखव को पढ़कर आया था।" [1] यदि गहरे स्तर पर देखा जाए तो स्वयं प्रकाश चेखव की कहानियों के समान ही वातावरण की सृष्टि करते हैं जिसमें प्रवेश करते ही पाठक खुद-बखुद सब समझने लगता है।



कौन लेखक कितना बड़ा है इसकी पहचान सबसे पहले इस बात से ही होती है कि उसकी दुनिया कितनी बड़ी है। उसके लेखन के दायरे में मनुष्य और उसकी दुनिया का कितना बड़ा हिस्सा चित्रित हुआ है. उस दृष्टि से स्वयं प्रकाश बड़े लेखक ठहरते हैं. वे अपनी कहानियों में अनेक युगीन समस्याओं का वर्णन करते हैं, जिनका सीधा सम्बन्ध आमजन और उसकी बेहतरी की इच्छा से है. स्वयं प्रकाश कहानी में किस्सागोई के बहाने ही गहरी चिंताएँ प्रकट करते हैं। कहानी 'बिछुड़ने से पहले' में उन्होंने अपनी पर्यावरण के प्रति जागरूकता और चिंता दोनों को प्रकट किया है जिसमें उन्होंने मुनाफे के लिए पृथ्वी को, उसके पर्यावरण को नष्ट करने की प्रवृति को उघाड़ा है. यह कहानी हमें हमारी जड़ों से दूर होते जाने की ओर संकेत करती है और यदि जड़ें ही न हो तो हवाएँ बरगद तक को बहा ले जाये. मानवीकरण के माध्यम से खेत व पगडंडी की बातचीत ग्रामीण स्त्री-पुरुष की तरह दिखाई गई है जिसमें पगडंडी की जगह आठ किलोमीटर की सड़क बन रही है और दोनों इस पर विकास और बदलाव की सार्थकता पर बातचीत कर रहे हैं - "एक दिन खेत ने पगडंडी से कहा - सुना तेरी जगह आठ किलोमीटर की सड़क बन रही है पक्की? चालीस फुट चौड़ी? डिवाइडर वाली? ...आज तक किसी सड़क ने खेत से दोस्ती की है जो मेरे से करेगी? ...दिल को कौन पूछता है मितवा! विकास तो होके रहेगा। पगडंडी ने उसांस छोड़ी। दोनों चुपचाप रोने लगे।" यह संवाद भूमि अधिग्रहण क़ानून के कागज़ी पुर्ज़ों पर सवालिया निशान लगाता है। सन 2013 में भूमि अधिग्रहण विधेयक जिसका नाम बदलकर उचित मुआवजा तथा भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास, पुनर्स्थापन में पारदर्शिता का अधिकार विधेयक रखा गया, उसे 29 अगस्त 2013 को लोकसभा तथा 04 सितम्बर 2013 को राज्यसभा में संशोधनों के साथ पारित कर दिया गया.[2] यह कानून अंग्रेजी शासन के दौरान 1894 में लागू करीब 120 साल पुराने कानून का स्थान लेगा। लेकिन सड़क मार्गों के लिए ली जाने वाली उपजाऊ भूमि का उपाय तो इसमें भी कहीं नहीं है। सरकार अपने हाथ सदा खुले रखती है. इस भूमि पर सरकार द्वारा उसके स्वयं के लाभ, नियंत्रण, सार्वजनिक-निजी भागीदारी परियोजनाएं शामिल हैं लेकिन राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर राजमार्ग परियोजनाएं सम्मिलित नहीं है, साथ ही जनता के भविष्य की चिंता की आड़ में उपजाऊ भूमि का निजी कंपनियों को हस्तांतरण करना भी इस अध्यादेश का हिस्सा है। पगडंडी का लोप इस बात की पूर्व सूचना है कि खेत के अस्तित्व का भी अंत अब निकट भविष्य में ही निर्धारित है। यह विवशता दोनों अनुभव करते हैं, दोनों कमजोर हैं यानी उनसे संबंधित किसान। और जो बचा है, वह है- विकास के बावजूद उनकी वीरान और उजाड़ होती जिंदगी। अभी वर्तमान में चल रहा अन्ना आन्दोलन भी सत्ता और कॉर्पोरेट के इसी गठजोड़ की कलई खोल रहा है जहाँ किसानों के हितो को पूरी तरह से दरकिनार कर बाज़ार को केंद्र में लाया जा रहा है.


स्वयं प्रकाश की कहानियाँ कई बार पढने में जितनी सरलता का बोध कराती है उतनी ही ज्यादा वे भीतर झकझोरती हैं. वे पाठक से अपने समय और समाज की अभिज्ञता की मांग करती हैं। उनकी कहानी- ‘जंगल का दाह’ है जो पढ़ने में भी सुनने का-सा आनंद देती है। यह कहानी लोककथात्मक शैली में लिखी होने के साथ-साथ इसके पात्र आज के आधुनिक परिवेश और परिस्थितियों में ढले हुए हैं। धनुर्धर मामा सोन की प्रसिद्धि सुनकर राजकुमार का शिक्षा के लिए उनके पास आना, अभ्यास में सफल न होने पर मामा सोन को मारने की कोशिश करना जिससे उस विद्या का लाभ कोई और न उठा सके, मामा सोन, शिष्यों और वन के पशु-पक्षियों द्वारा मिल कर सैनिकों को खदेड़ना, और जाते-जाते उनके द्वारा जंगल में आग लगाना केवल कथा के क्रम को ही आगे नहीं बढ़ाते बल्कि मामा सोन के माध्यम से आदिवासी संस्कृति के लुप्त होते जाने की व्यथा को भी प्रकट करते हैं. किसी के हुनर को जब सत्ता चाहने लगती है तो वह मानती है कि जो अपना नहीं हो सकता वो दूसरे का भी नहीं हो सकता। सत्ता के इस रूप को इस कहानी में दिखाया गया है जो विस्थापन संबंधी वर्तमान संदर्भों से सम्पृक्त होकर इसे न केवल प्रासंगिक बनाता है वरन् एक लोककथा की शैली में कही जाने के कारण इसके कथ्य को सर्वकालिक भी बना देता है।[3] इस कथा का मुख्य पात्र ‘मामा सोन’ सम्पूर्ण आदिवासी संस्कृति का प्रतीक है। स्वयं प्रकाश कहानी का यहीं अंत नहीं करते, अपितु उसे आगे ले जाते है और कहानी को आज के सत्ता वर्ग के द्वारा आदिवासियों को उजाड़ने की संकेत-कथा बना देते है। कथा के अंत का संवाद महत्वपूर्ण है- "अफसोस कि न मामा सोन को बचाया जा सका न उनकी धनुर्विद्या को। जो वहाँ बचा वह बस राख ही राख थी। ...आज मामा सोन के वंशज शहर में बांस की टोकरियाँ, तार के छींके और गत्ते के तोते-चिड़ियाँ आदि बनाकर बेच रहे हैं। सुना है उनके इलाके में कोई बड़ा बाँध बन रहा है जिससे देश की बड़ी तरक्की होगीं। ...सुना है... मामा सोन के वंशजों और शिष्यों को जंगल से हकाल दिया गया है।" यह कहानी हमारी विकासशील सभ्यता की बर्बरता को सामने लाती है। यह लेखकीय हस्तक्षेप कहानी को अन्याय के इतिहास क्रम में रखते हुए उसे समकालीन राजनीतिक यथार्थ का एक पाठ बना देता है।


स्वयं प्रकाश अपने समय और समाज की तमाम तरह की विद्रूपताओं से पर्दा हटाते चलते है. 'उल्टा पहाड़' साम्प्रदायिकता को एक नितान्त अलग कोण से देखती है। जिसमें सुमेर सिंह गहलोत का सुरूर साहब बनने का सफ़र जीवन की परतें खोलता चलता है। सुमेर सिंह के सुरूर साहब बनने से जहाँ मालियों को उनपर गर्व है तो शायरी की दुनिया का बड़ा नाम बनने पर मुस्लिम समाज उन्हें मुसलमान समझने लगता है, यहाँ यदि देखा जाए तो उर्दू को जातीय गर्व व इस पूर्वग्रह से देखना भी परिलक्षित होता है कि इस पर धर्म विशेष का ही एकाधिकार है। हालाँकि सुरूर साहब ने भी लोगों की यह ग़लतफ़हमी दूर करने का कभी कोई प्रयास नहीं किया और इस पूरे प्रपंच का अंत इस रूप में होता है कि सुमेर सिंह गहलोत उर्फ़ सुरूर साहब को भुला दिया जाता है। अंत में सांखल साहब और सुरूर साहब की बातचीत का यह संवाद जो सुरूर साहब के द्वारा व्यक्त की गई पीड़ा को प्रकट करता है- "और वैसे भी उनके ज़ेहन पर जड़े खिड़की-दरवाज़ों के चौखट इतनी सख़्ती और पाबन्दी से सील हो चुके हैं कि उन्हें कोई नहीं खोल सकता। सिवाय वक़्त की ठोकरों के। और मैं वक़्त नहीं हूँ साहब। वक़्त के हाथों मारा एक इंसान हूँ।" यहाँ यह भी सोचना ज़रूरी हो जाता है कि जिन सुरूर साहब को भुला दिया गया वह एक पहाड़ के समान वज़ूद वाला व्यक्ति एक दलदल भरी खाई में बदल गया। इसके लिए कौन उत्तरदायी है- यह व्यवस्था, यहाँ का समाज और उसका धर्म या हम स्वयं। यह लेखक की साम्प्रदायिकता पर अकेली कहानी नहीं है बल्कि स्वयं प्रकाश ने साम्प्रदायिकता पर कई कहानियाँ लिखी, लेकिन प्रत्येक एक भिन्न दृष्टिकोण से. ‘पार्टीशन’ भी उनकी एक ऐसी ही कहानी है जो पूरी तरह से दंगो की पृष्ठभूमि पर लिखी कहानी नहीं है किन्तु इस विषय पर लिखी एक बेजोड़ कहानी है जिस पर बाद में टेलीफिल्म भी बनी. बहुत ऊपरी अर्थों में यह कहानी कुर्बान भाई के फिर से मस्जिद जाने की कहानी है. कुर्बान भाई लाखों ऐसे मुसलमानों की तरह भारत में रह गया मुसलमान है जो जान-बूझकर मौका होते हुए भी पाकिस्तान नहीं गए. दंगे हो गए, पार्टीशन हो गया, दुकान जला दी गई. रिश्तेदार पाकिस्तान भाग गए. दो भाई क़त्ल कर दिए गए. कहाँ जाए? कहाँ सर छुपाए? क्या पाकिस्तान चले जाए? कुर्बान भाई को अच्छे लगने वाले बहुत से लोग नहीं गए, तो कुर्बान भाई क्यों जाते? एक स्तर पर यह कहानी भीष्म साहनी की ‘अमृतसर आ गया है’ का विस्तार भी है और मुक्ति भी. यह घटना की नहीं, प्रक्रिया की कहानी है. सुधीश पचौरी के शब्दों में- “कुर्बान भाई ‘अमृतसर आ गया है’ का मानो वह बंदा है जो चलती रेल में दो गठरियाँ लेकर चढ़ने की कोशिश कर रहा है, जिसे बाबू लगने वाले उस कमजोर आदमी ने बाहर फेंक दिया है मगर जो फिर भी बच गया है.!! लेखक ने एक सामान्य अल्पसंख्यक कुर्बान भाई के संकट को यह कहकर व्यक्त किया है- "स्थिति मगर यह थी कि हिन्दुओं में निभने की कोशिश करते तो शक शुबहे की बर्छियों से छेद-छेद दिए जाते, और मुसलमानों में खपने की कोशिश करते तो लीगियों के धार्मिक उन्माद का जवाब देते-देते दो टूक हो जाते."[4] एक सवाल जो ज़ेहन में आता है कि क्या यह सन 47 के विभाजन तक ही सीमित रह गया, वहीँ रुक गया या इसकी कड़ियाँ आज भी सन 92 और 2002 की घटनाओं के रूप में बदस्तूर ज़ारी है. ‘पार्टीशन’ में कुर्बान भाई इतिहास के किसी अध्यापक से कहते हैं, “आप क्या ख़ाक हिस्ट्री पढ़ाते हैं? कह रहे हैं पार्टीशन हुआ था! हुआ था नहीं, हो रहा है, ज़ारी है…”

एक साहित्यकार के सरोकार केवल साहित्य से ही जुड़े नहीं होते और न ही हो सकते हैं। साहित्य अनिवार्यतः सामाजिक वस्तु है। ये जीवन की किसी एक संवेदना को लेकर चलती हैं और उससे जुड़ी अन्य विडंबनाओं को भी अभिव्यक्त करती चलती हैं. 'उज्ज्वल भविष्य' भी एक ऐसी ही कथा है जो बेरोजगारी में व्यक्ति की मानसिक उलझनों को प्रकट करती है। इसमें एक संवाद आता है कि - "काबिल आदमी अच्छा काम कर सकता है, पर होशियार आदमी के मुकाबले में आता है तो बौखला जाता है और हार जाता है। होशियार आदमी चाहे उतना काबिल न हो, काबिल लोगों से अपना काम निकलवाना जानता है।" इस समय के यथार्थ के आईने में आदर्श जब भरभराकर टूटने को विवश हो रहे हैं और जब लड़का अपनी ईमानदारी की कसमें खाता है तो मालिक का यह कहना- "अब तक तुम मुझे हँसा रहे थे, पर अब तो तुम मुझे डरा रहे हो। मैंने इतने साल में जो एंपायर खड़ी की है, उसे एक ईमानदार आदमी पर भरोसा करके मिट्टी में मिल जाने दूँ? ...आज तो इंडस्ट्री को ऐसे यंगस्टर्स चाहिए जो बेईमानी से काम करने में कुशल हो।... अचानक लड़का उठ खड़ा हुआ..., 'सर! मैं सक्सेसफुल बनूँगा। मैं बेईमान बनूँगा! बहुत बड़ा बेईमान..." उसका यह जवाब इस व्यवस्था और उससे पनपी बेरोजगारी की प्रताड़ना पर करारा तमाचा है जहाँ व्यक्ति को मूल्यों और आदर्शों से विमुख होने को विवश किया जा रहा है। 



‘प्रतीक्षा’ भी इनकी एक उल्लेखनीय लम्बी कहानी है जिसमें भी 'भ्रष्ट व्यवस्था-तंत्र' के प्रति विद्रोह का भाव बड़ी सहजता के साथ लेखक ने उभारा है। यह सैमुअल बैकेट के नाटक ‘वेटिंग फॉर गोडो’ नाटक की कथावस्तु का लेखक द्वारा किया गया एक पाठांतर है. जहाँ बैकेट का नाटक आत्मिक या वैयक्तिक प्रतीक्षा का एक अंतहीन उवाच है, तो स्वयं प्रकाश की कहानी पिछली सदी के आखिरी दौर में युवा वर्ग की हताश प्रतीक्षा को लेकर दिया एक बयान है जो साथ ही शिक्षा तंत्र का कितना ह्रास हो चुका है, को प्रकट करती है। जिसमें आर्थिक उदारीकरण के साथ बढ़ती बेरोजगारी से त्रस्त शिक्षित युवा वर्ग भविष्य की प्रतीक्षा करने के लिए तो विवश है ही, जीविका के अभाव के कारण और साथ ही सामाजिक रूढ़िवाद के चलते युवक-युवती का प्रेम भी एक अंतहीन प्रतीक्षा में बदल जाता है। कहानी में कॉलेज शिक्षा और खासकर हिंदी शिक्षण में व्याप्त जड़ता और भ्रष्टता को भी उजागर किया गया है- छात्रों को पहले से ही पता है कि प्रोफेसर पिता के लड़के उदयवीर की प्रथम श्रेणी आने वाली है और उसका पिता उसके माथे पर प्रथम श्रेणी का तिलक लगाकर उसे विश्वविद्यालय में प्रोफेसर की नौकरी पर आसीन कर देगा. बकौल मुक्तिबोध 'बौध्दिक वर्ग है क्रीतदास' इसी बात को कहानीकार ने भी 'प्रतीक्षा' कहानी में चित्रित किया है कि पूँजीपति वर्ग किस तरह बौध्दिक वर्ग की पीठ पर सवार होकर चलता है।


कथाकार स्वयं प्रकाश की कई कहानियाँ बगैर कुछ कहे बहुत कुछ कह देती हैं ऐसी ही कहानी है 'एक यूँ ही मौत', जो व्यक्ति के जीवन के अकेलेपन की बेआवाज़ त्रासदी को तो प्रकट करती ही है साथ ही विद्वता की समाज में निरुपायता को भी चिन्हित करती है। इस कहानी का नायक जो बचपन में अपनी असाधारण प्रतिभा के लिए विख्यात हो गया था समय और समाज ने उसे एक असफल व्यक्ति में तब्दील कर दिया। यह इस समाज पर प्रश्नचिह्न लगाने वाली स्थिति है जिसमें जो व्यक्ति एक सफल और सार्थक जीवन जीकर समाज को बहुत कुछ दे सकता था पर वह एक निरर्थक जीवन जीते हुए एक नाराज़ आदमी की चुपचाप मौत मर गया। उसने कभी ऐसे समाज को बदलने का प्रयास भी नहीं किया जिसकी व्यवस्था ने उसे ऐसे जीने को अभिशप्त कर दिया। स्वयं प्रकाश ऐसी समूची अकर्मण्यता पर कटाक्ष करते हुए कहते भी हैं - "इस बेहूदा दुनिया की बेहूदगी समझने के बावज़ूद उसने इसके ख़िलाफ़ न तो आवाज़ उठाई, न उन लोगों को ढूंढने की कोशिश की जो उसी की तरह 'जानते' थे। क्योंकि तब ये सब मिलकर शायद-शायद इस दुनिया को कुछ कम बेहूदा बनाने की तरक़ीब कर सकते थे।" स्वयं प्रकाश की कहानियाँ विषय वैविध्य से भरपूर है पर जिनमें वे क्षण भर के लिए भी अपनी प्रतिबद्धताओं को नहीं भूलते है. जहाँ एक ओर अकर्मण्यता को निशाना बनाते है तो वहीँ मनुष्य की समाज में भागीदारी को भी कहानी का विषय बनाते है- 'उस तरफ' कहानी में स्वयं प्रकाश ने पुरस्कार तथा तिरस्कार की मूल्यहीनता पर प्रकाश डाला है। जिसमें नख्त सिंह के द्वारा अपनी जान पर खेलकर बारह स्कूली बच्चों को आग के मुँह से बचाना। उस पर चटर्जी को दिए साक्षात्कार में उसका यह कथन कि- "यह सम्मान मुझे दे रहे हो तो इसका मतलब है, तुम आदमी से उस व्यवहार की उम्मीद नहीं रखते, जो मैंने किया।" भी काबिले-गौर है.


स्वयं प्रकाश की दृष्टि से समाज का कोई भी वर्ग जो त्रस्त है, अछूता नहीं रहता. वे हर आयु-वर्ग को, उनकी समस्याओं को अपने विशिष्ट कहन का हिस्सा बनाते है. कहानी 'ढलान पर' वरिष्ठ नागरिकों के साथ किये जाने वाले अवज्ञापूर्ण व्यवहार की शिकायत दर्ज़ करती कहानी है। यह कहानी भीष्म साहनी की ‘चीफ़ की दावत’ और उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ से आज तक के समय की यात्रा को तय करती कहानी है जो समय के साथ नित्य प्रति बदल रहे संबंधों को तो प्रकट करती ही है साथ ही बढ़ती उम्र के साथ इस नई पीढ़ी के बीच स्वयं को 'मिसफिट' पाना जीवन की सबसे बड़ी जद्दोजेहद बन जाती है, को भी रेखांकित करती है. इसमें इनके प्रति असम्मान प्रकट करते हुए 'इट वाज फन ओल्डमैन' जैसे जुमले फब्तियाँ अधिक लगते हैं जो जीवन को और अधिक अकेलेपन एवं खालीपन की ओर ढकेल देते हैं।





कथाकार स्वयं प्रकाश ने आज की स्त्री की समस्या को नितान्त भिन्न दृष्टिकोण से देखा है उनकी कहानी 'मंजू फालतू’ योग्यता प्राप्त नई लड़की की कहानी है। वह समर्थ है किन्तु फिर भी जीवन की जटिलताएँ उसे घेरे हैं। वह नौकरी और मातृत्व के बीच खटती नज़र आती है। मंजू की कहानी पुरुष वर्चस्व की एक स्टीरियो कहानी नहीं है अपितु वह जो भी निर्णय लेती है अपनी इच्छा से लेती है। फिर भी शादी के बाद उसे अपने भीतर के द्वंद्व से गुज़रना पड़ता है- "लेकिन नितिन का घर? तो क्या यह उसका घर नहीं? यह घर उसने नहीं बनाया। रेडीमेड कपड़े या खाने जैसा है। उसे मिल गया है। फिट भी नहीं है। कहीं से ढीला है कहीं फंसता है। अल्टर करने का टाइम भी नहीं है। करेगी कभी टाइम मिला तो।’’ शादी के बाद बच्चे और फिर गृहस्थी की जिम्मेदारियों के प्रति जवाबदेही में अपने ही द्वारा हासिल मुकाम का त्याग भी करती है। बच्चों के कुछ बड़ा होने के बाद फिर से नौकरी करनी चाही तो पाया कि ज्ञान और तकनीक के नए होते उसकी योग्यता क्षेत्र में अब एप्लीकेशन के कॉलम में उसके पास ‘फालतू’ लिखने के अलावा कुछ नहीं बचा है। लेखक ने मंजू को न एक नाराज औरत बनाया है और न दयनीय। बस इस सामाजिक ताने-बाने में उसके उलझाव को प्रस्तुत किया है।


स्वयंप्रकाश की कहानियों में पर्याप्त वैविध्य मौजूद हैं। 'नाचने वाली कहानी' में लचर सरकारी तंत्र और नौकरशाही की जड़ता पर निशाना साधा गया है तो 'बाबूलाल तेली की नाक' में जातिवाद पर प्रहार किया गया है। कहानी 'कहाँ जाओगे बाबा?' में एक टीस जो मानो ऑटोरिक्शा चालक से नहीं, यह समय हमसे प्रश्न कर रहा है जो पूंजीवादी विकास की पीठ पर लादकर शोषण को लाया है और 'गौरी का गुस्सा' कहानी में उपभोक्तावाद के दौर में चारों तरफ दौड़ती मानवीय लालसाओं को केन्द्र में रखा गया है। जो शिव-पार्वती की मिथकीय छवि के माध्यम से उजागर होती हैं। उपभोक्तावाद को इसमें दिखाया गया है “क्रेडिट कार्ड से दूध नहीं निकलता, गैस भी नहीं, उसे निचोड़ो तो एक बूँद पेट्रोल न निकले और चबाओ तो एक गेहूँ जितना स्वाद भी न आये। ...वहाँ सब कुछ था, लेकिन कुछ नहीं था। भोजन था लेकिन भूख नहीं थी, सूचनाएँ अपार थी, बोध गायब था। समुदाय थे, लेकिन सामाजिकता नदारद थी, दर्दनाशक बहुत थे, हमदर्द एक भी नहीं। सम्पर्क था, लेकिन संवाद नहीं था। मनुष्य थे, लेकिन मनुष्यता ढूंढनी पड़ती थी, बस्तियाँ थी, लेकिन बसावट नहीं थी, लोग थे, लेकिन लगावट गायब थी।“ स्पष्ट है कि सबकुछ अव्यवस्थित है किन्तु यह भी साथ ही दर्ज़ है कि मनुष्य को अपनी कोशिशें स्वयं करनी है। दुनिया खराब है तो हमारी वजह से, सुन्दर बनेगी तो भी हमारे ही प्रयासों से. यह कहानी यही व्यंजना देती प्रतीत होती है इसमें रतनलाल अशान्त उपभोक्तावाद के दौर का वह मनुष्य है जिसे भगवान भी शान्ति व तोष प्रदान नहीं कर सकते। 


इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि स्वयं प्रकाश ने अपनी कहानियों में अनेक युगीन समस्याओं जातिवाद, लाल फीताशाही, साम्प्रदायिकता, आदिवासी संस्कृति, बेरोजगारी, विस्थापन, स्त्री-आत्मनिर्भरता से लेकर स्त्री-मुक्ति से जुडी अनेक समस्याओं का चित्रण किया हैं जो अपने समय की जटिल और उलझी हुई सच्चाइयों को समझने का अवसर देती हैं। इन कहानियों में अपने समय के जटिल और मानवता विरोधी स्थितियों के सच को विषय बनाने का काम स्वयं प्रकाश द्वारा बखूबी किया गया है. यहाँ यह भी दृष्टव्य है कि जब भी कोई कहानीकार कहानी में अपने समय के प्रति प्रतिबद्ध हो उसकी जटिलताओं एवं विद्रूपताओं की शिनाख़्त करता है तब वह पाठक से भी उनके समाधान और जवाबदेही की प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मांग करता है. स्वयं प्रकाश की ये कहानियां इसी रूप में पाठक के लिए समस्या और उसके समाधान तक पहुँचने की यात्रा में मध्यस्थ का कार्य करती हैं. 

मूल स्रोत:

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*स्वयं प्रकाश की प्रतिनिधि कहानियाँ/ किताबघर प्रकाशन



* मेरी प्रिय कहानियाँ: स्वयं प्रकाश/ ज्योतिपर्व प्रकाशन 



सन्दर्भ सूची:

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[1] मेरी प्रिय कथाएँ: स्वयं प्रकाश/ भूमिका/ ज्योतिपर्व प्रकाशन
[3]http://www.aksharparv.com/artcile_desc.php?issue_no=175&article_id=508#.VNNZIJ2Uend 24.02.2015/ 19.07
[4] उत्तर यथार्थवाद/ सुधीश पचौरी/ पृष्ठ- 79/ वाणी प्रकाशन, 2004

Saturday, April 25, 2015

केदारनाथ सिंह की कविताओं का वैविध्य संसार



जिस समय इराक के बगदाद में भीषण नरसंहार चल रहा हो उस समय एक भारतीय पुरबिहा कवि ‘एक पुरबिहा का आत्मकथ्य’ नाम से कविता लिख रहा है- "इस समय यहां हूं/ पर ठीक इसी समय/ बगदाद में जिस दिल को/ चीर गई गोली/ वहां भी हूं/ हर गिरा ख़ून/ अपने अंगोछे से पोंछता/ मैं वही पुरबिहा हूं/ जहां भी हूं’‘ केदारनाथ सिंह अपने समय के एक ऐसे ही संवेदनशील कवि है जो कविता में सारे संसार की परिक्रमा कर आते हैं. इनका असली संसार यह पुरबिया दुनिया ही है जो उनकी आत्मा में बसी है. हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह अस्सी वर्ष की आयु में पिछले साठ वर्षों से लिख रहे हैं. साठ वर्षों से अधिक की इस लंबी काव्य यात्रा में इनके आठ कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं। उनकी कविताओं से गुजरते हुए ऐसा महसूस होता है जैसे हम चुने हुए शब्दों से बनी भावों की ऐसी दुनिया में प्रवेश कर जाते हैं जो यथार्थ की दुनिया से बिलकुल भिन्न न हो। 1960 में आए काव्य संग्रह ‘अभी बिल्कुल अभी' से लेकर उनके हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह ‘सृष्टि पर पहरा’ तक की कविताओं में हमें उनकी ऐसी ही यथार्थपूर्ण कोमल कविताई देखने को मिलती है जो कई बार कोमलकांत होते हुए भी नक्कारखाने में तूती की आवाज़ सी लगती है. जिसमें कम से कम व सरल शब्दों में, जीवन का यथार्थ, समाज की सच्चाई, राजनीति का कड़वापन, सभी कुछ, बड़े ही सटीक बिम्बों के सहारे, मन को सीधा उद्वेलित करते हुए, सपाटबानी से सायास एकदम दूर रहते हुए तथा काव्य - शिल्प के नए मानदंड गढ़ते हुए, कुछ यूँ कह दिया जाता है, जो लम्बे समय के लिए हमारे मानस पर अपनी छाप छोड़ जाता है. उनकी काव्य - पंक्तियाँ प्राय: अँधेरे को कोमलता से चीरते हुए प्रकाश ओर जाती हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि इस उम्र में भी उनके भीतर का कवि कहीं से भी थका हुआ नहीं लगता और वे आज भी निरन्तर काव्य - रचना में संलग्न हैं, वह भी वर्तमान समय के यथार्थ - बोध, सामाजिक व राजनीतिक सरोकारों, भाषायी विकास, शिल्प की विशिष्टताओं आदि को अपनी कविताओं में पूरी ताक़त के साथ समेटते हुए। उनकी कविताओं में आधुनिकता और परंपरा दोनों को एक साथ अपने में समेट लेने की विशिष्टता एवं वैचारिक सान्द्रता मौज़ूद होती है.


केदारनाथ सिंह की कविताएँ वैविध्य से भरी हुई हैं, उनकी कविता समाज के तमाम सरोकारों को खुद में समेटे हुए है. यदि कविता में केंद्रीकरण की धारणा को अपदस्थ न माना जाए तो उनकी कविताएं मूलत: ‘दानों’ के महत्व, ‘रोटी’ की चिन्ता, और ‘मानवीय संवेदनाओं’ की महक को केंद्र में रखती और रेखांकित करती कविताएँ हैं. बीसवीं सदी के अंतिम तीन दशकों में जब मुक्तिबोध, धूमिल, नागार्जुन व त्रिलोचन जैसे बड़े कवियों की परम्परा में रघुवीर सहाय व कुँवर नारायण जैसे समकालीन कवि जुड़ रहे थे, ऐसे में इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए उनके बरक्स उन्होंने मुख्यत: इन्हीं तीन बातों से जुड़कर हिन्दी काव्य - साहित्य को एक नया आयाम दिया। हालांकि उन्होंने इन विषयों से इतर भी कविताएँ रची हैं किन्तु जहाँ भी उनकी कविताओं में दानों का उल्लेख आया है, वहाँ वे परम्परा की ओर जाते हुए, मनुष्य और उसके अस्तित्व के उद्गम की ओर बढ़ते हुए, किसी प्रवृत्ति के मूल की ओर जाने का प्रयास करते हुए दिखते हैं. उनकी कविता 'आवाज़' में- "पकते हुए दानों के भीतर / शब्द के होने की पूरी संभावना थी/ मुझे लगा मुझे एक दाने के अन्दर/ घुस जाना चाहिए/ पिसने से पहले मुझे पहुँच जाना चाहिए/ आटे के शुरू में"

या फिर उनकी 'दाने' शीर्षक कविता में – "नहीं/ हम मंडी नहीं जाएँगे/ खलिहान से उठते हुए/ कहते हैं दाने/ जाएँगे तो फिर नहीं आएँगे/ जाते-जाते/ कहते जाते हैं दाने/ अगर आए भी/ तो तुम हमें पहचान नहीं पाओगे/ अपनी अंतिम चिट्ठी में लिख भेजते हैं दाने". जहाँ भी रोटी, अनाज, दानों की बात आती है तो उनका संकेत भूख की ओर, आर्थिक विषमता की ओर, संघर्ष की ओर होता है, जैसे उनकी 'रोटी' कविता में – "वह पक रही है और आप देखेंगे/ यह भूख के बारे में आग का बयान है/ जो दीवारों पर लिखा जा रहा है" साथ ही अपनी एक और कविता में वह कहते है- ‘रात को रोटी जब भी तोड़ना/ तो पहले सिर झुकाकर/ गेहूँ के पौधे को याद कर लेना’. ये कविताएं भले ही मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति हों किन्तु जिस तरलता के साथ केदारनाथ सिंह की कविताओं में इन संवेदनाओं की अभिव्यक्ति होती है और उसके लिए वे जैसे बिम्ब गढ़ते हैं, उसका आधुनिक हिन्दी साहित्य में कहीं कोई सानी नहीं। जैसे "यह मां की आवाज़ है - मैंने कहा/ चक्की के अन्दर माँ थी" अथवा 'हाथ' कविता में "उसका हाथ/ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा/ दुनिया को/ हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए." 

केदारनाथ सिंह की ज्यादातर कविताओं में बिम्ब प्राय: प्रकृति पर आधारित हैं जिनका उद्देश्य मानवीय संवेदना के साथ साथ विचारों का गहराई तक संचार करना है। ‘बाघ’ कविता में बाह्य जगत की भयावहता, बिम्ब के साथ ही जुड़ी है, अत: वह हमें एक अलग ढंग से सोचने पर मजबूर करती है और संवेदना से कहीं ज्यादा, विचारों को उद्वेलित करने का काम करती है. 'बाघ' कवि केदारनाथ सिंह की एक लम्बी एवं प्रसिद्ध कविता-श्रृंखला है, जिसमें छोटे-बड़े इक्कीस खंड हैं। 'प्रतिनिधि कविताएँ' के अन्तर्गत बाघ-श्रृंखला में छोटे-बड़े सोलह खंड हैं। 'बाघ' को लिखने की प्रेरणा कवि को हंगरी भाषा के रचनाकार यानोश पिलिंस्की की एक कविता पढ़ने के बाद मिली थी। यानोश पिलिंस्की की उस कविता में कवि को अभिव्यक्ति की एक नई संभावना दिखी थी। वह कविता 'पशुलोक' से संबंधित थी. 'बाघ' पर बातचीत के पहले हम, केदारनाथ सिंह का पशु-जगत् के साथ काव्य-बर्ताव कैसा रहा है यह देख लें। साहित्य में और आम-जीवन में भी बन्दरों की जो छवि चित्रित है वह चंचल,उछल-कूद करने वाले, दूसरे के हाथों से कुछ छीना-झपटी करने वाली छवियाँ ही चित्रित हैं लेकिन यह कवि केदारनाथ सिंह की आखें हैं जो, ''सीढ़ियों पर बैठे बन्दरों की आँखों'' की 'एक अजीब-सी नमी'' को लक्षित कर ले जाती है। इसी तरह 'बैल' कविता में वह 'बैल' के बारे में लिखते हैं, -''वह एक ऐसा जानवर है जो दिनभर / भूसे के बारे में सोचता है / रात भर / ईश्वर के बारे में'' 'बाघ' कविता में भी जब बाघ का सामना बुद्ध से होता है वहाँ कवि लिखता है, ''जहाँ एक ओर भूख ही भूख थी / दूसरी ओर करुणा ही करुणा।'' बाघ कवि के लिए 'भूख ही भूख' है। कहने का आशय यह है कि पशु-जगत् के साथ केदारनाथ सिंह बड़ी कोमल एवम् कारुणिक बर्ताव करते हैं। दूसरी चीज यह कि ये सभी पशु उनकी कविता में अपनी 'प्राकृतिक सत्ता' नहीं खोते। वे बिम्ब, प्रतीक, मिथक बाद में है, उनका प्राकृतिक अस्तित्व पहले है। 'बाघ के बारे में' केदारनाथ लिखते हैं- ''बाघ हमारे लिए आज भी हवा-पानी की तरह एक प्राकृतिक सत्ता है, जिसके होने के साथ हमारे अपने होने का भवितव्य जुड़ा हुआ है।'' 'बाघ' पढ़ते समय सबसे पहली उत्सुकता यह होती है कि 'बाघ' है क्या? बाघ की कई-एक छवियाँ इस कविता में हैं। कभी हिंसा बाघ के रूप में तो कभी अपने स्वभाव के विपरीत समस्त करुणा से युक्त बाघ. 

यह एक विडंबना ही है कि शहर और बाजार - जिसको मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए रचाया-बसाया है वह आज मनुष्य और मनुष्यता को लील लेने के स्थल में परिवर्तित होता जा रहा है। केदारनाथ सिंह अपनी कविता में निरंतर शेष होती उन चीजों को बचा लेना चाहते हैं जो शहरीकरण और बाजारीकरण की प्रक्रिया में उसके ग्रास बनते जा रहे हैं। 'बाघ' में कवि 'बुनते हुए हाथ' और 'चलते हुए पैर' को बचा लेना चाहता है। कवि की पूर्व उल्लिखित कविता 'दाने' में दानों का मंडी जाने से इंकार की अनुगूँज 'बाघ' में भी सुनाई पड़ती है। इस एक बड़ी कविता में पूर्ववर्ती कई कविताओं की अनुगूंजे साफ सुनी जा सकती हैं। 'बाघ' पढ़ते समय कवि की ही 'दाने' के अलावा, 'यह पृथ्वी रहेगी', 'जो एक स्त्री को जानता है', 'टूटा हुआ ट्रक', 'बीमारी के बाद', 'महानगर में कवि' और 'पड़रौना उर्फ शहर बदल' की याद ताजा हो जाती है. 'बाघ' कविता के तेरहवें खंड में बाघ बैलगाड़ियों को देखता है। बैलगाड़ियाँ हमेशा की तरह इस बार भी, ''बस्ती से शहर की ओर / कुछ-न-कुछ ढोती हुई / और अपने हिस्से की जमीन / लगातार-लगातार खोती हुई।'' चली जा रही हैं। 'बाघ' कविता में 'बस्ती' से 'शहर' की यात्रा सदैव कुछ गँवाने और लुटाने की यात्रा लगती है। इसलिए इस कविता में शहर के बारे में बाघ के विचार अच्छे नहीं हैं। वह पहली बार जब 'शहर' आता है तो 'शहर' को 'गहरे तिरस्कार' और 'घृणा' से देखकर उससे बाहर चला जाता है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि केदारनाथ सिंह अपनी कविता में निरंतर रीतते लोक-जनपदीय जीवन और लोक-संस्कृति को बचा लेना चाहते हैं, यहाँ बैलगाड़ियों को शहर की ओर जाते देख बाघ का यह कहना कि, ''मुझे कुछ करना चाहिए / कुछ करना चाहिए।' स्वयं कवि का कथन लगता है। 'बाघ' कविता का बाघ कई जगहों पर अपने रचयिता कवि से एकाकार हो गया है।

कवि की ये कविताएँ समय की दृष्टि से भले ही कोई साम्य न रखती हो किन्तु उनकी हर कविता बिम्बों की तलाश तथा उनकी प्रयुक्ति में एक विस्मित कर देने वाला ऐक्य पाया जा सकता है. जब वे अपनी ‘चींटियों की रुलाई’ कविता में - ‘मैं तो बस इस शहर की/ लाखोंलाख चींटियों की मूक रुलाई का/ हिन्दी में अनुवाद करना चाहता हूँ/ सुनो,क्या तुम सुन रहे हो उसे?’ अथवा ‘पानी की प्रार्थना’ कविता में - ‘समय ही कुछ ऐसा है / पानी नदी में हो/ या किसी चेहरे पर/ झाँककर देखो तो तल में कचरा/ कहीं दिख ही जाता है’, या फिर ‘पानी था मैं’ कविता में – ‘कभी पानी था मैं/ बस इतना याद है/ कि एक दिन एक कटोरे से गिरा/ और ज़मीन ने मुझे पी लिया/ जबकि एक बकरी उदास ताकती रही मुझे’ कहते हैं, तब वे अपनी संवेदना की अभिव्यक्ति के लिए ऐसे अनूठे बिम्बों का इस्तेमाल कर रहे होते हैं, जो हमें अन्यत्र कहीं नहीं दिखते। केदारनाथ सिंह का यह अनूठा बिम्ब - विधान ही उन्हें श्रेष्ठ एवं मानवीय संवेदनाओं का बेजोड़ कवि बना देता है। मुक्तिबोध, शमशेर , केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन और त्रिलोचन के बाद जिन कवियों ने हिन्‍दी में नयी जमीन तोडी है उनमें रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह और कुँवर नारायण प्रमुख हैं. इनमें रघुवीर सहाय जहां इस जनतंत्र में तंत्र की भूमिका को आलोचनात्‍मक ढंग से अपनी कविता के केन्‍द्र में रखते हैं वहीं केदारनाथ सिंह इस लोकतंत्र में लोक की चेतना को उसकी सादगी, स्‍फूर्ति और उसके विस्‍मयबोध के साथ प्रस्तुत करते हैं.

केदार जी भोजपुरी भाषी हैं और उनकी भोजपुरी बलिया, छपरा की मीठी भोजपुरी है. यह मिठास केदार जी के व्‍यक्तित्‍व का भी एक हिस्‍सा है. एक सरल सी आत्‍मीयता जो उनकी कविताओं में अमूमन मिलती है आपको धीरे धीरे अपने साथ लेती चलती है और फिर जीवन जगत के अपने अनुभवों को हमसे साझा करती है. अपनी एक कविता ‘भोजपुरी’ में केदार जी लोकभाषा भोजपुरी के सकारात्‍मक पक्ष को जिस संवेदनशीलता के साथ सामने रखते हैं वह अनोखा है – "लोकतन्‍त्र के जन्‍म से बहुत पहले का/ एक जिन्‍दा ध्‍वनि लोकतंत्र है यह/ जिसके एक छोटे से ‘हम ’ में/ तुम सुन सकते हो करोडों/ ‘मैं ’ की घडकनें". लोक की और लोकभाषा की, जिसे अक्‍सर बोली कहकर हम सीमित करने की कोशिशें करते हैं, ताकत और व्‍यापकता को यहां जिस तरह से केदार जी ने सामने रखा है वह महत्‍वपूर्ण है. यह कविता मात्र भोजपुरी की ही बात नहीं करती. यह तमाम लोकभाषाओं की जरूरत की भी पैरवी करती है जिसकी अंग्रेजी से लडने के तर्क से हम उपेक्षा करते हैं और भूल जाते हैं कि हिन्‍दी की सारी थाती इन्‍हीं लोकभाषाओं की देन है जिस लोक की ताकत से यह तंत्र चलता है वह इन्‍हीं लोकभाषाओं और उसके धारकों की जबान से अपनी प्रासंगिकता को सिद्ध करता है साथ ही यह कविता . इस लोकजन की व्‍यापकता का भी बोध कराती हैदेखा जाए तो केदारनाथ सिंह की तमाम कविताएं इन्‍हीं लोकभाषी जन की बातें करती हैं. ‘कपास के फूल’ 'कवि कुम्‍भनदास के प्रति’, ’हिन्‍दी’ आदि कविताएं इसी लोकजन की ताकत और मिजाज को कई तरह से अभिव्‍यक्‍त करती हैं- "वह जो आपकी कमीज है/ किसी खेत में खिला/ एक कपास का फूल है" केदार जी की कविता लोक के जीवट को तमाम तरह से अभिव्‍यक्‍त करती है. लोक की संवेदना को प्रकट करते हुए ‘घास’ कविता में घास लोक जनों का ही प्रतीक है.आम जन की इस जिद और ताकत को घास के माध्यम से ही उन्होंने अभिव्‍यक्‍त किया है - "कभी भी/ कहीं से भी उग आने की/ एक जिद है वह"

केदारनाथ सिंह जी की कविताओं का दायरा बेहद व्यापक एवं विशद है. समाज की किसी भी चिंता एवं सरोकारों पर प्रकाश डालने में उनकी कलम चूकी नहीं है. किसानों की आत्‍महत्‍या को लेकर केदार जी की एक मार्मिक कविता है ‘ फसल' इसमें वे उनकी लगातार बिगडती हालत को बयां करते हैं. कवि की निगाह में आज भी किसान ‘सूर्योदय और सूर्यास्‍त के विशाल पहियों वाली‘ गाडी से चलता है पर विकास के इस मोड पर उसकी यह गाडी अटक जाती है और किंकर्तव्‍यविमूढ वह इस नई और अंधी सभ्‍यता के चक्‍कों तले कुचल दिया जाता है पर कवि यहां इस हत्‍यारी सभ्‍यता की परिभाषाओं से सहमत नहीं है इसलिए वह तय नहीं कर पाता कि यह ‘हत्‍या थी या आत्‍महत्‍या’ यह आप पर छोडता हूं. आज किसान का शोषण सर्वत्र हो रहा है। खेती घाटे का सौदा हो गई है, फिर भी छोटी से छोटी जोत का किसान भी इसी इरादे से खेती करता रहता है कि ज़मीन से उसे खाने के लिए कुछ तो मिलेगा ही। वह अपनी पुश्तैनी ज़मीन से बेदखल नहीं होना चाहता। उसकी ज़मीन छीनने को हज़ारों ताकतें लगी हुई हैं। जगह जगह भू माफिया उसकी ज़मीन पर नज़र गड़ाए बैठे हैं, व्यवस्था ज़मीन हड़पने वालों के साथ खड़ी दिखाई देती है। ऐसे में प्रतिरोध की चेतना और साहस कहाँ से पैदा हो? कविता में किसान के भीतर वह साहस एक साँप की चमकती हुई आँखों को देखकर पैदा होता है। ‘आज नरकट की पत्तियों में / उसने एक साँप की चमकती हुई/ आँखें देखीं/ उसने जोखिम में देखी/ एक अद्भुत सुन्दरता/ और कुछ पल अवाक/ देखता रहा उसे’ कहकर केदारनाथ सिंह इस साहस के पैदा होने का अद्भुत बिम्ब खींचते हैं। साहस के पैदा होते ही किसान विद्रोही हो जाता है, ‘वह कचहरी गया/ वहाँ उसके सामने रखा गया/ एक सादा काग़ज़/ कहा गया - 'यहाँ … यहाँ … / एक दस्तख़त करो' और यह विद्रोह उसे चेतन बना देता है, - ‘उसने इनकार किया/ और उसे लगा/ वह दस गुना/ बीस गुना/ सौ गुना और ज़िन्दा हो गया!’ प्रतिरोध की इस चेतना में ही उस क्रांति के बीज छिपे हैं, जो किसी मरे हुए समाज को ज़िन्दा कर सकती है।


केदारनाथ सिंह की कविताओं में परम्परा की महत्ता तथा उसकी ताक़त का अहसास कराए जाने के साथ साथ आधुनिकता की आहट और परम्परा से होने वाली उसकी टकराहट का भी विशिष्ट चित्रण है। जब परम्‍परा आधुनिकता से टकराती है तो जहाँ जरूरी होता है, वहाँ परम्‍परा ठहर जाती है और आधुनिकता को अपने ढंग से परिस्थितियों को बदलने देती है। इसी से परम्‍परा और आधुनिकता के बीच एक तालमेल बनता है। जीवन में दोनों का अपना अपना महत्व है।कवि स्वयं को अपने समय के प्रति, अपने विश्वास के प्रति, अपने विचार के प्रति समर्पित करता है। ‘गमछा और तौलिया’ कविता में जब केदारनाथ सिंह - ‘तौलिया गमछे से कह रहा था/ तू हिन्दी में सूख रहा है/ सूख/ मैं अंग्रेजी में कुछ देर झपकी लेता हूँ’ कहते हैं, तब वे परम्परा और आधुनिकता के बीच के द्वंद्व तथा उनके बीच बिठाए जाने वाले सामंजस्य की ओर इशारा कर रहे होते हैं. परम्‍परा और आधुनिकता के बीच की टकराहट में हमेशा सब कुछ बदल ही नहीं जाता. हर आदमी समाज में अपनेअपने तरीके से जीता है अपने अपने तरीके से सोचता है और अपने तरीके से आगे की दिशा निर्धारित करता है। कुछ लोग परम्‍परा का हाथ पकड़कर जीते हैं और कुछ अपने अतीत को भुलाकर समय के साथ आगे निकल जाते हैं। ‘समय से पहली मुलाकात’ शीर्षक कविता में केदारनाथ सिंह ने कहा है ‘अब किससे पूछूँ/ यह मेरा तो नहीं/ आखिर किसका समय है/ जो बजता रहता है मेरी घड़ी में?’ यहाँ कवि अपने समय को खो देने की पीड़ा को अभिव्यक्त करता है। उसकी घड़ी में जो समय बज रहा है वह उसका नहीं है। वह यह भी नहीं जानता कि वह किसका समय है। आज का समय ऐसा ही है, जहाँ व्‍यक्‍ति अपनी परम्‍परा से कटा हुआ है। अपने को पूरी तरह बदल भी नहीं पाया है। उसका अपना कोई स्‍थापित संस्‍कार नहीं बन पाया है। वह कहीं बीच में ही त्रिशंकु सा लटका हुआ है जो समय के संधिकाल में जी रहा है। समय की संकरता का यह दायरा विस्‍थापन के विस्तार के साथ व्यापक होता चला जाता है। ‘देश और घर’ कविता में केदारनाथ सिंह विस्‍थापन के कारण पैदा हुई इस संकरता से जूझने की स्‍थिति का बड़ी ही संवेदना के साथ चित्रण करते हैं। इस कविता में ‘हिन्दी मेरा देश है/ भोजपुरी मेरा घर/ घर से निकलता हूँ/ तो चला जाता हूँ देश में/ देश से छुट्टी मिलती है/ तो लौट आता हूँ घर’ जैसी पंक्तियों के माध्यम से वे अपनी विडंबना का उल्‍लेख करते हैं. उनका जन्‍म भोजपुरी प्रदेश में हुआ है, इसलिए भोजपुरी उनका घर है। किन्‍तु समय ने उन्‍हें अपने घर से उठाकर देश भर में घुमा दिया है, इसलिए वे देश के हो गए हैं, जहाँ उनकी भाषा हिन्‍दी है लेकिन उन्होंने भोजपुरी का वह घर. कभी खाली नहीं किया है. कभी वे हिन्‍दी में रमते हैं तो कभी भोजपुरी के घर लौट जाते हैं। इस आवाजाही में वे बार - बार कुछ खोते और कुछ पाते रहते हैं। अपनी इस पीड़ा को वे ‘देश और घर’ में - ‘इस आवाजाही में/ कई बार घर में चला आता है देश/ देश में कई बार/ छूट जाता है घर’ कहकर अभिव्‍यक्‍त करते हैं। उन्‍हें यह आशंका है कि इस आवाजाही की प्रक्रिया में वे किसी एक के नहीं हो पा रहे हैं और दोनों को ही खोते जा रहे हैं। अपनी इस विडंबना को वे इन शब्दों में अभिव्यक्त करते हैं, - "मैं दोनों को प्यार करता हूँ/ और देखिए न मेरी मुश्किल/ पिछले साठ बरसों से/ दोनों में दोनों को/ खोज रहा हूँ."

मनुष्य जहाँ - जहाँ भी जाता है, अपने पारम्परिक परिवेश को, उसकी गंध को, उसकी अच्छाइयों - बुराइयों को अपने संग समेटे हुए चलता है। वह जहाँ भी रहता है, परम्परा अदृश्य रूप से उसके साथ बनी रहती है। वह परम्परा की खुशबू को बचाए रखने की कोशिश करता है। उस पर गर्व महसूस करता है। । व्यक्ति कभी भी अपनी मौलिक पहचान को, अपनी अस्मिता को खोना नहीं चाहता। लेकिन विस्थापन और समय के परिवर्तन के साथ वह धीरे - धीरे उससे विलग होता चला जाता है। परम्परा उसके वर्तमान में चुपके से कहीं खो जाती है। केदारनाथ सिंह की कविता ‘काली सदरी’ इस दृष्टि से अत्यधिक उल्लेखनीय है। इस कविता में वे - ‘बरसों पहले/ इस महानगर में जब पहली बार आया था/ मेरे बदन पर एक कुर्ता था/ जिसे गाँव के बूढ़े दर्ज़ी ने सिला था/ कुर्ते में एक जेब भी थी छोटी - सी/ जिसमें मकई के लावा की/ गन्ध भरी थी/ वह मेरे साथ - साथ रही कई हफ़्तों तक/ इस महानगर में’ कहकर दिल्ली में अपने साथ सँजोकर लाई गई अपनी विरासत का जिक्र करते हैं। आगे इस कविता में वे अपनी काली सदरी और उसके धागों में छिपकर कस्बे से आई हुई धूल का जिक्र करते हुए - ‘और हाँ - मेरे सफ़ेद कुर्ते पर/ एक काली सदरी भी थी/ जिसके धागों में छिपी थी/ एक छोटे - क़स्बे की ज़रा - सी धूल/ मैंने कोशिश बहुत की/ कि वह ज़रा - सी धूल/ मेरे संग - संग बची रहे महानगर में/ पर पता नहीं कैसे/ धीरे - धीरे झरती रही वह/ झरती रही मेरी पहचान/ मेरी देह से धीरे - धीरे/ और एक दिन मैंने पाया/ अब मेरी पहचान/ 88/3 दिल्ली है’ कहकर अपनी उस अस्मिता के दिल्ली में खो जाने की पीड़ा का बयान करते हैं। इसमें अपनी पहचान के खो जाने का, उसके बदल जाने का दर्द छिपा है। विस्थापन की यह पीड़ा, यह वास्तविकता, यह परिणति सार्वभौमिक है, केदारनाथ सिंह की अकेले की नहीं है।



केदारनाथ सिंह हिन्दी के उन गिने चुने वरिष्ठ कवियों में से हैं, जो कविता की वर्तमान स्थिति से न तो दुखी हैं और न उसके भविष्य के प्रति निराश। उनसे जब भी बात होती है, वे नए व युवा कवियों की कविताओं पर बात करते हैं। वे हमेशा उस उम्मीद का जिक्र करते हैं, जो उन्होंने कविता के भविष्य के बारे में पाल रखी है। वे सदैव परिवर्तन की बात पर बल देते हैं। कविता में समय के अनुरूप जो बदलाव आना चाहिए, वे उसके प्रबल पैरोकार हैं। ‘शोध’ कविता में वे कवियों को अपेक्षित बदलाव की तैयारी के लिए अपने में गहरी समझ पैदा करने का आह्वान करते हैं, - ‘और मुझे रुकना होगा वहीं/ उस भाषा का अध्ययन करने के लिए/ जो मछलियाँ बोलती हैं/ बहते हुए जल से/ और वह विलाप जो गूँजता है उनकी आँखों से/ चमक में और वह तकनीक/ जो बाज़ार करता है इस्तेमाल/ उनके जल से/ जाल तक पहुँचने की यात्रा में।’ आज के आलोचकों द्वारा कविता को मृतप्राय घोषित कर दिए जाने की बात से वे कतई सहमत नहीं और इस संबन्ध में वे अपना मंतव्य ‘कविता’ शीर्षक कविता में स्पष्ट रूप से प्रकट करते हैं ‘और वह आज भी ज़िन्दा है/ मृत्यु की सारी घोषणाओं के बाद/ लोग अब भी उसे सुनते हैं।’ उनका मानना है कि कविता की सार्थकता जिनके लिए है, वही कविता के आराधक होते हैं। आज की कविता की मुख्यधारा प्रतिरोध की है, हाशिए पर पड़े वंचित, दलित स्त्री समाज की पीड़ा व संघर्ष की है। तभी तो वे ‘कविता’ कहते हैं, - ‘पता लगा लो - जो मारे जाते हैं जंगलों में/ उन युवा होठों पर/ अक्सर होती है कोई न कोई कविता।’ प्रलोभन, किसी दबाव, किसी प्रकार के दमन के आगे झुके बिना पूरी जीवंतता के साथ आगे बढ़ रही है।

केदारनाथ सिंह अन्य वैश्विक मुद्दों को भी अपनी कविता में जगह देते है. हमारे विश्व-समाज का सर्वस्व प्रदूषित होते जाने की पीड़ा भी उनकी कविता का स्वर बनता है इसका इलाज सुझाती केदारनाथ सिंह की कविता की पंक्तियां हैं- "इतनी गर्द भर गई है दुनिया में/ कि हमें ख़रीद लाना चाहिए एक झाड़ू/ आत्मा के गलियारों के लिए/ और चलाना चाहिए दीर्घ एक अभियान/ अपने सामने की नाली से/ उत्तरी ध्रुवान्त तक." उदारीकरण से सबसे अघिक लाभ पूंजीपति वर्ग को हुआ है। यह वर्ग चांदी काट रहा है। पूरी दुनिया में ‘ताप और ऊर्जा’ के रूप में आग और पानी का खेल खेलकर पृथ्वी पर ही नहीं, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पर उस ‘सम्पन्न सौदागर’ का एकाधिकार होता जा रहा है, कवि इस बात को ख़ूब अच्छी तरह जानता है- "मैं उसे इसलिए भी जानता हूं/ ब्रह्माण्ड का/ सबसे सम्पन्न सौदागर है/ जो मेरी पृथ्वी के साथ/ ताप और ऊर्जा का तिजारत करता है/ ताकि उसका मोबाइल/ होता रहे चार्ज।" इसके साथ ही कवि वैश्विक शान्ति से जुड़े मुद्दे भी उठाता है और वाज़िब सवाल खड़े करता है. भारत पाक बांग्लादेश को लेकर आतंक की नीति पर कवि सवाल खड़े करता है इसके खिलाफ अपना प्रतिरोध दर्ज कराता है - ‘अगर सरहद जरूरी है/ पडी रहने दो उसे/ पर हाथों को हक दो/ कि मिलते रहें हाथों से’ कवि चाहता है चाहे जैसे भी हो इन मुल्कों में एक पतली सी झिर्री खुली रहे जिससे संभव हो सके खुली हवा में साँस लेना, सत्ताएँ कितना ही कागज़ी हिसाब रखें पर बची रहे एक मुट्ठी आसमां की ख्वाहिश .एक ‘वृहत्तर भारत’ का सपना कवि देखता है. परन्तु वह अपने सपने को साकार होता नहीं देखता । इसलिए इस सपने को वह अपने भीतर बसी एक पागल स्त्री का सपना मानता है, समाज में अन्याय, अत्याचार के खि़लाफ़ आवाज़ उठाने वालों की संख्या आटे में नमक के बराबर रह गई है । इसलिए उन सारी जगहों पर भी चुप्पियों का साम्राज्य है, जहां बोलना ज़रूरी है. "चुप्पियां बढ़ती जा रही हैं/ उन सारी जगहों पर/ जहां बोलना ज़रूरी था"





उनके यहाँ सीखने के लिए बहुत कुछ है। उनकी रचनाशीलता अभी बूढ़ी नहीं हुई है और हमें सिखाने के लिए वे अभी और भी बहुत कुछ रचने वाले हैं। उनकी कविताओं का बिम्ब - विधान निराला है। उनके अद्भुत बिम्ब शब्दों की शक्ति को कई गुना बढ़ा देते हैं। उनके बिम्ब हमारे आस - पास ही उपस्थित और हमारे जीवन से गहराई से जुड़ी चीज़ों से संबद्ध होते हैं। वे कविता में इस तरह से घुले - मिले होते हैं कि हम उन्हें किसी भी तरीके से उनकी पंक्तियों से विलग नहीं कर सकते। उनके बिम्ब शब्दों की आत्मा में पैठे हुए - से लगते हैं। केदारनाथ सिंह ने स्वयं ही कहा है, - ‘कविता में बिम्ब की बुनावट महत्वपूर्ण है, बिम्ब की प्रमुखता नहीं।’ वे अपनी कविताओं में इस सिद्धान्त को पूरी तरह से अपनाकर चलते हुए दिखते हैं। आधुनिकता की दृष्टि से केदारनाथ सिंह हमेशा संकीर्ण वैज्ञानिक आधुनिकता अथवा सामाजिक व राजनीतिक चेतना तथा परम्परा के प्रति नकार की भावना से सम्पन्न उत्तरआधुनिकता से ऊपर उठकर सोचने वाले कवि के रूप में दिखाई पड़ते हैं। उनकी कविता हमें परम्परा के श्रेष्ठ सोपानों पर टिके रहने का आह्वान करती हुई, नवाधुनिकता के उस ठोस प्रस्थान - बिन्दु तक पहुँचाती है, जहाँ मानवीय चेतना अपने चरम पर पहुँच हमारे जीवन संघर्ष को सही दिशा में आगे ले जाने के लिए प्रेरित करने लगती है। यह टकराहट उस समन्वयवादी दृष्टि से उपजी प्रतीत होती है, जो उनके भीतर के शहर तथा गाँव, वर्तमान तथा अतीत के बीच निरन्तर चलता रहता है। यह नवाधुनिकता देशज है, पश्चिम से प्रभावित नहीं। उन्होंने अपने लेख ‘हिन्दी आधुनिकता का अर्थ’ में स्वयं कहा है, - "मेरी आधुनिकता में मेरे गाँव और शहर के बीच का सम्बन्ध किस तरह घटित होता है, इस प्रश्न की विकलता मेरे भाव - बोध का एक अनिवार्य हिस्सा है। ये दोनों मेरे भीतर हैं और दोनों में जो एक चुपचाप सहअस्तित्व है, उसका सन्तुलन हमेशा एक जैसा बना रहता है। इससे भारतीय कवि के भीतर एक नए ढंग का भाव - बोध विकसित होता है, जो पश्चिम से काफी भिन्न है।" केदारनाथ सिंह की ही पीढ़ी के कवि कुँवर नारायण ने कहा है, - "बदलते संदर्भों में मनुष्य के सबसे कम उद्घाटित या विलुप्त होते, जीवन - स्रोतों की खोज और भाषा में उनके संरक्षण की क्षमता शायद आज भी कविता की सबसे बड़ी ताक़त है." इस कठिन दौर में भी हमें उम्मीद और आश्वस्ति से भर देती है। अपनी बनावट में ये कविताएँ सहज सम्प्रेष्य हैं। यह कवि अपने समय के संकटों से रूबरू होता है, पर एक उम्मीद के साथ। यह कवि की संवेदना का एक ऐसा महीन धागा है जो सारी कविताओं में फैला हुआ है डॉ॰ बच्चन सिंह के शब्दों में, "छायावादोत्तर कवियों में केदारनाथ सिंह सबसे अधिक सचेत कवि हैं वाक् और अर्थ दोनों के प्रति। .जीवन का इतना वैविध्य, प्रतिपत्तिमूलक (जेनेरिव) भाषा का किंश्चित् जटिल, किन्तु सरस और लयात्मक प्रयोग अन्यत्र कम मिलेगा।


मूल स्रोत 

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* प्रतिनिधि कविताएं : केदारनाथ सिंह/ राजकमल प्रकाशन 

* सृष्टि पर पहरा/ केदारनाथ सिंह/ राजकमल प्रकाशन 





सहायक सन्दर्भ ग्रन्थ 

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* आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास/ बच्चन सिंह 

* हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास/ बच्चन सिंह

* कविता और समय/ अरुण कमल 

* 'तद्भव' पत्रिका, अंक जून 2014 



पचरंग चोला पहर सखी री

अक्सर हम समाज में शताब्दियों से चली आ रही धारणाओं को ही अंतिम निष्कर्ष मानकर उन्हें ही पोषित करते रहते हैं किन्तु धीरे धीरे समय बदलता है और उन धारणाओं पर समय सन्देह करता है, उसपर वाज़िब सवाल उठाए जाते हैं. उनकी शिनाख्त और पड़ताल की जाती है और जो तर्क की तुला पर सटीक नहीं बैठता, उसमें नए निष्कर्ष जोड़े जाते हैं. अपने समाज की तरह हिंदी साहित्य भी प्रचलित धारणाओं को सत्य एवं अंतिम मानकर उन पर निर्भर रहता है. ऐसे में अगर ऐसी धारणाएं मध्यकाल के साहित्य या साहित्यकार के सन्दर्भ में मिथकीय छवि से जुडी हों तो उन पर सवाल उठाना, उनमें परिवर्तन की माँग करना अपने आप में साहस का काम है. हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘पचरंग चोला पहर सखी री’ भी आलोचक माधव हाड़ा के इसी साहस का परिचय देती है. देखा जाए तो यह पुस्तक पुरुषोत्तम अग्रवाल की ‘अकथ कहानी प्रेम की’ की कड़ी से जुडती पुस्तक है जिसमें कबीर के समान ही मीरा के संबंध में प्रचलित धारणाओं पर प्रश्न उठाए गए हैं. अब तक मीरा के जीवन को तरह तरह से पढ़ा और गढ़ा गया है. डॉ. माधव हाड़ा ने इस निर्मिति को ऐतिहासिक साक्ष्यों के आलोक में देखा-परखा है. यह ‘प्रेम दीवानी’ मीरा की छवि नहीं है. सामन्ती सत्ता संघर्ष में एक सचेत सामंत स्त्री किस तरह से असाधारण भूमिका का निर्वाह करती है. इसी आलोक में यह पुस्तक अपनी बात कहती है. इसी सन्दर्भ में आलोचक ने पुस्तक में कहा भी है कि “वह मीरां जिसे हम जानते हैं अपनी असल मीरां से बहुत दूर आ गई है. यह दूरी बनाने और बढ़ाने का काम मीरां के अपने समय से ही हो रहा है. असल मीरां अभी भी लोक इतिहास, आलोचना, धार्मिक आख्यान और आलोचना विमर्श में है लेकिन वह इन सब में कट छंट और बंट गई है.”



आलोचक माधव हाड़ा की यह पुस्तक ऐतिहासिक, समकालिक एवं देशभाषा स्रोतों और व्यवहारों को गंभीरता से पढ़ते हुए नए निष्कर्षों पर पहुँचती है. यह एक विचारोत्तेजक शैली में लिखी गई तथ्यपरक और ऐतिहासिक महत्व की पुस्तक है जो अपने हर सवाल के साथ अब तक अनुपलब्ध रहे अनेक तथ्यों को प्रस्तुत करती है. पुस्तक का पहला वाक्य है: ‘मीरां का ज्ञात और प्रचारित जीवन गढ़ा हुआ है.’ इन गढ़ी गई छवियों में मुख्य हैं- गीता प्रेस की आदर्श हिंदू पत्नी, टॉड की प्रेम-दीवानी, संत-भक्तों के बीच मीरां की रहस्यात्मक छवि और वामपंथियों तथा स्त्रीवादियों द्वारा गढ़ी असाधारण विद्रोही स्त्री की छवि. मीरां से संबद्ध केवल दृष्टिकोण ही नहीं, तथ्य भी गढ़ लिए गए हैं, भले ही उनका आधार जनश्रुतियाँ हों. लेखक का प्रयास इन गढ़ी गई अनेक ‘मीरांओं’ में से मीरां की प्रामाणिक छवि की तलाश करना ही है। यह पुस्तक छह अध्यायों में विभक्त है, जो सिलसिलेवार ढंग से मीरां के जीवन, समाज, धर्माख्यान, कविता, कैननाइजेशन और छवि निर्माण पर केंद्रित हैं। 

इस पुस्तक के पहले अध्याय में माधव हाड़ा मीरां की रूढ़, पारंपरिक और गढ़ी गई छवियों को सप्रमाण तोड़ते हैं। मीरां के जन्म-समय, जन्म-स्थान, विवाह, मृत्यु आदि के बारे में वे प्रसिद्ध इतिहासकारों के शोध-निष्कर्षों का सहारा लेते हैं। इस अध्याय में वे मीरां की कृष्ण-भक्ति को उसके पितृकुल की परंपरा से जोड़ कर देखते हैं किन्तु साथ ही मीरां के प्रेम दीवानी रूप को खारिज़ भी करते हैं. उनके अनुसार मीरां एक आत्मसचेतस एवं स्वावलम्बी सामंत स्त्री थी। उसकी भक्ति, साहस और स्वेच्छाचार असामान्य नहीं थे। और वह जिस समाज में पली बढ़ी, उसमें इनके लिए पर्याप्त गुंजाइश और आज़ादी भी थी और कुछ हद तक इनकी स्वीकार्यता और सम्मान भी था. इस सामान्य जीवन में भी सत्ता संघर्ष, अंतकर्लह और बाह्य आक्रमणों की निरंतरता से उसके जीवन में मोड व पड़ाव बढ़ गए।

दूसरे अध्याय में लेखक का मानना है कि भले ही आम धारणा यह रही कि मीरां का समय और समाज ठंडा और ठहरा हुआ था किन्तु मीरां के समय का मध्यकालीन समाज जड़ नहीं था, उसमें गतिशीलता के पर्याप्त चिह्न मिलते हैं। मीरां की व्यापक लोक स्वीकृति और मान्यता ही इस बात का पर्याप्त सबूत है कि यह समाज अन्याय के प्रतिकार का सम्मान भी करता था और इस प्रतिकार के लिए जरूरी खाद-पानी भी मुहैया करवाता था। मीरां को अन्याय के प्रतिकार और अपनी शर्तों पर जीवन यापन का साहस और सुविधाएं इस समाज ने ही दी थी। पर प्रश्न है कि क्या इस गतिशील समाज में भी पितृसत्तात्मक सामंती व्यवस्था की जकड़न स्त्रियों के लिए कम हो गई थी, और वह भी सामंती कुल की मर्यादा को चुनौती देने वाली विधवा स्त्री के लिए? क्या मीरां के भक्तिमूलक विद्रोह को मेवाड़ के तत्कालीन सामंती समाज में भी वैसी ही स्वीकार्यता मिल पाई, जैसी लोक में मिली? मीरां की भक्ति और विद्रोह की स्वीकार्यता लोक में तो व्यापक रूप से हुई, इसकी ओर लेखक ने यह कह कर इशारा किया है कि मीरां के विद्रोह में लोक अपनी कामनाओं को फलित होते देखता था। आलोचक के अनुसार मीरांकालीन समाज में लोक पूरी तरह उपेक्षित नहीं था. यह अपने को कई तरह से व्यक्त करता था और इसकी राय का महत्त्व भी था. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि लेखक ने तमाम तथ्यों को परखने और अतीत में हुए शोध को जाँचने के बाद यह बात पुख्ता तौर पर कही है कि मीरां का समय और समाज उपनिवेशकालीन इतिहासकारों और इधर के कुछ स्त्री विमर्शकारों द्वारा गढ़ी गई धारणाओं से एकदम अलग था।

आलोचक माधव हाडा ने तीसरे अध्याय ‘धर्माख्यान’ में अपने पहले दो अध्यायों में दिए निष्कर्षों को एक अलग ही दृष्टिकोण से देखा है जिसमें उन्होंने मीरां का असाधारण विद्रोही सामंत चरित्र और उसकी खास किस्म की लोकभक्ति को रेखांकित किया है. यह भक्ति मध्यकालीन प्रचलित भक्ति के चौखटों से बाहर की थी। भक्ति का यह खास लोकरूप जनसाधारण में भक्ति के तत्कालीन सांस्थानिक और सांप्रदायिक रूपों से ज्यादा लोकप्रिय हुआ। यह इस हद तक लोकप्रिय हुआ कि भक्ति के इन सांस्थानिक और सांप्रदायिक रूपों के लिए इसकी अनदेखी करना असंभव हो गया. आलोचक स्थापना देते हैं कि नाभादास के भक्तमाल में मीरां का निरंकुश और निडर स्त्री रूप उसके निर्मित भक्त रूप के नीचे पूरी तरह दबता नहीं है जबकि बाद की भक्तमाल टीकाओं में यह दब गया है. उनका यह भी मत प्रकट होता है कि यह जो आज की मीरां की छवि है यह ‘प्रियादास’ की बनाई हुई है. मीरां विषयक उल्लेख वल्लभ संप्रदायी दो ग्रंथों चौरासी वैष्णवन की वार्ता और दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता में आते हैं. ये दोनों ग्रंथ प्रामाणिक माने जाते हैं. मीरां की संप्रदाय निरपेक्ष खास किस्म की लोक भक्ति और चरित्र जनसाधारण में इतना लोकप्रिय हुआ कि परवर्ती वल्लभ संप्रदायी लोगों ने भी उसकी महत्ता को स्वीकार कर लिया. इस दौरान लिखे गए चरित्र-आख्यानों में मीरां के भक्त रूप के साथ उसके ऐतिहासिक स्त्री मनुष्य का अनुभव और संघर्ष मुखर रूप में विद्यमान हैं.

चौथे अध्याय ‘कविता’ में प्रो. माधव हाड़ा मीरां की कविता के बारे में बात करते और कुछ नई और महत्त्वपूर्ण स्थापनाएं देते हैं. मीरां के संबंध में वे उसकी दो छवियों को चिह्नित करते हैं जो सर्वाधिक चलन में रहीं. मीरां की दो प्रचलित छवियां उसकी रहस्यवादी संत-भक्त और रूमानी कवयित्री की पारंपरिक छवि जिसे मध्यकालीन धार्मिक सांप्रदायिक चरित्र आख्यानों और उपनिवेशकालीन इतिहासकारों ने गढा है तथा दूसरी वंचित-उत्पीड़ित हाशिये की विद्रोही स्त्री की छवि जो लेखक के मत में कुछ वामपंथी आलोचकों और इधर के स्त्री विमर्शकारों की देन है. लेखक ने इन सभी छवियों से बनी मीरां का खंडन किया है तथा वे मीरां के स्वर को ‘हाशिए का स्वर’ नहीं मानते। इस अध्याय में माधव हाड़ा लिखते हैं: ‘मीरां पारंपरिक अर्थ में संत-भक्त नहीं थी, उसने राजसत्ता और पितृसत्ता के विरुद्ध अपने विद्रोह को भक्ति के आवरण में व्यक्त किया, जिसके पर्याप्त साक्ष्य उसकी कविता में हैं।’ इन निर्मित छवियों के कारण मीरां के भौतिक स्त्री अस्तित्व का अनुभव और संघर्ष अनदेखा रह गया है. मीरां संत भक्त से पहले एक स्त्री है, जो अन्याय और दमन के प्रतिरोध में खड़ी है। उसका यह प्रतिरोध असाधारण और हाशिए का प्रतिरोध नहीं है। यह भारतीय समाज की निरंतर गतिशीलता का एक रूप है. औपनिवेशिक प्राच्यवाद और वामपंथियों और स्त्रीवादियों द्वारा गढ़ी गई मीरां की छवि का खंडन करते हुए वे लिखते हैं “मीरां की कविता में जो सघन अवसाद और दुख है उसका कारण पितृसत्तात्मक अन्याय और उत्पीड़न नहीं था। यह खास प्रकार की घटना-संकुल ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण था, जिनमें मीरां को एक के बाद एक अपने लगभग सभी परिजनों की मृत्यु देखनी पड़ी और निराश्रित होकर निरंतर एक से दूसरी जगह भटकना पड़ा.” ये कथन भले ही आलोचक की स्थापना को विरोधाभासी बनाता हो किन्तु यह विरोधाभास तथ्यों एवं स्रोतों से उपजा है चूँकि मीरां की कविता में व्यवस्था के प्रति असंतोष, नाराज़गी और विद्रोह का जो उग्र और मुखर स्वर मिलता है, वो उसको उसके समकालीन संत-भक्तों से अलग सिद्ध करता है. आलोचक के अनुसार मीरां की कविता इस मामले में कुछ हद तक कबीर से भी आगे है. कबीर एक अमूर्त व्यवस्था को चुनौती देते हैं, जबकि मीरां एक साक्षात और जीवित शत्रु से लोहा लेती दिखती है. उसका विद्रोह उस राज, धर्म और लोक सत्ता के विरुद्ध है, जो शत्रु के रूप में उसके सामने, उसके समय में और उसके स्थान पर है. वह अपने शत्रु मेवाड़ के शासक को चुनौती हुई कहती है “तुम जावो राणा घर अपनो, मेरी-तेरी नहीं सरी.” सत्ता को ललकारने का उसका स्वर अक्सर बहुत उग्र और चुनौतीपूर्ण है।

आलोचक ने पांचवें अध्याय ‘कैननाइजेशन’ में मीरां के प्रतिमान बनने एवं इस छवि निर्माण की लम्बी परंपरा की ओर संकेत किया है. इतिहास में मीरां की रहस्यवादी और रूमानी संत-भक्त और कवयित्री छवि का बीजारोपण उपनिवेशकाल में लेफ्टिनेंट कर्नल जेम्स टॉड ने किया, यह एक तरह से मीरां का कैननाइजेशन था. मीरां की यह छवि यथार्थपरक और इतिहाससम्मत नहीं थी. इसमें उसके जागतिक अस्तित्व के संघर्ष और अनुभव को अनदेखा किया गया था. मीरां के इस छवि निर्माण में यूरोप के राजनीतिक और सैद्धांतिक हितों और राजपूताना के सामंतों और उनके अतीत के संबंध में टॉड के व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी. इसी प्रकार पुस्तक के छठे अध्याय ‘छवि निर्माण’ में लेखक गीता-प्रेस, डायमंड पॉकेट बुक्स, अमर चित्रकथा, फिल्मों, भजन-संग्रहों के फ्लैप तक पर अंकित मीरां की विभिन्न छवियों की पड़ताल करते हैं. आजादी के बाद शिक्षा प्रसार हुआ, मुद्रण की तकनीक से पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं की उपलब्धता बढी और सिनेमा, रेडियो आदि नए प्रचार माध्यमों का विकास हुआ, जिससे मीरां पारंपरिक निर्मित छवि के प्रचार-प्रसार में तेजी आई। गीता प्रेस से छपी पुस्तकों ने मीरां के ऐतिहासिक मनुष्य स्त्री रूप को दरकिनार कर उसका ऐसा आदर्श हिन्दू स्त्री रूप गढा है, जिसने उनके अनुसार भारतवर्ष, हिन्दू जाति और नारी कुल को पावन और धन्य कर दिया. उन्होंने ऐसा करने के लिए नाभादास, प्रियादास आदि द्वारा वर्णित मीरां विषयक जनश्रुतियों के उपयोग साथ कुछ मौलिक उद्भावनाएं अपनी तरफ से भी कीं। अधिकांश लोकप्रिय ऑडियो कैसेट्स-सीडीज में भी मीरां की ऐसी रचनाएं संकलित की गई हैं, जो उसके भक्त और प्रेम दीवानी स्त्री रूप को ही पुष्ट करती है.

माधव हाडा की यह पुस्तक मीरां से जुड़े विषयों को शांत भले ही न करे किन्तु उन जड़ हो चुकी मान्यताओं को दरकाने का काम ज़रूर करती है. इस पुस्तक में ऐसा बहुत कुछ है, जो मीरां के जीवन और उसके समय के समाज को समझने के लिए एक नया प्रस्थान बिंदु बन सकता है. लेखक ने इस गहन शोध के लिए तथ्यों की ऐसी विपुल और विविधतापूर्ण सम्पदा एकत्रित की है जो पाठक में अकुलाहट पैदा करते हैं तथा ज़रूरी सवाल खड़े करती है. वे अपने शोध और निष्कर्षों में पुरातनपंथी और अतीताग्रही नहीं दिखाई पड़ते बल्कि लोक जीवन के प्रति उनका अनुराग इस अध्ययन को प्रभावी और पठनीय बनाता है. मीरा की जिंदगी से जुड़े प्रवादों, जनश्रुतियों और ऐतिहासिक सचाइयों का विवेचन करती यह पुस्तक विभिन्न दृष्टिकोणों से गढ़ी गई अनेक मीरांओं में से सबसे प्रामाणिक छवि वाली मीरां की तलाश में एक नए विमर्श की शुरुआत है. 



मीरां का जीवन और समाज
पचरंग चोला पहर सखी री
लेखक: माधव हाड़ा
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन
मूल्य: 375 रु.

Monday, January 5, 2015

इतिहास बनने से इनक़ार करती कविता: ‘अँधेरे में’

मुक्तिबोध 


  


‘मैं विचरण करता-सा हूँ एक फैंटेसी में/ यह निश्चित है कि फैंटेसी कल वास्तव होगी.’[1]



और यह आज वास्तव हो चुकी है. वस्तुतः एक समर्थ कवि की विशेषता होती है कि वह समय के आर-पार देख सकता है. यह आर-पार देखने की सामर्थ्य उसे अपने युग में गहरे धंसकर अपने युग के यथार्थ को पकड़ने से मिलती है. 'अँधेरे में' कविता के सन्दर्भ में डॉ नामवर सिंह ने जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास ‘1984’ को याद किया है जो अब फैंटेसी में रहकर एक जीती-जागती सच्चाई बन गया है. ‘अँधेरे में’ का जो दुःस्वप्न छठे दशक में फैंटेसी लगता था वह हमारे समय का नितांत फैंटेसीविहीन घोर यथार्थ है.[2] मुक्तिबोध मूलतः आत्मसंघर्ष और आत्म-साक्षात्कार के कवि हैं. उनका यह साक्षात्कार और संघर्ष नई कविता के अधिकाँश कवियों की तरह ‘आत्म’ या ‘स्व’ तक सीमित न होकर समाज के संघर्ष और जगत साक्षात्कार की ओर उन्मुख रहता है. उन्होंने छायावाद की सीमाएँ लांघकर, प्रगतिवाद से मार्क्सवादी दर्शन लेकर, प्रयोगवाद के अधिकाँश हथियार संभाल सब वादों और पार्टियों से ऊपर उठकर एक स्वतंत्र कवि के रूप में मानवतावादी परंपरा को बहुत आगे बढ़ाया.[3] उनकी कविता ‘अँधेरे में’ छपने के पचास साल पूरे होने को है, इस पचास साल पूरे होने के क्या अर्थ हैं? कविता के जन्म के समय रचयिता और कविता दो रहते हैं उसके बाद वह अपने रचयिता से मुक्त हो जाती है.[4] इसी क्रम में ‘अँधेरे में’ कविता के भीतर भी समय प्रवेश कर चुका है, और उसने इतिहास बनने से इनकार कर दिया है.

मुक्तिबोध की यह प्रसिद्द कविता ‘अँधेरे में’ 1957 से 1962 के बीच लिखी गई थी। ‘मुक्तिबोध रचनावली’ के सम्पादक नेमिचंद्र जैन के अनुसार 1962 में मुक्तिबोध ने इस कविता में अंतिम संशोधन किया था। 1964 के ‘कल्पना’ के नवम्बर अंक में यह कविता ‘आशंका के द्वीप: अँधेरे में’ शीर्षक से प्रकाशित हुई । बाद में केवल ‘अँधेरे में’ नाम से इसे ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ में शामिल किया गया।[5] ‘अँधेरे में’ के लिखे जाने के बाद पचास वर्ष बीत चुके हैं। ये पचास वर्ष मानव सभ्यता के इतिहास में युगान्तरकारी हैं। राष्ट्रीय स्तर पर इस कालावधि में स्वाधीनता-आंदोलन के नैतिक मूल्यों की नदी लगभग सूखने की ओर है। बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में आयातित भूमंडलीकरण के गर्भ से जन्मा मध्यवर्ग बाज़ार के मायावी गलियारों में विचरण कर रहा है। तकनीकी और सूचना क्रान्ति ने दुनिया को रंगीन चश्में से देखने का हुनर दे दिया है जिसमें बाहर की ज़िन्दगी में चकाचौंध है, लेकिन भीतर अँधेरा घिर रहा है। सोवियत संघ के विघटन के साथ समाजवादी व्यवस्था का पराभव और पूंजीवाद के सामने साम्यवादी चीन का आत्मसमर्पण इस दौर की अंतरराष्ट्रीय घटनाएँ है जिनका व्यापक असर विश्व राजनीति पर पड़ा है। सोवियत संघ के विघटन और शीतयुद्ध की समाप्ति के साथ अमरीका दुनिया का एक ध्रुवीय शक्ति केंद्र हो गया है।इन स्थितियों ने मनुष्य के सामाजिक-संबंधों, भाव-बोध और उसकी जीवन-दृष्टि को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है। इनका प्रभाव रचना और आलोचना दोनों पर पड़ा है.


यदि इन पचास वर्षों की यात्रा से पूर्व देखा जाए तो यह एक प्रदीर्घ कविता है जिसका आयाम बेहद विस्तृत है. यह स्वाभाविक है कि संरचनात्मक जटिलता के कारण इस कविता में कई अर्थ-छायाएँ भी बनती हैं. ध्यातव्य है कि इन अर्थों की भी शिनाख्त पर्याप्त समय के बाद और इस कविता के रचनाकार के इस दुनिया से चले जाने के बाद हुई. इस सन्दर्भ में आलोचक निर्मला जैन का कहना है इस विलम्ब का कारण उपेक्षा या उदासीनता नहीं बल्कि ऐतिहासिकता है. 1960 के बाद भारत के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में होने वाले परिवर्तनों की गति और विधि दोनों में निकट अतीत से भी बुनियादी अंतर था. स्थितियां जिस तेजी से और जिस रूप में मोड़ ले रही थीं, उन्हें देखते हुए बहुतों को मुक्तिबोध की क्रान्तिदर्शिता और सोच की पहचान करना और सराहना ज़रूरी महसूस हुआ होगा. इस ऐतिहासिक दबाव का जो सिलसिला उस समय शुरू हुआ था, वह आज भी क़ायम है. अपने समय का अतिक्रमण हर कालजयी रचना करती है. लेकिन आने वाले समय के इस कदर साथ चलने वाली रचनाओं की संख्या बहुत नहीं होती.[6]


‘अंधेरे में’ फैंटेसी में निर्मित कविता है। स्वाधीनता के सड़सठ और भूमंडलीकरण के बाईस वर्षों बाद भारतीय समय, समाज, सत्ता और राष्ट्र का अंधेरा फैंटेसीमय हो गया है। मध्यवर्ग का चरित्र ज्यादा पतित हो गया है। आम जनता से उसका लगभग संबंध विच्छेद हो गया है। सत्ता के साथ वह ज्यादा नाभिनालबद्ध है। बौद्धिक वर्ग पूर्णतः रक्तपाई वर्ग का क्रीतदास हो गया है। राष्ट्रवाद, वर्गचेतना, सर्वहारा, जनक्रांति आदि शब्द मध्यवर्ग के शब्दकोश से गायब हो गए हैं। पश्चिमी आधुनिकता और कॉरपोरेट पूंजी राष्ट्रराज्य से गठबंधन कर जनता के सामने तानाशाह की भूमिका में है। जनता का एक बड़ा हिस्सा सभ्यतागत विनाश के आखिरी कगार पर विस्थापन, आत्महत्या, दमन और संघर्ष में संलग्न है लेकिन मध्यवर्ग और क्रीतदास बौद्धिक वर्ग का उससे किसी तरह का सृजनशील जुड़ाव नहीं है। वैश्विक-सत्ता प्राकृतिक संसाधन और गांव-खेत के साथ मानव अवचेतन पर भी उच्च तकनीकी संस्कृति के माध्यम से कब्जा कर चुकी है। अस्तित्व और चेतना का पूरा इलाका राजनीति, बाजार और भाषा के पाखंड से पटा हुआ है। ‘अंधेरे में’ की फैंटेसी ने रहस्य और जादू के जटिल खेल में पूरी सभ्यता को उलझा दिया है.

1963 में मुक्तिबोध ने 'अग्न्येशका सोनी' नामक एक पोलिश महिला को ‘अँधेरे में’ भेजने से पूर्व एक पत्र में लिखा था कि उसमें एक अँधेरी आशंका का वातावरण है कि कहीं हमारे भारत में ऐसा-वैसा न हो.[7] आज के समय को देखते हुए यह काबिले-गौर है कि क्या मुक्तिबोध की वह आशंका और वह डर सच नहीं हो गया है औपनिवेशिक आधुनिकता के जिस दमनकारी, तानाशाह, एकांगी, यथार्थवादी, तर्कप्रधान, मशीनी एवं तकनीकी सत्यों को चुनौती देने के लिए मुक्तिबोध ने जिस फैंटेसी प्रविधि का प्रयोग किया. क्या वे सभी डर आज की उत्तर आधुनिकता से उपजी समस्याओं के दौर में उस स्वप्न-फैंटेसी से यथार्थ छवियों में परिवर्तित नहीं हो गए हैं? इन सभी उठते प्रश्नों के साथ यह भी जानना ज़रूरी हो जाता है कि ‘अँधेरे में’ की रचना के समय मुक्तिबोध की मनःस्थिति एवं परिस्थिति क्या थी? यदि उसका विश्लेषण किया जाए तो नागपुर में एम्प्रेस मिल के मजदूरों पर जब गोली चली थी, तो रिपोर्टर की हैसियत से मुक्तिबोध घटना-स्थल पर मौज़ूद थे. उन्होंने सिरों का फूटना और खून का बहना अपनी आँखों से देखा था. उनके अनुसार ‘अँधेरे में’ शीर्षक उनकी सशक्त और मार्मिक कविता उनके नागपुर जीवन के बहुत सारे सन्दर्भ अपने अन्दर समेटे हुए है...हरिशंकर परसाई ने अपने दो संस्मरणों में ‘अँधेरे में’ की रचना का सम्बन्ध एक दूसरी घटना से बतलाया है. वह घटना है मुक्तिबोध के द्वारा लिखी पुस्तक ‘भारत: इतिहास और संस्कृति’ का मध्यप्रदेश सरकार द्वारा प्रतिबंधित किया जाना...मुक्तिबोध कहते थे कि यह नंगा फासिज़्म है. लेखक को लोग घेरें, शारीरिक क्षति की धमकी दें. इधर सरकार सुनने तक को तैयार नहीं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जा रही है. गला दबाकर आवाज़ घोंटी जा रही है.[8] 'अंधेरे में' कविता की समकालीनता इस कसौटी पर और भी अधिक बढ़ गई है. इस दृष्टि से ‘अँधेरे में’ के साथ-साथ यह मुक्तिबोध की प्रतिबंधित पुस्तक ‘भारत: इतिहास और संस्कृति’ का भी पचासवां वर्ष है। मध्य प्रदेश की तत्कालीन सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाने के बाद जबलपुर न्यायालय द्वारा 1963 में किताब के प्रतिबंधित अंश हटाकर अतिरिक्त छापने के फैसले का यह पचासवां वर्ष मुक्तिबोध के आशंका के द्वीप भारत के अंधेरे को ज्यादा विचारणीय बना देता है। यह अनायास नहीं है कि ‘अंधेरे में’ की जब पचासवीं वर्षगाँठ मनाई जा रही है, तब मुक्तिबोध की इस प्रतिबंधित पुस्तक पर कहीं कोई बहस नहीं है। संभवतः इसका जवाब भी ‘अंधेरे में’ कविता में ही मौजूद है।


‘अँधेरे में’ कविता अपने सघन समकालीन यथार्थ से बराबर गुज़रते हुए जब पचास वर्ष की यात्रा तय कर रही है और आज भी बराबर प्रासंगिक बनी हुई है ऐसे में इस कविता की जीवटता के कारणों की शिनाख्त करना बहुत ज़रूरी हो जाता है. इन पचास सालों में आपातकाल, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता , उसपर सेंसरशिप, जगह-जगह दंगें, आगजनी, फासिस्ट शक्तियों का होता विस्तार और इस सबसे त्रस्त आम जन की दिन-दिन बढती बदहाली की गूँज ‘अँधेरे में’ कविता में बराबर सुनाई देती है. इन स्थितियों ने ही इस कविता को कभी इतिहास नहीं बनने दिया बल्कि यह वर्तमान को भी भेदती हुई भविष्य बयाँ करती कविता है जिसमें आज के मनुष्य की बदहवासी और निरुपायता को स्पष्ट रूप से महसूसा जा सकता है. ‘भागता मैं दम छोड़/ घूम गया कई मोड़’. क्या व्यक्ति पिछले पचास वर्षों से बदहवासों की तरह भाग नहीं रहा है, किससे भाग रहा है, अपने ही समाज से, अपने ही समाज में. सही मायने में यह कविता अपनी ज़मीन पर अपनी पीड़ा बयान करती कविता है जो दबे पाँव भीतर उतरती है.


एक ऐसे समय में जब उत्तर-आधुनिकता ने ‘केंद्र’ की सत्ता को अपदस्थ कर दिया है, किसी के केंद्रीय बिंदु की पहचान का प्रश्न पुराने संस्कार का अवशेष मात्र माना जा सकता है, इसके बावज़ूद केंद्र का प्रश्न बराबर उठता रहता है. यह भी कहा जा सकता है कि कविता का अपना कोई केंद्र नहीं होता. आलोचक उसमें अपने विचारानुसार केंद्र आरोपित करता है. देखा जाए तो आलोचक की विचारधारा, रुचि और पूर्वग्रहों की निर्मिति मात्र है केंद्र. इस दृष्टि से कविता के अनेक केंद्र हो सकते हैं और यही बात किसी भी कविता की रचनात्मक व्याप्ति और अर्थगर्भत्व का प्रमाण है. जो कविता निष्कर्षों की एकरूपता को प्रोत्साहित करती है- वह अल्पजीवी तो होती ही है, अपने समय के साथ उसका रिश्ता भी इकहरा और सपाट होता है. वह अपने समय का अतिक्रमण करने के सामर्थ्य से रहित एवं यथार्थ की पुनर्रचना के लिए अपेक्षित आवेग और कल्पनाशीलता से भी रहित होती है. ज़ाहिर तौर पर, ‘अँधेरे में’ ऐसी कविता नहीं है, इसका अर्थ की दृष्टि से कोई एक केन्द्रीय बिंदु न होकर बल्कि कई केन्द्रों से उपजी समवेत संवेदना का स्वर है. सभ्यता संकट के इस दौर में ‘अंधेरे में’ कविता पाठकों के लिए एक नई रोशनी का काम कर सकती है। लेकिन हिंदी आलोचना के मठवाद और गढ़वाद ने मुक्तिबोध की कविता ‘अंधेरे में’ का अंधेरा और बढ़ाने का ही काम किया है. दिलचस्प है कि हिंदी आलोचना का फैंटेसी जैसे कला रूप से भले ही संबंध न हो, लेकिन ‘अंधेरे में’ जैसी कविता की आलोचना के क्रम में उसका फैंटेसीमय स्वप्नचित्र एवं उसकी व्याख्याएं देखने लायक है। मुक्तिबोध के अधिकाँश समीक्षकों ने ‘अँधेरे में’ की व्याख्या करते हुए इसे ‘परमाभिव्यक्ति की खोज’, ‘अपनी या सामाजिक अस्मिता की तलाश’, ‘साधारण जन में विलय करने की चाह’, ‘निम्नमध्यवर्ग का आत्मसंघर्ष’, ‘अँधेरे से उजाले की यात्रा’, ‘विभाजित अस्तित्ववाद’, ‘रहस्यवाद-मार्क्सवाद के प्रभाव में लिखी गई एक अर्द्धविक्षिप्त व्यक्ति की आत्मभर्त्सना’ कहा है. समय-समय पर विभिन्न आलोचकों ने अपने-अपने मत भी दिए हैं. आधुनिकताबोध और नई समीक्षा से प्रभावित नामवर सिंह के लिए यह कविता भाषिक एवं साहित्यवादी अस्मिता की खोज है, उन्होंने ‘अँधेरे में’ को अस्मिता की खोज, एलियनेशन, सेल्फ एलियनेशन, लॉस ऑफ़ सेल्फ या आइडेंटिटी रीइफ़िकेशन जैसे शब्दों के सहारे समझाने की कोशिश की है. इसके विपरीत चंचल चौहान ने इसे सर्वहारा वर्ग में अपनी मध्यवर्गीय अस्मिता[9] का विषय बताया है तो विष्णु खरे को यह कविता व्यक्तिगत तथा विराट स्तरों पर संघर्ष लगती है.[10] आलोचक रामविलास शर्मा के लिए इस कविता पर एक ओर विकृत मनोचेतना के रहस्यवाद का प्रभाव दिखाई पड़ता है, वहीं दूसरी ओर सार्त्र के खंडित व्यक्तित्व के अस्तित्ववाद का। इस कविता को वे काव्य-नायक की अपराध भावना से घिरा पाते हैं जो आदम की अपराध भावना से भिन्न न पूरी तरह जनता के साथ है और न ही शोषकों के साथ.[11] वहीं प्रभाकर माचवे के लिए यह कविता प्रसिद्द चित्रकार पिकासो का प्रभाव लिए हुए ‘गुएरनिका इन वर्स’ है.[12] शमशेर के लिए यह कविता देश के आधुनिक जन इतिहास का स्वतंत्रतापूर्व और पश्चात का एक दहकता इस्पाती दस्तावेज है[13] जबकि डॉ गंगाप्रसाद विमल के अनुसार यह कविता मुक्तिबोध की आतंरिक संघर्ष की प्रतिक्रिया है जिसमें घोर अवसाद और घोर विद्रोह के तत्व हैं.[14] तो डॉ शिवप्रसाद मिश्र के लिए यह विशाल खंड पर आधारित प्रखर यथार्थबोध की कविता है जो केंद्रीय फैंटेसी और उसकी भीतरी परतों को प्याज के छिलकों की भांति अलग करती है.[15] इतना ही नहीं, अशोक वाजपेयी के लिए यह ‘खंडित रामायण’ है तो एक आलोचक को इसमें लंदन की रात दिखती है तो दूसरे कवि को जापानी फिल्म का जंगल। यह बात यहीं ठहर जाये तो गनीमत है। तिलस्मी खोह में और अधिक कुहासा बढ़ाने के लिए हिंदी आलोचना की हांफती हुई युवा पीढ़ी मुक्तिबोध पर किताब लिखती है तथा मार्शल लॉ लगाने वाली शक्ति से पुरस्कृत होती है। जितनी चेतना मध्यवर्ग की तथा फैंटेसी की टूटी बिखरी हुई नहीं होती है, उससे ज्यादा कविता की आलोचना की है। विचारणीय यहाँ यह भी है कि जन्म शताब्दी वर्षों को मनाने की कर्मकांडी प्रवृति से ग्रस्त हिंदी समाज पिछले कुछ समय तक जिस प्रकार नागार्जुन, अज्ञेय इत्यादि की जिस तल्लीनता से पूजा-पाठ कर रहा था, इस वर्ष से ‘आशंका के द्वीप: अँधेरे में’ के समय पर कवि मुक्तिबोध के भजन कीर्तन शुरू कर चुका है. ऐसी परिस्थिति में इस कविता की आलोचना करना पूरी हथेली आग में डालने जैसा काम है.



इन सबके बावज़ूद ‘अँधेरे में’ से गुज़रना एक काव्य यात्रा है. तरह तरह के अनुभवों के बीच वह कवि की न खत्म होने वाली रचनात्मकता की तलाश है जिसे उसने परमभिव्यक्ति नाम दिया है, और यह तलाश तब तक ज़ारी रहेगी जब तक समाज की क्रियाशीलता नहीं बढ़ती. यह कविता मध्यवर्ग की उसी निष्क्रियता पर प्रहार करती है. ‘अँधेरे में’ का द्वंद्व इलियट की ‘दि वेस्ट लैंड’ के माहौल की भी याद दिलाती है. अशोक वाजपेयी ने तो ‘अँधेरे में’ को ‘दि वेस्ट लैंड’ के समकक्ष रखकर ही देखा है.[16] यह कविता स्वप्न, फैंटेसी और यथार्थवादी अनुभवों के साथ चलने वाला कथानक, रक्तालोक स्नात पुरुष का साक्षात्कार, कवि को दी गई मौत की सज़ा, रात का विचित्र जुलूस, मार्शल लॉ जैसा वातावरण, तिलक मूर्ति से टपकता खून, विचित्र वेश में गांधी से भेंट, भविष्य शिशु का कवि को सौंपा जाना और गाँधी द्वारा जन शक्ति का आख्यान, कवि को पकड़ कर दी गई यंत्रणा, फिर रिहाई, अभिव्यक्ति के खतरों का अहसास और फिर उस परम अभिव्यक्ति की तलाश, सांस्कृतिक पुनर्जागरण, राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन और परवर्ती जीवन का एक विराट संश्लिष्ट चित्र है.[17]


इस कविता का आरम्भ इस तिलिस्मी खोह के रहस्यमय दृश्य से होता है, जो अपने प्रभाव में काफ़ी नाटकीय है- ‘जिंदगी के/ कमरे में अँधेरे/ लगाता है चक्कर/ कोई एक लगातार.’ यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य शब्द है ‘अँधेरा’ जो कमरे में भी है और जिंदगी में भी. यह अँधेरा गरीबी, उपेक्षा, अपमान, दारिद्रय सभी का प्रतीक है जिसमें मनुष्य की क्रांतिकारी चेतना खो गई है इस क्रांतिकारी चेतना को ही आलोचक नंदकिशोर नवल ने ‘सर्वहारा चेतना’ कहा है. इसी अँधेरे में एकाएक प्रकट होता ‘रक्तालोक स्नात पुरुष’. जिसे प्रारम्भ में उसकी विराटता से आश्चर्य के रूप में देखा जाता है किन्तु आगे चलकर यह भ्रम उसके फटे वस्त्रों, चेहरे की मलीनता और उसके वक्ष के घावों से टूटता है. उसके कष्टों से भरे चेहरे पर मुस्कान है, मुक्तिबोध का यह रक्तालोक स्नात पुरुष अपनी अँधेरी खोह से बाहर नहीं निकल पा रहा है. श्रीकांत वर्मा की धारणा है कि यह स्वाधीनता के बाद का भारतवर्ष है जिसका शरीर और मन क्षत विक्षत है. उसके चेहरे पर इतिहास की झुर्रियाँ, सीने पर गोली के घाव और अन्तरात्मा में बेचैनी है. यही रहस्यमय व्यक्ति वाचक के दरवाज़े की साँकल बजाता है और उत्तर न मिलने पर चला जाता है वाचक जब दरवाज़ा खोलकर बाहर आता है तो रात का पक्षी कहता है – ‘वह चला गया/ वह नहीं आएगा, आएगा ही नहीं/ अब तेरे द्वार पर/ वह निकल गया है गाँव में, शहर में/ उसको तू खोज अब/ उसका तू शोध कर/ वह तेरी पूर्णतम परम अभिव्यक्ति/ उसका तू शिष्य है/ वह तेरी गुरु है/ गुरु है....’ और यह व्यक्ति पूरी कविता में कहीं नहीं दिखाई देता है. कविता के अंत में वाचक को गलियों, सड़कों और लोगों की भीड़ में जाता हुआ दिखाई देता है. वाचक उसे पुकारना चाहता है पर पुकारता नहीं है. वह भीड़ में खो जाता है. यहाँ मुक्तिबोध मध्यवर्गीय कमजोरियों की ओर संकेत करते है वह रहस्यमय व्यक्ति एक नैतिक चेतना है जो मध्यवर्गीय सुरक्षाघेरे से बाहर निकलना नहीं चाहता. वाचक उसे दरवाज़ें पर साँकल की आवाज़ सुनकर भी अनदेखा, अनसुना कर देता है. वाचक आत्मस्वीकृति देते हुए कहता है ‘यह भी तो सही है कि/ कमजोरियों से ही मोह है मुझको/ इसलिए टालता हूँ उस मेरे प्रिय को/ कतराता रहता/ डरता हूँ उससे.’ वाचक मध्यवर्गीय उसी चेतना का प्रतीक है जो खंडित हो चुकी है जो एक सुरक्षित जीवन के गुरुत्वाकर्षण से बंधा हुआ है जिसने उड़ान के सपने तो देखे हैं पर साथ ही कह उठता है कि ‘मुझे डर लगता है ऊँचाइयों से’. यह वर्ग अपने ही वस्तुगत जीवन की सच्चाईयों के विरुद्ध एक सुन्दर दुनिया का सपना रचता है लेकिन इस सपने की कीमत नहीं देना चाहता. काव्य नायक के स्वप्न नायक में एकाकार होकर शुरू की गई जनक्रांति की मुख्य बाधा मध्यवर्ग की यही तमाशबीन की भूमिका है। उसकी तटस्थता और उदासीनता जिस बौद्धिक विक्षोभ से जनित है मुक्तिबोध को उस संकट की भी प्रामाणिक पहचान है, वे अपने स्वप्न में भी कबीर के समान जगे हुए हैं. वे अपने वैचारिक उत्तरदायित्व को समझते हुए उन विचारों को कर्म में न उतार पाने की पीड़ा महसूस करते है कि ‘मानो मेरे कारण ही लग गया मार्शल लॉ’. वे अपने समय के प्रति वफादार थे. उनका मानना था कि बौद्धिक वर्ग का जब श्रमजीवी वर्ग से रिश्ता कट जाता है तब वह ‘आमजन की बेहतरी के उद्देश्य’ से भटक जाता है। उनकी मान्यता है कि बौद्धिक वर्ग क्रीतदास है, उसके विचार किराए के हैं तथा अपनी काली करतूतों में वह इतना डूब गया है कि चेहरे पर स्याही पुत गई है। जब बौद्धिक वर्ग रक्तचूसक सत्ता से नाभिनाल बंध जाता है तब जनक्रांति पर संकट अवश्यंभावी हो जाता है। मुक्तिबोध लोकतंत्र और संवाद की शक्ति को रेखांकित करने में कहीं नहीं चूकते बल्कि इस कविता के ज़रिये तिलक, गाँधी से टॉलस्टॉय तक जाते हैं. जिसमें कोरा एकालाप नहीं है, मुक्तिबोध की दृष्टि में इस समाज में घिरे घुप्प अँधेरे में केवल अँधेरे का ही दोष नहीं है बल्कि उस सूर्य का भी है जो पीछे हट गया है.


इसी क्रम में ही मुक्तिबोध जनमुक्ति का प्रश्न राष्ट्रमुक्ति से जुड़ा हुआ पाते हैं तथा राष्ट्रमुक्ति और जनमुक्ति का संयुक्त प्रश्न मध्यवर्गीय चेतना की मुक्ति से जोड़ते हैं. मुक्तिबोध को इन सभी प्रश्नों का हल सभ्यता मुक्ति में दिखता है।[18] उन्हें मालूम है कि पूंजीवादी राष्ट्रराज्य दमनकारी है। वह पश्चिमी आधुनिकता की पीठ पर लदा हुआ है। इस कविता में मौजूद ‘पागल’ का रूप भी आधुनिकता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। आधुनिकता के उजाले में जिसे पागल साबित किया गया है अंधेरे में वह जागृत बुद्धि है। वस्तुत: आधुनिकता के भीतर विद्रोही, विसंगत, स्वप्नशील मनुष्य के लिए कोई स्थान नहीं है। उस कथित पागल विद्रोही को ज्ञात है कि पूरा मध्यवर्ग इतना मूल्यहीन है कि वह पेट भरने के लिए आत्मा बेचता है, भूतों की शादी में कनात सा तनता है, व्यभिचार का बिस्तर बनता है, दुखों के दागों को तमगों सा पहनता है, असंग बुद्धि और निष्क्रिय जीवन शैली के साथ दिन-रात अपने ही खयालों में मग्न रहता है। इसलिए आधुनिकता के उजाले ने उसे खारिज कर दिया है। बिना सभ्यता मुक्ति के मनुष्य को कथित पागलपन और विखंडित व्यक्तित्व से मुक्त नहीं किया जा सकता है। काव्य नायक हैरान है कि ऐसे कठिन वक्त में ‘सब चुप, साहित्यिक चुप हैं और कविजन निर्वाक/ चिंतक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं.’ सबके लिए ‘बदलाव’ एक ख्याली गप है, कोरी किंवदंती है। ऐसा इसलिए है—‘रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल बद्ध ये सब लोग/ नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे/ प्रश्न की उथली सी पहचान/ राह से अनजान.’ इन ताकतवर होती जा रही शक्तियों के बीच मुक्तिबोध की यह फैंटेसी, उनके भारत के भविष्य को लेकर जितने भी डर थे उन सभी को इन पिछले पचास वर्षों से लगातार प्रत्यक्ष घटते हुए देखा जा सकता है. सैनिकों को अपनी ओर बढ़ते देखकर कविता का नायक भागता है. इस विषय में नामवर सिंह का कथन है- मुक्तिबोध के काव्य-संसार की पृष्ठभूमि में असंदिग्ध रूप से ऐसी शासन-व्यवस्था या सत्ता है जो निहायत चालाक होने के साथ ही बेहद आतातायी है. कर्फ्यू और मार्शल लॉ इस सत्ता के आम तरीके हैं. प्रोसेशन में शामिल चेहरों को देखकर हैरानी से अधिक भय पैदा होता है. शहर के अपराध जगत के सरगना डोमा जी उस्ताद के साथ कलाकार, कवि, और बुद्धिजीवी सभी शामिल हैं. मुक्तिबोध ने इस प्रोसेशन को मृत्युदल की शोभा-यात्रा कहा है.[19] इस सत्ता के दो रूप हैं। वह अंधेरे में दमन करती है तथा उजाले में लोकतंत्र का कारोबार। जनक्रांति के दमन निमित्त मार्शल लॉ की यह यात्रा दिल दहला देने वाली है। सुनसान नगर की मध्य रात्रि में बैंड बाजे के साथ जुलूस चल रहा है। आधुनिक सभ्यता के अंधेरे में काव्य नायक को कोलतार की सड़क ‘मरी हुई खिंची हुई काली जिह्वा’ तथा खंभे पर टंगे बिजली के बल्ब ‘मरे हुए दांतों का चमकदार नमूना’ लगते हैं। चमकदार बैंडदल अस्थि रूप, यकृत स्वरूप, उदर आकृति और उलझी हुई आंतों के जालों जैसा विरूपित है। इस शोभायात्रा में—संगीन नोकों का चमकता जंगल/ चल रही पदचाप/ तालबद्ध दीर्घ पात/ टैंक दल, मोर्टार, आर्टिलरी/ सन्नद्ध/ धीरे-धीरे बढ़ रहा जुलूस भयावह—दृश्य जैसा है। इस जुलूस में कर्नल, ब्रिगेडियर, जनरल, मार्शल, सेनापति, अध्यक्ष, मंत्री, उद्योगपति सभी शामिल हैं। इससे ज्यादा डरावनी बात काव्य नायक के लिए यह है कि जुलूस में पत्रकार, प्रकांड आलोचक, विचारक, जगमगाते कविगण भी शामिल हैं। सत्ता के साथ मध्यवर्गीय बौद्धिक का यह अनैतिक, मूल्यहीन गठबंधन ही जनक्रांति में बाधक है। काव्य नायक की त्रासदी है कि दिन के दफ्तरों में नग्न हो जाने के डर से यह बौद्धिक वर्ग उसे अंधेरे में खत्म कर देना चाहता है। काव्य नायक को संकट की गहरी पहचान है—‘गहन मृतात्माएं इसी नगर की/हर रात जुलूस में चलतीं/परंतु दिन में/बैठकर हैं मिलकर करती हुई षड्यंत्र विभिन्न दफ्तरों, कार्यालयों, केंद्रों में, घरों में।‘ मार्क्‍स ने कभी कहा था कि क्रांति राष्ट्र करता है पार्टी नहीं।[18a] यह तथ्य आज ज्यादा सच है। आज भारत जैसा देश बाहरी औपनिवेशिक विकसित राष्ट्रों के बाजारवादी और हथियारवादी राष्ट्रवाद तथा आंतरिक उन्मादी सांप्रदायिक राष्ट्रवाद दोनों के दमन, शोषण का शिकार है। ‘अंधेरे में’ कविता इन दोनों कट्टर राहों से अलग जनता के जनराष्ट्रवाद का मार्ग सुझाती है। इसे कविता में तिलक और गांधी के रूपकों से समझना चाहिए। तिलक की प्रतिमा का हिलना, चिंता से मस्तिष्क का फटना तथा खून की धार का बहना राष्ट्रीय मुक्ति के क्रांतिकारी मसौदे का अगला संकेत है। कविता में गांधी के कंधों पर सवार शिशु वह स्वातंत्र्य शिशु स्वप्न है जो पहले तो सूरजमुखी के प्रकाश कण से भरे पुष्प गुच्छ में बदलता है तथा अंतत: काव्य नायक के कंधे पर भारी रायफल में तब्दील हो जाता है। आजादी के बाद राष्ट्र के सामने प्रश्न शेष थे—किसकी आजादी? कैसी आजादी? किसका राष्ट्र? कैसा राष्ट्र? क्या यह वही आज़ादी थी जिसका स्वप्न देखा गया था. इस कविता में इस स्वप्न के टूटने की इन सभी पीडाओं को महसूसा जा सकता है जिसमें आम जनता और मध्यवर्ग के असंतोष, आक्रोश और बेचैनी मौज़ूद है जिसका कारण अनगिनत राष्ट्रीय, अंतराष्ट्रीय घटनाएं थीं। उन सभी घटनाओं की छवि ‘अँधेरे में’ कविता में लगातार बिम्बित होती रहती है.


उस दौर में भी मुक्तिबोध के लिए भारतीय उपमहाद्वीप का प्रश्न, अधूरी आजादी का प्रश्न, औपनिवेशिक आधुनिकता का प्रश्न सबसे बड़ा प्रश्न था। मध्यवर्गीय काव्य नायक के सम्मुख छंद लय युक्त गीत पागल यूँ ही नहीं गाता है—‘जम गए, जाम हुए, फँस गए/ अपने ही कीचड में धँस गए!!.....अब तक क्या किया/ जीवन क्या जिया/ ज्यादा लिया और दिया बहुत बहुत कम/ मर गया देश, अरे, जीवित रह गए तुम.’. मुक्तिबोध के मध्यवर्गीय काव्य नायक की समस्या केवल बाह्य औपनिवेशिक आधुनिकता नहीं है बल्कि आंतरिक गढ़वाद और मठवाद भी है। सच्ची जनमुक्ति और जनक्रांति के लिए—अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे/तोडऩे होंगे ही मठ और गढ़ सब/पहुंचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार/तब कहीं मिलेगी हमको/नीली झील की लहरीली थाहें/ जिसमें कि प्रतिपल कांपता रहता/अरुण कमल एक। ‘अंधेरे में’ कविता में मौजूद प्रकृति की संवेदन सघनता तथा पुरानी इमारतों, मठों, गढ़ों की जर्जरता हमारे सामने एक वैकल्पिक सभ्यता निर्माण का मानचित्र उपस्थित करती है। गौरतलब है कि इस कविता को अंतिम रूप देने के दौरान मुक्तिबोध गंभीर तनाव से गुजर रहे थे। उनके अस्तित्व को बचाने वाली स्कूली पाठ्यक्रम की किताब ‘भारत: इतिहास और संस्कृति’ तत्कालीन सत्ता द्वारा प्रतिबंधित हो गई थी और इस प्रतिबंध मांग अभियान में मध्य प्रदेश की कम्युनिस्ट पार्टी भी शामिल थी। जिसने मुक्तिबोध को झकझोर कर रख दिया. मुक्तिबोध इसी सन्दर्भ में अभिव्यक्ति की निजता और स्वतंत्रता का प्रश्न उठाते हैं और एक अपराजित संकल्प के रूप में इस किलेबंदी को तोड़ती, उस पर प्रहार करती कविता ‘अँधेरे में’ रचते हैं. इस कविता में आगे चलकर एक मध्यवर्गीय कलाकार की असंग मृत्यु की ओर अर्थ संकेत किया गया है. जब शिशु फूल के गुच्छ से रायफल में बदलता है, ठीक उसी वक्त एक एकांतप्रिय कलाकार की हत्या हो जाती है। काव्य नायक अंधेरे में टार्च फैलाकर देखता है, तो उसे खून भरे बाल में उलझा माथा, भौंहों के बीच में गोली का सुराख, होठों पर कत्थई धारा, फूटा चश्मा दिखाई पड़ता है—सचाई थी सिर्फ एक अहसास/वह कलाकार था/गलियों में अंधेरे का हृदय में भार था। /पर कार्य क्षमता से वंचित व्यक्तित्व/चलाता था अपना असंग अस्तित्व/किंतु न जाने किस झोंक में क्या कर गुजरा कि/संदेहास्पद समझा गया और/मारा गया वह बधिकों के हाथों। वस्तुत: असंग अस्तित्व की खोज में जनविमुख कलाकार और कोई नहीं काव्य नायक का मध्यवर्गीय बौद्धिक अवचेतन है। कलाकार होने की पहली एवं महत्वपूर्ण शर्त है- जनसंघर्ष में हिस्सेदारी तथा व्यवस्था-परिवर्तन के व्यापक स्वप्न के साथ जुड़ाव. किन्तु आज का मध्यवर्गीय बौद्धिक कलाकार बाजार संस्कृति, सत्ता संस्कृति और जन संस्कृति, मार्शल लॉ और जनसंघर्ष, क्रांति और भ्रांति, आधुनिकता और बर्बरता, मध्यकालीनता और उत्तरआधुनिकता के विभ्रमकारी भंवर में इस कदर फंस गया है कि उसका असंग व्यक्तित्व भावी विध्वंस की ओर उन्मुख है। यह पुराना प्रश्न है कि कला कला के लिए होनी चाहिए या जीवन के लिए। नया जवाब यह है कि अब कला जीवन के लिए नहीं, जीवनयापन और आत्म विज्ञापन के लिए बन गई है। इस दृष्टि से भी मुक्तिबोध और ‘अंधेरे में’ की सार्थकता और बढ़ गई है।


यह कहा जा सकता है कि ‘अँधेरे में’ कविता के अर्थों के पाँच प्रस्थान बिंदु हैं- परम अभिव्यक्ति की खोज, आत्माभियोग, मध्यवर्ग की चरित्र मीमांसा, सत्ता और कलाकार की निजता का प्रश्न. इन पाँच बिन्दुओं से शुरू होने वाली अर्थवान यात्राएँ हमारे समय और समाज में बहुत दूर तक जाती हैं. ये यात्राएँ आपस में मिलती या जुडती भले ही न हो, किन्तु इनसे भारतीय जीवन का मानचित्र बनता है. मुक्तिबोध की यह कविता अपने पचास वर्ष पूरे कर चुकी है और यथार्थ में पूर्णतः घट चुकी है, और नित्य प्रति घट रही है जो अपने समय और समाज का भयंकर सच बन चुकी है जो लगातार इतिहास, और वर्तमान के फिर इतिहास बनने का, अतिक्रमण कर भविष्य का बयान करती चल रही है, इस कविता की शाश्वतता का सबसे बड़ा कारण यही है कि यह कविता निराशा की कविता नहीं संघर्ष की कविता है, इसके आत्मसंघर्ष की परिणति दैन्य में न होकर आत्मविस्तार में होती है, यह कविता संघर्ष के माध्यम से मानव अवचेतन पर हो रहे दमन, अधिग्रहण और अतिक्रमण का विरोध करती है, काल्पनिक अवचेतन में भाषा के नए सृजनशील संसार का आह्वान करती है तथा अधूरे यूटोपिया को पूर्ण स्वप्न में बदल देने का मानचित्र बनाती है एवं रास्ता सुझाती है. मुक्तिबोध ने लिखा है कि आलोचक साहित्य का दारोगा होता है।[18b] ‘अंधेरे में’ कविता आधुनिक सत्ता, व्यवस्था और सभ्यता से नाभिनाल बद्ध आलोचक की दरोगाई चेतना को अपने काव्य रूप, काव्य वस्तु और विचार धारा से कटघरे में खड़ा कर देती है—‘दुनिया न कचरे का ढेर कि जिस पर/ दानों को चुगने चढ़ा हुआ कोई भी कुक्कुट/ कोई मुर्गा/ यदि बांग दे उठे जोरदार/ बन जाए मसीहा.’ क्या वर्तमान दुनिया कचरे के ढेर में नहीं बदल गई है! तब क्या मुमकिन नहीं कि कोई मुर्गा जब चाहे ढेर पर दाना चुगने चढ़े और जोरदार बांग देकर मसीहा बन जाये! यह इतिहास बनने से इनकार करती रही है बकौल इंद्रनाथ मदान यह कविता पूरी होना नहीं चाहती, किनारे लगना नहीं चाहती। असल में मुक्तिबोध की यह कविता तट की न होकर मझधार की कविता है.[20] जोअपने अन्दर डूबने वाले को नए-नए अर्थ देती रही है और देती रहेगी.


“समय बीतने के साथ चीज़ें अतीत की ओर जाती हैं, लेकिन ‘अँधेरे में’ एक ऐसी कविता है जो अतीत की ओर नहीं, बल्कि भविष्य की ओर गई है. वह इतिहास बनने से इनकार करती रही और वक़्त में आगे चलती रही है.”[21] - मंगलेश डबराल



सन्दर्भ-सूची


[1] 'एक अंतर्कथा' कविता/ गजानन माधव मुक्तिबोध: प्रतिनिधि कविताएँ/ सं- अशोक वाजपेयी/ राजकमल प्रकाशन/ पृष्ठ संख्या- 60


[2] अँधेरे में: फैंटेसी शिल्प का औचित्य: पुरुषोत्तम अग्रवाल/ 'अँधेरे में' का महत्व पुस्तक / सं- डॉ राजेन्द्र कुमार/ सुमित प्रकाशन/ पृष्ठ संख्या- 58






[3] चाँद का मुँह टेढ़ा है की भूमिका/ शमशेर बहादुर सिंह/ पृष्ठ संख्या- 26





[4] प्रो. अपूर्वानंद, व्याख्यान 11 सितम्बर 2014/ रजा फाउण्डेशन सभागार








[5] डॉ रामेश्वर राय/ हस्ताक्षर हस्तलिखित पत्रिका/ सौजन्य हिन्दू कॉलेज/ पृष्ठ- 74





[6] अंतस्तल का पूरा विप्लव: अँधेरे में/ सं- निर्मला जैन/ राधाकृष्ण प्रकाशन/ पृष्ठ संख्या- 91




[7] अँधेरे में: श्रीकांत वर्मा/ तिमिर में झरता समय/ सं- राजेन्द्र मिश्र/ वाणी प्रकाशन/ पृष्ठ संख्या- 56


[8] निराला और मुक्तिबोध: चार लम्बी कविताएँ/ नंदकिशोर नवल/ राधाकृष्ण प्रकाशन/ पृष्ठ संख्या- 121,122,123


[9] मुक्तिबोध: प्रतिबद्ध कला के प्रतीक/ चंचल चौहान/ पृष्ठ संख्या- 107


[10] मुक्तिबोध: विष्णु खरे/ सं- विश्वनाथ प्रसाद तिवारी/ पृष्ठ संख्या- 117


[11] मुक्तिबोध का आत्मसंघर्ष और उनकी कविता- लेख/ 'धर्मयुग' पत्रिका / दिसम्बर 1964


[12] अवचेतना का अन्धकार: मुक्तिबोध का काव्य/ डॉ नरेंद्रदेव वर्मा/ पृष्ठ संख्या- 67


[13] चाँद का मुँह टेढ़ा है की भूमिका/ शमशेर बहादुर सिंह/ पृष्ठ संख्या- 26


[14] मुक्तिबोध का रचना-संसार/ गंगाप्रसाद विमल/ पृष्ठ संख्या - 76


[15] आधुनिक कविता और युग-दृष्टि/ शिवप्रसाद मिश्र/ पृष्ठ संख्या- 280


[16] 'हिन्दुस्तान' समाचार-पत्र/ अशोक वाजपेयी/ 7 सितम्बर 2014


[17] अँधेरे में: इतिहास संरचना और संवेदना/बच्चन सिंह/ सं- रामस्वरूप चतुर्वेदी/ अभिव्यक्ति प्रकाशन/ पृष्ठ संख्या- 17-20


[18], [18a], [18b] http://assichauraha.blogspot.in/2014/09/50.html 11:27 AM 08.01.2015




[19] 'अँधेरे में: पुनश्च' लेख से/ कविता के नए प्रतिमान/ नामवर सिंह/ राजकमल प्रकाशन/ पृष्ठ संख्या- 231


[20] एक अधूरी कविता जो...: इंद्रनाथ मदान/ अंतस्तल का पूरा विप्लव अँधेरे में/ सं- निर्मला जैन/ राधाकृष्ण प्रकाशन/ पृष्ठ संख्या- 17


[21] भविष्य की ओर जाती कविता: मंगलेश डबराल/ तिमिर में झरता समय/ सं- राजेन्द्र मिश्र/ पृष्ठ संख्या- 222




Saturday, December 13, 2014

विमर्शिया विमर्श

कुपाठ तैयार करवाओ  
फिर उसे छपवाओ
कागज़ को रद्दी बनवाओ
अपनी जय-जयकार करवाओ
फिर रहा-सहा विमर्श बिठवाओ
फिर दुनिया को ज़बरन पढ़वाओ
सा'हित्या' मार्केटिंगबाज़ों
शाहरुख खान से ख़िताब छीनकर लाना है
अब खाली हाथ वापस घर नहीं आना है।

कविता ऐसे भी लिखी जाती है



यह लेख दो वर्ष पूर्व मेरे मित्र शशि शेखर ने नरेश सक्सेना के दूसरे काव्य-संग्रह 'सुनो चारुशीला' पर लिखा था, जो बाद में 'जनसत्ता' 14 अक्टूबर 2012 अंक में छपा भी।

हिंदी की नई पीढ़ी के रचनाकारों में हमेशा कुछ लिखते और छपते रहने की होड़ को आजकल आराम से लक्षित किया जा सकता है. संभवतः इसके पीछे कारण यह डर है कि न लिखते रहने से कहीं उन्हें बीते युग का रचनाकार न मान लिया जाए. निश्चय ही ऐसी सोच और ऐसी होड़ साहित्य के स्वास्थ्य के लिए अच्छी नहीं है. कम लिखना पर सार्थक लिखना साहित्य के लिए ज्यादा बेहतर मूल्य है. कवि-नाटककार नरेश सक्सेना अपने पहले कविता-संग्रह 'समुद्र पर हो रही है बारिश' के लगभग पचास साल बाद अपने दूसरे कविता-संकलन के साथ दिखाई दे रहे हैं. 'सुनो चारुशीला' उनका नया कविता-संग्रह है. कविता-संकलनों की संख्या के लिहाज से नरेश मेहता बड़े कवि नहीं ठहरते. पर इस तरह के बड़प्पन की ख्वाहिश संभवतः खुद उनमें ही नहीं है. वे भले ही बहुत कम लिखते रहे हों पर उनका एक बड़ा पाठकवर्ग है जो उनकी कविताओं में हमेशा कुछ नया पाता है. उनकी कविताओं में जो गहरी संवेदनशीलता, मानवीय सरोकार, सौन्दर्यबोध, विचार और संवाद की क्षमता है वह लगातार पाठकों से जुड़ती है, उनसे सवाल करती है, अपने समय, समाज और सबसे बढ़कर अपनी मानवीयता पर गंभीरता से सोचने को प्रेरित करती है. उनमें पाठकों से यह आग्रह भी रहता है कि वे उनकी कविताओं में अपनी रुचि, लगातार विस्तृत होती अपनी समझ और समय और पाठ की जरूरतों के हिसाब से कुछ नए अर्थ जोड़ें. उनकी कविताओं में निहित यह आग्रह उनकी अपनी मौलिक विशेषता और शक्ति है. वहीं निरंतर एक सौन्दर्यमयता, आकर्षण, लालित्य और लय का प्रवाह उनकी कविताओं को अद्भुत रूप से पठनीय और संग्रहणीय बना देता है. ये विशेषताएं पाठकों के मन-मस्तिष्क पर अंकित हुए बिना, उन्हें प्रभावित किए बिना नहीं रह सकतीं.


इस संग्रह की भूमिका में नरेश सक्सेना लिखते हैं, "दसवीं के बाद हिंदी भाषा मेरा विषय नहीं रही. एम.इ. तक इंजीनियरिंग पढ़ी और पैंतालीस वर्ष तक इंजीनियरिंग ही की. ईंट, गिट्टी, सीमेंट, लोहा, नदी, पुल - मेरी रोजी-रोटी का साधन रहे हैं. सोच के केंद्र में रहे हैं. वे मेरी कविता से बाहर कैसे रह सकते हैं!" भूमिका से यह उद्धरण देना आवश्यक है क्योंकि जिन पाठकों को कविता में ईंट पत्थर जैसे शब्दों को पढ़ने की आदत नहीं है उन्हें इस संग्रह की कविताओं में न केवल ये शब्द मिलेंगे बल्कि इनपर केन्द्रित कविताएँ भी मिलेंगी. नरेश जी से पहले इनपर कम से कम हिंदी में किसी ने कविताएँ लिखी भी नहीं हैं. किसी रचनाकार की रचना में उसके अपने परिवेश व्यवसाय आदि से शब्दों का आना स्वाभाविक है पर फिर भी यह सतर्कता बरतनी चाहिए कि जब रचना में साहित्य की निर्मित दुनिया से बाहर के शब्द आएँ तो खटके नहीं. नरेश जी की 'ईंटें', 'सेतु', 'चट्टानें', 'मिट्टी' जैसी कविताएँ इस बात का बेहतर उदाहरण हो सकती हैं कि कैसे कविता जैसी नाजुक समझी जाने वाली विधा में नए प्रयोग किए जा सकते हैं. एक तरह से उनकी ये कविताएँ इस बात को पुष्ट ही करती हैं कि कविता किसी भी विषय पर हो सकती है, आवश्यकता है तो केवल एक सचेत विकसित संवेदनासंपन्न काव्यदृष्टि की. इस बात पर अलग से बात करने की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि नरेश जी की ये कविताएँ कविता को एक नई दिशा भी दे रही हैं, उसके क्षेत्र को बड़ा भी बना रही हैं और साथ ही कविता में नए प्रयोग की संभावनाएँ में सुझा रही हैं. वैसे भी आजकल हर क्षेत्र में 'नए' को लेकर कुछ अधिक ही क्रेज़ है, फिर कविता ही इससे क्यों बाहर रहे. इस संग्रह की 'सेतु' कविता एक नया ही भावबोध प्रस्तुत करती है. दो लय जब मिलकर एक हो जाती हैं तो वे स्वयं ही अपनी मुक्ति का मार्ग तलाश लेती हैं. इसलिए सेतु पर चलने से पहले सैनिक अपने क़दमों की लय तोड़ देते हैं. इसी तरह 'ईंटें-2' कविता है जहाँ मानव जीवन का सारा उजला-काला इतिहास ईंटों में सुरक्षित दिखाया गया है, "एक दिन सदियों पुराने अंधकार से/ बाहर निकल आएँगी/ रोशनी से भरी ईंटें/ और बतायेंगी अपने समय की/ घृणा और हिंसा और सहिष्णुता के बारे में". इन प्रयोगों से उनकी कविता की सम्प्रेषणीयता जितनी बढ़ी है, उसके प्रभाव में भी उतनी ही वृद्धि हुई है.


इन कविताओं में नरेश जी ने न केवल प्रकृति और मनुष्यता के सहज आत्मिक सम्बन्ध को समझा है बल्कि उसे उतनी ही सहजता से प्रस्तुत भी किया है. किसी भी रचनाकार के लिए यह बड़ी बात होती है कि वह चीजों को जैसे देखता और समझता है उसे उतनी ही सहजता के साथ प्रस्तुत भी करे. यह विशेषता केवल स्वभाव से नहीं आती, इसके लिए पर्याप्त श्रम भी करना पड़ता है. तभी तो कोई बड़ी और सार्थक रचना करना इतना सरल नहीं होता. इन कविताओं में प्रकृति न काल्पनिक है, न निर्जन और न ही स्वतःपूर्ण. कवि जब 'नीम की पत्तियों' को देखता है तो उन पत्तियों की हरियाली और उसके सौन्दर्य के साथ ही उसकी उपयोगिता भी उसके ध्यान में रहती है. यह अद्भुत सौन्दर्यदृष्टि है कि नीम की पत्तियों की सुन्दरता कोई बकरी के उस मीठे दूध में पाए जिसने नीम की पत्तियां खाई हैं. उन्हीं पत्तियों से माँ अपने शिशु को नीरोग भी करती है. नीम की पत्तियों का सच्चा सौंदर्य तो वही देख सकता है जो उसके गुणों को जानने के साथ ही उसके उपयोग की विधि भी जाने. जो किसी के सौन्दर्य में अपनी तरफ से कुछ नया जोड़ पाते हैं वही वास्तव में सौन्दर्य को समझते हैं. सुन्दरता नुमाइश की चीज भर नहीं होती, उन खूबसूरत पर बेजान पुतलों की तरह जिन्हें शोरूम में सजाते हैं या उन प्लास्टिक के फूलों की तरह जो आकर्षक तो लगते हैं पर जिनसे होकर गुजरने पर हवा महक नहीं उठती, न आस-पास के सारे वातावरण को सुगन्धित करती है. इस कविता के आलोक में यदि आज के समय को देखा जाए तो क्या दिखाई नहीं देता कि हमने कैसे स्वयं को यंत्र सा बना लिया है, कैसे हम उपभोक्ता तो हो गए पर उतने ही अनुत्पादक, सौन्दर्य के मर्म से कोसों दूर. 'पानी क्या कर रहा है' शीर्षक कविता इसलिए विशेष उल्लेखनीय है कि अपने कहने के ढंग में वह जितनी मौलिक और प्रभावशाली है अपनी कथ्य में उतनी ही संवेदनशील और विचारणीय. बेजान पानी में इतनी चेतना है कि कड़ाके की ठंड में सतह पर जमकर वह अपने अन्दर रहनेवाली मछलियों के लिए कवच का निर्माण करता है और इंसानों की दुनिया में हालात ये हैं कि "इस वक्त/ कोई कुछ बचा नहीं पा रहा/ किसान बचा नहीं पा रहा अन्न को/ अपने हाथों से फसलों को आग लगाये दे रहा है/ माताएं बचा नहीं पा रहीं बच्चे/ उन्हें गोद में ले/ कुओं में छलांगें लगा रही हैं". कवि ने इस तुलना के द्वारा आज की राजनीतिक-सामाजिक सच्चाई को सामने भी रखा है और साफ़ शब्दों में कह भी दिया है कि शर्मनाक तौर पर हम संवेदनात्मक रूप से ठंडे पड़ते जा रहे हैं.


नरेश सक्सेना की संकलित हर कविता एक नैतिकबोध रखती है. यह नैतिकबोध कुछ कविताओं में साफ़ दिखाई देगा तो कुछ में कहीं गहरे में समाहित. संभवतः यही वह केंद्र है जहाँ से कविता अपनी रचनात्मक ऊर्जा प्राप्त कर रही है और कुछ सार्थक करने की कोशिश में है. "चीजों के गिरने के नियम होते हैं! मनुष्यों के गिरने के/ कोई नियम नहीं होते./ लेकिन चीजें कुछ भी तय नहीं कर सकतीं/ अपने गिरने के बारे में/ मनुष्य कर सकते हैं". यहाँ देखेंगे तो दिखाई देगा कि इंसानों की नीयत का गिरना, ज़मीर का गिरना कवि ने साफ़ देखा है, वह उससे क्षुब्ध भी है पर वह यह भी भलीभांति जानता है कि अपनी नैतिकता की रक्षा करना मनुष्य के हाथ में है. इस 'गिरना' कविता की सबसे खूबसूरत पंक्तियाँ वे हैं जब कवि गिरने का सलीका बताता है, "गिरो प्यासे हलक में एक घूँट जल की तरह/ रीते पत्र में पानी की तरह गिरो." इस संकलन की एक बड़ी ही सार्थक कविता 'मुझे मेरे भीतर छुपी रोशनी दिखाओ' है. एक बच्ची का सवाल कवि को स्तब्ध कर देता है. बहती नदी में रोशनी छुपी होती है, टरबाइन पर गिरकर वह बिजली पैदा करती है. इस नियम से कर्मरत संघर्षरत इंसानों में भी रोशनी होनी चाहिए और अगर ऐसा नहीं है तो साफ़ है कि हमारी कर्मशीलता गायब है. बात थोड़ी काव्यात्मक लग सकती है पर यह सवाल तब भी रहेगा, कम से कम एक बार इसपर सोचना होगा. कविता या साहित्य की किसी भी विधा का एक उत्तरदायित्व होता है. जो कविताएँ मात्र वस्तुस्थिति सामने रखती हैं उनके यथार्थबोध में कोई खोंट अवश्य है. जिन कविताओं में वस्तुस्थिति को लेकर कोई कशमकश नहीं या जिनमें कोई सुन्दर सार्थक स्वप्न नहीं, वे कुछ और हो सकती हैं, कविताएँ नहीं हो सकतीं. यह वह दुनिया है जहाँ हर कोई यह बताता है कि वह कैसी दुनिया चाहता है, समाज में दिखने वाली कौन सी चीजें उसे अच्छी नहीं लगतीं, वह क्या कुछ बदल देना चाहता है. कविता परिवर्तन का हथियार नहीं तो वह क्षेत्र अवश्य है जहाँ परिवर्तन के स्वप्न देखे जाते हैं. कविता यदि ऐसी पहल कर पाती है तो उसके होने में एक अर्थ है, सारी मनुष्यजाति तो उसकी जरूरत है.


संकलन का जो शीर्षक है वह उसकी एक कविता भी है. 'सुनो चारुशीला' पर बात किए बिना इस संकलन का कोई मतलब नहीं है. अपनी दिवंगता पत्नी तो याद कर हिंदी में जो कुछ कविताएँ लिखी गयी हैं उनमें यह कविता कहीं न कहीं अपनी जगह ज़रूर रखती है. जीवन में इतनी सारी महत्वाकांक्षाओं का क्या अर्थ है, बहुत अधिक स्वप्न देखने का क्या मतलब है. अगर जीवन में आपके पास एक भी ऐसा इंसान है जो आपसे प्यार करता हो, जो आपके हमेशा पास नहीं तो कम से कम साथ हो तो इससे अधिक क्या चाहिए. यह प्रश्न किसी भावुकता में नहीं किया गया. यह एक ऐसी समझ है जो इन्सान को तब मिलती है जब जीवन भर दौड़ते-भागते रहने पर भी हाथ कुछ नहीं आता, भीतर का खालीपन मिट नहीं पाता. "अगर तुम हो तो क्या मैं बना नहीं सकता/ एक तारे से अपना आकाश ." नरेश जी ने साम्प्रदायिक तनाव और उन्माद को केंद्र में रखकर भी कुछ कविताएँ लिखी हैं. 'रंग' कविता का अंदाजे बयां इसमें बेजोड़ है. प्रकृति रंग जानती है, रंगों को पैदा भी करती है पर यह नहीं जानती कि कौन सा रंग हिन्दुओं का है और कौन सा मुसलमानों का. इन्सान पता नहीं ये फर्क कैसे पैदा कर लेते हैं. इस संकलन की प्रत्येक कविता कुछ नई सी लगती है और कुछ अपनी सी भी. इस संकलन को देखकर तो यह अवश्य कहना चाहिए कि नए उभरते कवियों को नरेश सक्सेना से सीख लेनी चाहिए कि कविता कैसे लिखी जाती है.


पुस्तक: सुनो चारुशीला (कविता-संग्रह) कवि: नरेश सक्सेना
प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ
मूल्य: 100 रुपए
शशि शेखर
कमरा संख्या- 111 , हिन्दू कॉलेज छात्रावास
मोबाइल: 09718053563