Wednesday, May 20, 2015

लघु-पत्रिका आंदोलन : संरचना और सरोकार



जिस दौर में भारतीय साहित्य समाज की निष्क्रियता से क्षुब्ध मुक्तिबोध लिख रहे थे - ‘सब चुप, साहित्यिक चुप हैं और कविजन निर्वाक/ चिंतक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं.’ इस चुप की पहचान कर उसी दौर में भारतीय समाज का एक और क्षुब्ध वर्ग प्रयोगशील एवं प्रतिरोधी रुख अपना रहा था. सामाजिक व्यवस्था और साहित्यिक जगत से असंतुष्ट यह पीढी वैचारिक रूप से व्यवस्था परिवर्तन के लिए संघर्षरत थी, इन्हें सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों से निकलने वाली पत्रिकाएं अपने यहाँ बहुत महत्व नहीं देती थीं. परिणामस्वरूप इन लोगों ने अपनी अभिव्यक्ति को स्वर देने के लिए अपने स्तर पर पत्रिकाएं निकालनी प्रारम्भ की. यहीं से लघु पत्रिका आंदोलन की शुरुआत हुई. इस लघु पत्रिका आन्दोलन की विकास यात्रा को समझने के लिए लेखक राजीव रंजन गिरि का प्रचुर परिश्रम से लिखा गया शोध-आलेख ‘लघु-पत्रिका आंदोलन : संरचना और सरोकार’ बेहद उपयोगी एवं ज्ञानवर्द्धक लेख है. यह लेख सौ से अधिक सन्दर्भों-तथ्यों की मदद से बेहद तार्किक एवं विश्लेषणात्मक ढंग से लिखा गया है. चूँकि हिंदी साहित्य की वैचारिक और सामाजिक सरोकारों वाली उद्देश्यपूर्ण रचनात्मकता के संरक्षण, संव‌र्द्धन और पोषण में लघु पत्रिकाओं की ऐतिहासिक भूमिका रही है. ये पत्रिकाएं एक मुहीम के तौर पर निकाली गई जिसकी एक लम्बी परम्परा बीसवीं सदी के उतरार्द्ध से प्रारम्भ होकर आज तक की यात्रा तय कर रही है. लेखक का मानना भी है कि “हिंदी साहित्य के अतीत और वर्तमान को पहचानने और विश्लेषित करने की कोई भी कोशिश, लघु-पत्रिकाओं की दुनिया पर नजर डाले बिना, पूरी नहीं हो सकती.” राजीव रंजन गिरि का यह लेख विचारधारा, प्रतिबद्धता, प्रतिरोध, समाज-रचना, व्यावसायिकता और रचनाशीलता जैसे प्रत्ययों में संशोधन की माँग के बीच में लघु पत्रिका संप्रत्यय तथा इसके सरोकारों से जुड़े सवालों की ज़रूरी पड़ताल करता है. लेखक ने प्रचलित धारणाओं पर विचार-विश्लेषण करते हुए इस आन्दोलन की वर्तमान स्थिति का जायज़ा भी लिया है. यह शोध-पत्र पाँच भागों परिभाषा का प्रश्न, आन्दोलन का निर्माण, संगठन और उसका दायित्व, आन्दोलन का आधार तथा स्वायत्तता के साथ सहयात्रा में बिखराव में विभक्त है जिनमें बारी-बारी से भले ही इस आन्दोलन की ज़रूरत पर विचार किया गया हो किन्तु चिन्तन के केंद्र में मूलतः इससे जुड़े दायित्व एवं प्रतिबद्धताएँ ही हैं.



लेखक ने ‘परिभाषा का प्रश्न’ भाग में इस आन्दोलन के भारतीय साहित्य तक पहुँचने से पहले के इसके अंतर्राष्ट्रीय फलक एवं परिदृश्य को सामने रखा है कि हिंदी साहित्य से पूर्व खुद को लघु-पत्रिका या लिटिल मैगजीन कहने वाले प्रकाशनों की शुरुआत द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरान फ्रांस के रजिस्टेंस समूह से मानी जाती है जिससे आगे चलकर सार्त्र भी जुड़े. रजिस्टेंस समूह की पत्रिका का तेवर सत्ता के खिलाफ था इसलिए उसे प्रतिरोध की आवाज होने की पहचान मिली. हिंदी में लघु-पत्रिका का मतलब लघु आकार, प्रसार का लघु दायरा और प्रकाशन की लघु संरचना तो है ही, खास तरह की चेतना से लैस प्रतिरोध की जमीन तैयार करने का सांस्कृतिक-राजनीतिक मर्म भी, इन पत्रिकाओं को, व्यावसायिक पत्रिकाओं से अलग करता है. इन तथ्यों की पुष्टि के लिए लेखक राजीव रंजन गिरि ने रामकृष्ण पाण्डेय एवं प्रियंवद के उद्धरणों को उदधृत किया है जिसमें प्रियंवद की दी परिभाषा लघु-पत्रिका की सूरत और सीरत स्पष्ट करती है- “विचारशीलता और प्रतिरोध लघु-पत्रिका के मूल स्वर हैं. विचारशीलता से आशय है, अपने समाज और समय के द्वंद्वों को गहराई से संबोधित करना. प्रतिरोध से आशय है मनुष्य विरोधी संरचनाओं को चिह्नित करके उनकी मुखालफत करना, इसमें भी मुख्यतः राजनीतिक वर्चस्ववादी सत्ता का. इसके अतिरिक्त लघु-पत्रिका के स्वरूप व उसकी भूमिका को लेकर हमारे पास पहले की कुछ प्रचलित अवधारणाएँ भी हैं. ये हमारी मदद करती हैं. जैसे कि लघु-पत्रिका अनियतकालीन हो, लघु आकार की हो, साधारण कागज पर साधारण रूप से छपी हो, कम संख्या में प्रकाशित और साथियों के सहयोग से वितरित हो, उसके पीछे कोई बड़ी पूँजी, प्रतिष्ठान, या सुव्यवस्थित बुनियादी ढाँचा न हो, व्यक्तिगत संसाधनों से निकलती हो, उसका ध्येय आर्थिक उपार्जन न हो, वह किसी विशेष विचारधारा और सत्ता-व्यवस्था का सक्रिय प्रतिरोध हो तथा वह बड़ी पूँजीवादी पत्रिकाओं के आतंक व वर्चस्व को चुनौती देती हो!”



एक आंदोलन के रूप में लघु पत्रिकाओं की शुरुआत मूल रूप से सातवें दशक से होती है. उस समय इनकी सीधी लडाई सरकारी और व्यावसायिक घरानों की पत्रिकाओं से थी. साहित्य में यह मोहभंग का दौर था. नेहरू के समाजवाद का तिलिस्म टूट चुका था, इसी दौरान नक्सलवादी आंदोलन की शुरुआत हुई, इसी के बाद साहित्य में व्यवस्था परिवर्तन की बात शिद्दत से उठने लगी. उस दौर में यह विचारना जरूरी हो गया था कि रचित साहित्य सामाजिक परिवर्तन का पक्षधर है या नहीं. इस लेख का दूसरा भाग ‘आन्दोलन का निर्माण’ भी इसी की शिनाख्त करता चलता है इस आन्दोलन के प्रारम्भ को लेकर भरपूर विवाद है कि कोई साठवें तो कोई सत्तर के दशक को इसके सूत्रपात के रूप में देखता है. वीर भारत तलवार ने इस परिघटना को साठ के दशक से माना है. यह स्पष्ट भी होता चलता है कि साठ-सत्तर के दशक में भले ही सचेत आंदोलन न चला हो, और पत्रिकाओं का संगठन भी न बना हो, पर वह अपने आप में एक आंदोलन जैसा ही था। वस्तुतः वह नक्सली आंदोलन द्वारा बनाए वातावरण का प्रतिफल था। लेखक का यह शोध आलेख यह भी स्पष्ट करता चलता है कि लघु पत्रिका आन्दोलन के तीन दौर हिंदी साहित्य की धारा में चिह्नित किए जाते हैं. पहला दौर साठ से सत्तर के दशक का वह असचेत आन्दोलन का दौर था जो साहित्यिक से अधिक सामाजिक था. दूसरा दौर जिसमें औपचारिक तौर से लघु-पत्रिकाओं के संगठन और सचेत आंदोलन का आरंभ 29-30 अगस्त, 1992 को कोलकाता में लघु-पत्रिकाओं के संपादकों की राष्ट्रीय संगोष्ठी से माना जाता है. कथाकार ज्ञानरंजन और आलोचक शंभुनाथ की पहल पर, निजी स्तर और छोटे समूहों के सहयोग से, पत्रिका निकालने वाले संपादकों-लेखकों की राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई थी जिसमें हिंदी के कई संपादकों-लेखकों ने हिस्सा भी लिया. तीसरा दौर वह माना गया जिसमें लघु-पत्रिका की अवधारणा का सरलीकरण हुआ और पाठक वर्ग घटने लगा. इस दौर में विकसित मीडिया ने व्यावसायिक पत्रिकाओं को पतनोंमुख तो किया पर साथ ही जो भयावह लीला आरंभ की, वह थी सांस्कृतिक प्रदूषण की जिसमें लेखक प्रदूषित और रीढ़-विहीन पत्रकारिता द्वारा हड़पे जाने लगे, यही मुक्तिबोध के दुःस्वप्न थे जो सच होते प्रतीत हो रहे थे, जो साहित्यकार को क्रीतदास की तरह परोस रहे थे. समकालीन रचनाशीलता के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी हुई. लघु-पत्रिका आंदोलन ने इनसे टक्कर ली और समकालीन रचनाशीलता को नई ऊर्जा के साथ व्यक्त होने का मौका मिला. इसी मायने में लघु-पत्रिकाएँ आज हमारे लिए पहले से भी ज्यादा जरूरी हो गई हैं, इनसान की इनसानियत को बनाए एवं बचाए रखने के संघर्ष में इनकी एक अहम भूमिका निश्चित तौर पर बनी हुई है. अरुण कमल ने लघु-पत्रिकाओं के सरोकारों को और अधिक व्यापक बताते हुए आलोचनात्मक और साहित्यिक विवेक की रक्षा का दायित्व भी इन्हीं पर सौंपा है.



राजीव रंजन गिरि तीसरे भाग ‘संगठन और उसका दायित्व’ में तथ्यों के साथ अपनी बात रखते हुए इस आन्दोलन की प्रवृतियों और निर्माण की परिस्थितियों के साथ-साथ इससे जुडी प्रतिबद्धताओं को भी इंगित करते चलते हैं. समय-समय पर वैचारिक क्रान्ति को लघु-पत्रिकाओं ने आधार प्रदान किया जिसके लिए इनका यह संज्ञान बचा रहना ज़रूरी था कि इनकी साहित्य समाज में क्यों ज़रूरत पड़ी तथा क्या ये अपने उद्देश्यों का, दायित्वों का निर्वहन कर रही हैं. इसके लिए समय-समय पर संगोष्ठियों का आयोजन किया जाने लगा. राष्ट्रीय स्तर पर ‘लघु-पत्रिका समन्वय समिति’ नाम से एक संगठन की घोषणा की गई जिसका दायित्व लघु-पत्रिकाओं के बीच तालमेल और साझा लक्ष्यों की दिशा में काम करना था ताकि मौजूदा साहित्य-विरोधी माहौल की चुनौतियों का मिलकर सामना किया जा सके और एक नए सांस्कृतिक जागरण की ओर बढ़ने में मदद मिले. ‘लघु-पत्रिका समन्वय समिति’ ने चुनौतियों के रूप में पश्चिमी साम्राज्यवाद, सांप्रदायिकता, जातिवाद, भाषिक पृथकतावाद, उपभोक्तावाद एवं सांस्कृतिक प्रदूषण का विरोध करते हुए साहित्यिक समाज को साथ लेकर इनके खिलाफ साझी लड़ाई का संकल्प भी लिया. इसी प्रकार ‘आन्दोलन का आधार’ भाग में भी लेखक ने लघु पत्रिकाओं के विकास-क्रम को व्याख्यायित करते हुए इस आन्दोलन को किस मिशन के तहत चलाया गया पर प्रकाश डाला है. लेखक ने वीर भारत तलवार और शम्भुनाथ के विचारों को स्पष्ट किया है. बकौल शंभुनाथ “हमारे मुख्य निशाने पर हैं बड़े संचार-माध्यम और इनके द्वारा फैलाया जा रहा सांस्कृतिक प्रदूषण.. लघु-पत्रिकाओं का ही यह काम है कि पढ़ने की संस्कृति के संरक्षण के लिए पाठक चेतना अभियान चलाएँ. वे सांस्कृतिक प्रदूषण का विरोध करें. इसके अलावा हमारे मुख्य निशाने पर हैं, सांप्रदायिक-जातिवादी पुनरुत्थान की ताकतें. हमें लड़ना है बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद और नए अंग्रेजीकरण से. लघु-पत्रिका आंदोलन के ये ही प्रमुख आधार हैं.”



'स्वायत्तता के साथ सहयात्रा में बिखराव' भाग में समन्वय समिति के उद्देश्यों में आये बिखराव के स्पष्ट संकेत मिलते हैं. समिति के संयुक्त संयोजक शंभुनाथ ने सम्मेलन में कहा कि 'हमारे जमाने की एक बड़ी विडंबना है कि संवाद के अत्याधुनिक साधन जितने बढ़ते जा रहे हैं, समाज में संवादहीनता भी बढ़ती जा रही है और लघु-पत्रिकाओं के संपादकों-लेखकों के बीच तो यह चरम पर है. आज चुनौतियों और आंदोलन के मुद्दे जितने स्पष्ट हैं, दुर्भाग्यवश बिखराव उतना ही ज्यादा है.' शम्भु नाथ की इस बात के साथ एक बात ज़रूरी रूप से जो सामने आने लगी है वह यह भी है कि पहले पत्रिका निकालना एक मिशन था जो आज लगभग व्यवसाय हो गया है. लघु पत्रिका आंदोलन अपनी विरासत को पीछे छोड काफी आगे निकल चुका है. आज पत्रिका निकालकर अर्थ और सत्ता दोनों को एक साथ साधा जा सकता है. भले ही ये सवाल प्रच्छन्न रूप में हो किन्तु इन पर विचार करना आज के समय में अत्यंत आवश्यक हो गया है. यह दौर लघु पत्रिका आन्दोलन के लिए आत्ममंथन के साथ साथ स्वयं को वर्तमान चुनौतियों के लिए तैयार करने का भी है. शम्भुनाथ आन्दोलन संगोष्ठी में वक्तव्य देते हुए कहते भी हैं- 'यदि कहा जाए कि हमारे युग की चुनौतियाँ भारतेंदु, प्रेमचंद युग तथा साठ के दशक से अधिक व्यापक हैं तो हमें यह भी कहना चाहिए कि परंपराओं और संभावनाओं की भी हम ज्यादा उर्वर धरती पर खड़े हैं. आन्दोलन से जुडी राष्ट्रीय संगोष्ठी के सामने संभवतः मुख्य दायित्व यही है कि हम अपनी परंपराओं की उर्वर धरती को पहचानें और कठोर से कठोर आत्म समीक्षा से गुजरें”





बहरहाल यह कहा जा सकता है कि लघु-पत्रिका आंदोलन का एक प्रमुख मुद्दा सांस्कृतिक प्रदूषण से बचने के लिए वैकल्पिक मीडिया के रूप में खुद को स्थापित करना है. लेखक राजीव रंजन गिरि का यह शोध पत्र बेहद संजीदगी एवं विश्लेषणात्मक ढंग से लघु पत्रिका आन्दोलन की संरचना को समझने एवं उसके सरोकारों को व्याख्यायित करने की दिशा में लिखा गया एक बेहद कारगर एवं ज्ञानवर्द्धक शोधपरक लेख है जिसके द्वारा प्रतिगामी मूल्यों-मान्यताओं के विरुद्ध एक वैचारिक आन्दोलन की पृष्ठभूमि से वाकिफ़ होने में मदद मिलती है.

Wednesday, May 13, 2015

VERDICT..!


Because I Do Not Want To Choose Between Life & Death
I Refused To Perish, I Denied To Escape
I'm Strong Enough In Pretending Of Being Strong
Disclosure With It, It's Imitation Today
And The Notion With It, Will Become Habit Someday 
Afterall
I AM NOT AN ESCAPIST.!!



अनुज की कहानी 'ओढ़नी' पर टीप



नवम्बर 2012 में आई कहानी 'अंगुरी में डँसले बिया नगिनिया...' से लम्बे इंतज़ार के बाद 'परिकथा' पत्रिका के मई-जून 2015 अंक में कहानीकार अनुज एक बार फिर से अपनी अगली कहानी 'ओढ़नी' के साथ पाठकों के सामने हैं. यह कहानी उनकी पिछली कहानियों से कथ्य के स्तर पर भिन्न होते हुए भी पिछली कहानियों की कड़ी में जुड़ती हुई समाज की झकझोर कर रख देने वाली विद्रूपताओं को सामने लाती कहानी है। कहानी पाठक से भरपूर संवाद करती हुई जातीय अस्मिताओं का सवाल उठाती है. सदियों से चली आ रही मैला ढोने की प्रथाओं के आड़ में उच्च जातीय गर्व किस प्रकार पनपता है और यहाँ से किस प्रकार शोषण की एक लम्बी या कहें अनवरत चलने वाली परंपरा की नींव रखी जाती है यह कहानी निर्मला और रतलाम के माध्यम से एक ओर मर्मस्पर्शी ढंग से मैला ढोने वाले शोषित दलित वर्ग की समस्याओं को बयान करती है तो दूसरी ओर चौधरी गगन सिंह संकरिया और मुंशी के माध्यम से समाज और व्यवस्था का नृशंस चेहरा सामने लाती है। कहानी के अंत में निर्मला की लाश से उड़ती सड़ांध इस व्यवस्था और उसके द्वारा दलित वर्ग के उत्थान के लिए किये जा रहे काग़जी अधिनियमों एवं सुधारों से उड़ती सड़ांध का प्रतीक है जिसमें मैला ढोने पर कागज़ी निषेध तो कर दिया गया है किन्तु क्रियान्वयन के नाम पर कोई आउटकम नहीं और उसपर भी भूमि और आर्थिक संसाधनों पर संकरिया जैसे लोगों का आधिपत्य क़ायम है जो अपनी ताक़त से किसी भी आन्दोलन का दमन करने से पीछे नहीं रहते और प्रतिरोधी स्वर का हश्र निर्मला जैसा कर दिया जाता है। इस कहानी में रतलाम जैसे चरित्र को, जो समाज के शोषित वर्ग के प्रति संवेदनशील मानवीय भाव रखने वाला और इस व्यवस्था-शोषक वर्ग के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाला है वह भी अपनी अंतिम परिणति में इस व्यवस्था के मध्य स्वयं को ठगा हुआ, अकेला और अर्द्धविक्षिप्त पाता है. असल में विक्षिप्त अवस्था में रतलाम जो ऊँची दीवार बना रहा है और कह रहा है- "देख डमरू, यहीं बनेगी मूर्ति, गाँधी जी के ठीक सामने, गाँधी जी के बराबर...सुन्दर-सी मूर्ति।" वह ऊँची दीवार और मूर्ति ही वह सपना है जो गाँधीजी ने देखा था। एक ऐसा समाज जिसमें कोई जात-पात न हो, ऊंच-नीच न हो, मनुष्यत्व के अधिकार से किसी को किसी की गंदगी न ढोनी पड़े..!! कहानीकार अनुज की यह कहानी समाज और व्यवस्था की नब्ज़ टटोलती और अपनी नर्व्स में इस असुन्दर होते समाज को सुन्दर बनाने का सपना लिए हुए है जो कथ्य शैली उद्देश्य में एक सफल एवं सार्थक कहानी है। 

अथ (साहित्य : पाठ और प्रसंग)

कहा जाता है कि आज के साहित्यिक विमर्शों की दुनिया में मौलिकता के नाम पर नया कुछ नहीं बचा है और जो नया होता है वह किसी बात को कहने का ढंग. यह ढंग भी एक विशेष तार्किक एवं विवेकसंपन्न दृष्टि से विकसित होता है. पिछले दिनों आलोचक राजीव रंजन गिरि की पुस्तक ‘अथ (साहित्य : पाठ और प्रसंग)’ प्रकाशित हुई. देखा जाए तो यह पुस्तक भिन्न भिन्न अवसरों पर लिखे गए साहित्यिक लेखों का संकलन है जिनमें भरपूर वैविध्य मौज़ूद है कुछ शोध आलेखों के रूप में हैं, कुछ समीक्षात्मक ढंग में तो कुछ टिप्पणी की तर्ज़ पर लिखे गए लेख हैं. इन आलेखों के बहाने लेखक ने हिंदी साहित्य के अतीत और वर्तमान को पहचानने और विश्लेषित करने का प्रयास किया है. भले ही ये आलेख अलग अलग स्थितियों और समय में लिखे गए हों किन्तु हिंदी साहित्य के समय क्रम को एकसूत्रता में आगे बढ़ाते हुए ये लेख भक्ति काल से प्रारम्भ होकर आधुनिक काल, प्रेमचंद, जैनेन्द्र से होकर गुज़रते हुए अज्ञेय, नामवर सिंह तथा वर्तमान साहित्यिक विमर्शों तक की यात्रा तय करते हैं. लेखक ने इन आलेखों की अन्विति को बनाए रखने के लिए इन्हें नौ खण्डों में विभाजित किया है. जिनमें भक्ति आंदोलन का अवसान और अर्थवत्ता, आधुनिकता की तलाश, साम्प्रदायिकता सत्ता और साहित्य, प्रेमचंद, जैनेन्द्र का रचना संसार, अज्ञेय, भाषा साहित्य और शिक्षण पर बहुत ही वाजिब ढंग से विचार किया गया है.



पहला खंड ‘सार सार को गही रखे’ के केंद्र में मूलतः भक्ति काल के अंतिम पर्व को इस कालखंड की रचनाओं के आलोक में समझने की कोशिश की गई है, इसी कड़ी में तुलसीदास, राधा एवं कबीरदास पर हुए अध्ययनों पर लेखक राजीव रंजन गिरि ने सूक्ष्म दृष्टि से विश्लेषणात्मक ढंग से अपने विचार प्रस्तुत किए हैं. भक्ति आन्दोलन का उदय अपने समय के गहरे तनाव, संघर्षों एवं अंतर्द्वंद्वों का परिणाम था. ‘भक्ति आन्दोलन का अवसान और अर्थवत्ता’ लेख में भक्ति काल को भारतीय सांस्कृतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण परिघटना के रूप में देखा गया है तथा इसके अवसान और उसकी वर्तमान अर्थवत्ता की अब तक हुए साहित्यिक अध्ययनों एवं शोधों के आधार पर विचार रखते हुए गहरी पड़ताल की गई है. यहाँ प्रश्न यह भी उठाया गया है कि जहाँ से भक्ति काल के पराभव को चिह्नित किया जाता है, वहां से परिस्थितियाँ असल में किस रूप में परिवर्तित हुई. यह भी शिनाख्त करने की कोशिश की गई है कि क्या भक्ति आन्दोलन के अवसान के पश्चात भक्ति साहित्य की रचना बंद हो गई. लेखक राजीव रंजन गिरि के शब्दों में “कला-संसार के भीतर की परिघटना के मद्देनज़र, यह कहना बेहतर होगा कि सांस्कृतिक इतिहास के एक ख़ास क्षण में, उस तरह की रचना का जो महत्व होता है, बाद में नहीं रह पाता,.. मनुष्य की चेतना के निर्माण में उसका वह महत्व नहीं रह जाता, जो तब था.” लेखक ने भक्ति काल के साहित्य पर अब तक हुए अध्ययनों में रामचंद्र शुक्ल, रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध, रांगेय राघव और मैनेज़र पाण्डेय की भिन्न भिन्न समय पर दी गई मान्यताओं को भी तथ्यों एवं तर्कों की कसौटी पर विचारा है. लेखक की चिंता के दायरे में यह ज़रूरी सवाल भी मौज़ूद है कि जिस कैनननाइजेशन की परम्परा के चलते, भक्ति काल के सभी कवियों को एक कवि के लिए निर्मित प्रतिमान एवं प्रविधियों के चश्मे से देखा गया. ऐसे में क्या एक कवि विशेष के लिए निर्मित आलोचना प्राविधि अन्य कवियों के साथ न्याय कर सकती है. भक्ति काल के इन अंतर्विरोधों की पड़ताल करते हुए ही समीक्षात्मक लेख ‘अंधश्रद्धा भाव से आधुनिकता की पड़ताल’ में तुलसीदास को लेकर चले आ रहे पूर्वग्रहों से असम्पृक्त कर श्रीभगवान सिंह की पुस्तक ‘आधुनिकता और तुलसीदास’ के आलोक में तुलसीदास को लेकर चली आ रही परम्परागत मान्यताओं पर विचार किया गया है जिसमें तुलसी साहित्य के सामंती मूल्यों के रक्षक होने जैसी धारणाओं को खारिज़ कर मध्यकालीन परिवेश की सीमाओं के बीच तुलसीदास के साहित्य के सकारात्मक पहलुओं का भी विश्लेषण किया गया है. यह पुस्तक आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य में एक संतुलित एवं तार्किक दृष्टि से तुलसी साहित्य को परखते हुए तुलसी को न केवल बढ़-चढ़कर ‘सामंत विरोधी’ मानती है अपितु मध्यकालीन बोध की सारी सीमाओं को नज़रंदाज़ कर तुलसीदास को अत्यंत आधुनिक घोषित करती है.



इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि इसका एक पूरा खंड हिंदी उर्दू के अमर कथाकार प्रेमचंद पर केन्द्रित है जिसमें नौ आलेख हैं. प्रेमचंद के माध्यम से हिंदी साहित्य में जिस प्रगतिशील आन्दोलन का सूत्रपात माना गया, यह खंड उसी के आलोक में प्रेमचंद की रचनाओं के जरिए उस दौर की देशकाल परिस्थितियों को समझने एवं व्याख्यायित करने का प्रयास करता है. प्रेमचंद जिस समय में साहित्य को जीवन की आलोचना के रूप में देख रहे थे, वे स्पष्ट तौर पर बदलते समय को बारीकी से देख व समझ रहे थे यही कारण है कि उनकी रचनाओं में उठाए गए मुद्दे आगे चलकर साहित्यिक विमर्शों की दुनिया का हिस्सा बनते है. प्रेमचंद अपने साहित्य में दलितों, पीड़ितों एवं वंचितों की समस्याओं को बयान करते हुए भी एक साहित्यकार की प्रतिबद्धताओं को बखूबी समझते है तभी वे साहित्यकार को समाज की आगे चलकर मशाल दिखाती सच्चाई के रूप में देखते हैं. उन्होंने साहित्यकार को स्वभावतः प्रगतिशील माना. लेखक राजीव रंजन गिरि ने प्रेमचंद की रचनाओं के माध्यम से प्रेमचंद की अपने समय के प्रति, उसके सरोकारों के प्रति प्रतिबद्धताओं की पड़ताल की है. प्रेमचंद की दलित जीवन पर लिखी कहानियों को केंद्र में रखकर लिखा गया लेख ‘दलित जीवन पर दृष्टि’ भी प्रेमचंद की कहानियों के माध्यम से दलित सवालों से संवाद करता लेख है जहाँ प्रेमचंद की कहानियाँ शुरू से आखिर तक दलित एवं स्त्री जीवन की समस्याओं को अपने चिंतन के दायरे में रखती हैं. एक ओर जब देश अंग्रेजों के विरुद्ध गुलामी से मुक्ति के लिए लड़ रहा है वहीँ दूसरी ओर भारतीय समाज एक दूसरे किस्म की गुलामी एवं प्रताड़ना की नींव रख रहा था. लेखक ने प्रेमचंद की कहानियों के माध्यम से ही सही पर पॉवर स्ट्रक्चर पर एक ज़रूरी और बुनियादी सवाल उठाया कि दलित जीवन की कहानियों के पात्रों की आर्थिक और सामाजिक बदहाली ही ऐसे अमानवीय जीवन एवं शोषण का तानाबाना बुनती है, इस आर्थिक और सामाजिक बदहाली में एक अनिवार्य रिश्ता है जो इस संक्रमित समाज और व्यवस्था की उपज है, प्रेमचंद के पात्र इन दोनों प्रकार के शोषण के शिकार हैं किन्तु प्रेमचंद वैचारिकी के स्तर पर अपने दलित पात्रों को आगे ले जाते हैं तथा उन्हें विकसित करते है जिसमें यदि वे शोषण को सहन करने वाले पात्र दिखाते हैं तो वे इस व्यवस्था के प्रति प्रतिरोधी स्वर दर्ज़ कराने वाले पात्रों को भी सामने लाते हैं. मंदिर, कफ़न, सद्गति, ठाकुर का कुआँ इत्यादि प्रेमचंद की ऐसी ही कहानियाँ हैं जिन्हें लेखक ने प्रेमचंद की दलित जीवन पर दृष्टि बिम्बित करने का आधार बनाया है. इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण लेख ‘प्रेमचंद का बाल साहित्य’ है जो इस पुस्तक को विशेष रूप से संग्रहणीय बनाता है. प्रेमचंद के साहित्यिक विमर्शों से जुड़े साहित्यिक सृजन पर भरपूर ध्यान दिया गया जिसके चलते प्रेमचंद का बच्चों के लिए रचा गया साहित्य अपेक्षाकृत कम चर्चित हुआ. लेखक ने बहुत ही ज़रूरी ढंग से इस साहित्य की ओर ध्यान आकर्षित करने वाला लेख लिखा है. प्रेमचंद का बाल साहित्य कर्तव्य परायणता, ईमानदारी, सदाचार, सच्चाई, निर्भीकता, आपसी प्रेम सौहार्द और निज विवेक के विकास की शिक्षा देता है. यह भी ध्यातव्य है कि प्रेमचंद ने अपनी साहित्यिक समझ के बीच बच्चों के लिए साहित्य रचने को हिक़ारत के भाव से न देखकर दायित्व के रूप में लिया जिसका उद्देश्य भारतीय बालकों को चेतनासंपन्न बनाना था.





इस पुस्तक का विशेष महत्व इसलिए भी दृष्टिगोचर होता है कि लेखक ने विभिन्न स्थितियों, मनःस्थितियों एवं समय की माँग के अनुरूप ये आलेख लिखे हैं जिसमें यदि भक्तिकाल पर, भारतेंदु पर तथा प्रेमचंद पर विचार रखे गए हैं तो इसमें वर्तमान साहित्य को भी समाहित किया गया है. ‘हीरा भोजपुरी का हेराया बाज़ार में’ लेख कथाकार संजीव के उपन्यास ‘सूत्रधार’ पर केन्द्रित है. यह उपन्यास भोजपुरी भाषा के लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के जीवन पर आधारित है. लेखक ने इस आलेख को दो भागों में लिखा है, पहले हिस्से में बजरिये ‘सूत्रधार’ कथाकार संजीव अपने कथा नायक भिखारी ठाकुर के जीवन और उस जमाने को जिस रूप में दिखाना चाहते हैं, उसे ज़ाहिर किया गया है. यह हिस्सा संजीव के पक्ष की व्याख्या है. दूसरे हिस्से में, संजीव के देखन और दिखावन का विश्लेषण करते हुए, उसमें निहित समस्याओं की तरफ इशारा किया गया है, ताकि कथाकार के पक्ष की जांच-पड़ताल हो सके. लेखक राजीव रंजन गिरि ने यह लेख भारतीय समाज की जटिलताओं के बीच ‘सूत्रधार’ को रखकर लिखा है जिसमें बेहद तर्कसंगत ढंग से उन्होंने इसकी समीक्षा की है.



गत वर्षों में साहित्यिक जगत में जिन विमर्शों ने जोर पकड़ा उनमें नारी अस्मिता को लेकर बहुत ही ज़रूरी आवाज़ उठाई गई. लेखक ने अपने लेख ‘कविता में स्त्री’ में कहा भी है कि “वैचारिक विमर्श में स्त्री को एक कोटि के तौर पर स्थापित करने के लिए स्त्री अस्मिता का अतिरिक्त रेखांकन आवश्यक है. स्त्री ही क्यों किसी भी अस्मिता की पहचान के लिए यह पहल ज़रूरी है.” लेखक ने इस लेख में हिंदी स्त्री कविता में अनामिका के अवदान का विश्लेषणात्मक विवेचन किया है. यह लेख अनामिका के बहाने ही सही, अपनी वैचारिक समझ को प्रगतिशील रखने वाले लोगों से प्रछन्न रूप में ही सही स्त्री को वर्ग के वृत्त से बाहर रखने का आग्रह भी करता है. यह लेख कई सवाल भी उठाता है जिसमें अनामिका तथा इस दौर के अन्य रचनाकार, उनकी रचनाधर्मिता को कठघरे में खड़ा करता है जहाँ आत्मचिंतन की आवश्यकता शिद्दत से महसूस हो रही है कि क्या इस पीढ़ी का रचनाकार कविता के नाम पर केवल विचार को उगल रहा है चूँकि यदि विचारों को कविता के रूप में तरलता से संपादित न किया जाए तो यह कविता विचार के स्तर पर कितनी कारगर होगी यह सोचना लाज़िमी हो जाता है. एक कमज़ोर कविता किसी महत्वपूर्ण विचार को भी क्षीण कर देती है. इस लेख के द्वारा अनामिका का कविता के ज़रिए स्त्री-विमर्श में कलात्मक हस्तक्षेप प्रकट होता है. स्त्री मुक्ति पर ही लिखा हुआ लेख ‘स्वप्न भी एक शुरुआत है’ भी अरुण कमल की कविता ‘स्वप्न’ को आधार बनाकर कविता जगत में स्त्रीवादी दृष्टिकोण एवं स्त्री मुक्ति के विषय पर हस्तक्षेप करता एवं साथ ही ‘सेक्स’ और ‘जेंडर’ की धारणाओं के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को प्रकट करता लेख है. जहाँ पितृसत्तात्मक समाज के बीच स्त्री की जद्दोजेहद प्रकट होती है. इस लेख में मुक्ति का स्वप्न है, भले ही आज वह यूटोपिया लगे पर इस उम्मीद के साथ कि कल यह हकीक़त होगा. इस लेख के अंत में वेणु गोपाल की एक कविता उदधृत है- “न हो कुछ भी/ सिर्फ सपना हो/ तो भी हो सकती है शुरुआत/ और यह एक शुरुआत ही तो है/ कि वहां एक सपना है.”



इस पुस्तक की एक बड़ी उपलब्धि इसका आठवां खंड ‘भाषा बहता नीर’ है. राजीव रंजन गिरि ने भाषा पर कई ज़रूरी बात रखी है. उनका मानना है कि जहाँ एक ओर हम हिंदी के प्रचार प्रसार विस्तार पर अभिमान करते देखे जाते हैं तो अगले ही क्षण हम ही हिंदी की बिगडती शैली, प्रकृति का मर्सिया पढ़ते दिखाई देते हैं. लेखक ने इसके कारणों की पड़ताल करते हुए इस पर प्रकाश डाला है कि हिंदी की बढती व्याप्ति का एक बड़ा कारक बाज़ार, मीडिया और फिल्म उद्योग है तथा इनकी माँग के अनुसार ही भाषा में समय समय पर परिवर्तन भी हुए किन्तु यह आत्मप्रलाप का विषय बना लेना उचित नहीं है. लेखक ने ‘आओ, हिंदी हिंदी खेलें’ लेख में यही विचार रखे है- “मौजूदा दौर में हिंदी एकवचन न रहकर बहुवचन का रूप धारण कर चुकी है. यानी अब हिंदी की नहीं हिन्दियों की बात करनी होगी.” लेखक की यह माँग गौरतलब है चूँकि जबतक किसी ख़ास माध्यम की हिंदी को ही निर्धारक मानकर शेष हिन्दियों को परखा जाएगा तो निश्चित तौर पर नतीज़ा गलत ही निकलेगा. लेखक ने भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी की आवश्यकता और उसके बदलाव और उसके बदलाव की ज़रूरत को चिह्नित किया है. लेखक का एक ज़रूरी लेख ‘आठवीं अनुसूची: भोजपुरी का हक’ में हिंदी के बरक्स लोक भाषाओं की अस्मिता का प्रश्न उठाया है जिसमें आठवीं अनुसूची में जगह बनाने वाली भाषाओं के लिए कोई निश्चित मानदण्ड एवं पात्रता का अभाव तो नज़र आता ही है साथ ही इस अनुसूची में स्थान बनाने की ज़द्दोज़हद करती भाषाओं में एक प्रकार का भाषाई तनाव भी प्रकट होता है जो निश्चित तौर से इस अनुसूची को, इसकी धारणा को ही समस्याग्रस्त एवं विवादास्पद प्रतिबिम्बित करता है.



यह आलोचना पुस्तक अपनी वैविध्यपूर्ण सामग्री एवं विविध विषयों पर लिखे इन विचारपूर्ण लेखों की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण, पठनीय एवं संग्रहणीय पुस्तक है. जो भिन्न भिन्न समयों को देखती, उनसे बात करती, सवाल उठाती, जिरह करती एवं संवाद स्थापित करती शोध प्रविधियों से लेस तथ्यपरक पुस्तक है.



पुस्तक: ‘अथ (साहित्य : पाठ और प्रसंग)

लेखक: राजीव रंजन गिरि

प्रकाशक: अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली



मूल्य: 750/-

Tuesday, May 5, 2015

मेरी प्रिय कहानियाँ



साहित्य की रचना एक जटिल प्रक्रिया भले ही हो पर इतनी भी नहीं कि उस पर कुछ कहा ही न जा सके। साहित्य-रचना में समय बुनियादी महत्त्व रखता है। रचनाकार एक सफल और सार्थक रचना तभी दे पाता है जब वह अपने मौज़ूदा समय को उसमें उकेर सके। ऐसे ही अपने मौजूदा समय से क़दमताल करते प्रसिद्द कथाकार स्वयं प्रकाश हैं जिनका कहानी-संग्रह 'मेरी प्रिय कहानियाँ' हाल ही में प्रकाशित हुआ है। इसमें उनकी दस कहानियाँ सम्मिलित की गई हैं जिनका चयन उन्होंने स्वयं किया है। उनकी कहानियों का बतकही का अंदाज़ इन कहानियों को विशिष्ट एवं प्रभावशाली बनाता है। कथाकार स्वयं प्रकाश की ये कहानियाँ भारतीय जीवन के हर्ष-विषाद, उथल-पुथल और मामूली समझी जाने वाली स्थितियों का सटीक विश्लेषण करती हैं जो जीवन सत्य की उन घटनाओं और परिस्थितियों को उदघाटित करती चलती हैं जिनका केंद्र सामान्य जन और उसका जीवन-संघर्ष है। इन कहानियों के भीतर कई महत्वपूर्ण सवाल उठाये गए हैं जो लैंगिक असमानता, साम्प्रदायिकता, पूंजीवादी वर्चस्व, वरिष्ठ नागरिकों की समस्या, स्त्री-हिंसा, बुद्धिजीवी अकर्मण्यता, भूमि अधिग्रहण क़ानून इत्यादि की पोल खोलते चलते हैं।

कथाकार स्वयं प्रकाश पिछले चालीस वर्षों से लिख रहे हैं। उनकी कहानियाँ यथार्थ को उसकी पूर्णता और कटुता के साथ प्रस्तुत करती हैं। उनकी इसी विशिष्टता के कारण उन्हें प्रेमचंद की परम्परा का महत्वपूर्ण कथाकार कहा गया किन्तु वे इस पुस्तक की भूमिका में स्वयं कहते हैं कि - "कहानी की दुनिया में मैं प्रेमचंद को पढ़कर नहीं, चेखव को पढ़कर आया था।" यदि गहरे स्तर पर देखा जाए तो स्वयं प्रकाश चेखव की कहानियों के समान ही वातावरण की सृष्टि करते हैं जिसमें प्रवेश करते ही पाठक खुद-बखुद सब समझने लगता है।

इस कहानी-संग्रह की पहली कहानी 'स्वाद' परिस्थिति की भयावहता को प्रकट करती कहानी है जिसमें समाज की जड़ों तक पहुँच गई हिंसा को बिम्बित किया गया है। जहाँ कहानी का शुरूआती संवाद ही दृष्टव्य है- "यह अफ़सर की जात होती ही ऐसी है। कर-कर के देखते हैं ये बत्तमीजी, कि देखें किस पर कितनी चलती है। और जिस पर चलती है उसी पर सवारी गाँठते हैं, जिस पर नहीं चलती उस पर चलाते भी नहीं।" अफसर की झाड़ की खीज़ से उत्पन्न यह कुंठित मन जब पत्नी व बच्चे बिट्टू तक पहुँचता है तो बिट्टू की इस परिणति के रूप में सामने आता है- "तकिए की, खिलौनों की पिटाई करने में बिट्टू को मजा आने लगा।...पहली बार चखा था हिंसा का स्वाद!...मारना मज़ेदार। कल जॉली की मारूँगा। परसों टुन्नू को। बहुत खुनी प्रतिक्रिया नहीं हुई तो रोज़ मारूँगा दोनों को। या किसी और को जो आसानी से मार खा ले।" कहीं न कहीं यह समाज में एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति पर, एक समूह का दूसरे समूह पर और एक जाति-धर्म का दूसरे पर वर्चस्व क़ायम करने की बढ़ती संस्कृति पर प्रहार है। 

कथाकार स्वयं प्रकाश की कई कहानियाँ बगैर कुछ कहे बहुत कुछ कह देती हैं ऐसी ही कहानी है 'एक यूँ ही मौत', जो व्यक्ति के जीवन के अकेलेपन की बेआवाज़ त्रासदी को तो प्रकट करती ही है साथ ही विद्वता की समाज में निरुपायता को भी चिन्हित करती है। इस कहानी का नायक जो बचपन में अपनी असाधारण प्रतिभा के लिए विख्यात हो गया था समय और समाज ने उसे एक असफल व्यक्ति में तब्दील कर दिया। यह इस समाज पर प्रश्नचिह्न लगाने वाली स्थिति है जिसमें जो व्यक्ति एक सफल और सार्थक जीवन जीकर समाज को बहुत कुछ दे सकता था पर वह एक निरर्थक जीवन जीते हुए एक नाराज़ आदमी की चुपचाप मौत मर गया। उसने कभी ऐसे समाज को बदलने का प्रयास भी नहीं किया जिसकी व्यवस्था ने उसे ऐसे जीने को अभिशप्त कर दिया। स्वयं प्रकाश ऐसी समूची अकर्मण्यता पर कटाक्ष करते हुए कहते भी हैं - "इस बेहूदा दुनिया की बेहूदगी समझने के बावज़ूद उसने इसके ख़िलाफ़ न तो आवाज़ उठाई, न उन लोगों को ढूंढने की कोशिश की जो उसी की तरह 'जानते' थे। क्योंकि तब ये सब मिलकर शायद-शायद इस दुनिया को कुछ कम बेहूदा बनाने की तरक़ीब कर सकते थे।"

'तीसरी चिट्ठी' के विषय में स्वयं प्रकाश स्वयं कहते हैं कि- यह मेरी अकेली कहानी है जिसमें मैंने बुरे आदमियों के बारे में बात की है और वहाँ भी अंत में अच्छाई फूट पड़ती है। यह कहानी मनुष्य में मनुष्यता के प्रकट होने की कहानी है जो साथ ही रजनी शर्मा नाम की छत्तीस वर्षीय युवती के माध्यम से परिवार तथा समाज में महिलाओं के प्रति बरते जा रहे अमानवीय और असभ्य व्यवहार का कच्चा चिट्ठा सामने रखती है। इसी प्रकार 'मूलचंद, बाप तथा अन्य' कहानी में भी कथाकार का प्रयास प्रत्येक व्यक्ति में अच्छाई देखने का रहा है।

लेखक का दायित्व होता है कि वह अपने समय की, उसके सरोकारों की शिनाख़्त करे, इस दृष्टि से कथाकार स्वयं प्रकाश कहानी में किस्सागोई के बहाने ही गहरी चिंताएँ प्रकट करते हैं। 'बिछुड़ने से पहले' में उन्होंने अपनी पर्यावरण के प्रति जागरूकता और चिंता दोनों को प्रकट किया है जिसमें उन्होंने मुनाफे के लिए पृथ्वी को उसके पर्यावरण को नष्ट करने की प्रवृति को उघाड़ा है यह कहानी बेहद आत्मीय-सी लगी जो हमें हमारी जड़ों से दूर होते जाने के अहसास से भर देती है। मानवीकरण के माध्यम से खेत व पगडंडी की बातचीत ग्रामीण स्त्री-पुरुष की तरह दिखाई गई है जिसमें पगडंडी की जगह आठ किलोमीटर की सड़क बन रही है और दोनों इस पर विकास और बदलाव की सार्थकता पर बातचीत कर रहे हैं - "एक दिन खेत ने पगडंडी से कहा - सुना तेरी जगह आठ किलोमीटर की सड़क बन रही है पक्की? चालीस फुट चौड़ी? डिवाइडर वाली? ...आज तक किसी सड़क ने खेत से दोस्ती की है जो मेरे से करेगी? ...दिल को कौन पूछता है मितवा! विकास तो होके रहेगा। पगडंडी ने उसांस छोड़ी। दोनों चुपचाप रोने लगे।" यह संवाद भूमि अधिग्रहण क़ानून के कागज़ी पुर्ज़ों पर सवालिया निशान लगाता है। 

'उस तरफ' कहानी में जैसलमेर के दिनों का वर्णन है जहाँ लेखक ने लगभग छह वर्षों का प्रवास किया। इस कहानी में कथाकार स्वयं प्रकाश ने पुरस्कार तथा तिरस्कार की मूल्यहीनता पर प्रकाश डाला है। जिसमें नख्त सिंह के द्वारा अपनी जान पर खेलकर बारह स्कूली बच्चों को आग के मुँह से बचाना। उस पर चटर्जी को दिए साक्षात्कार में उसका यह कथन कि- "यह सम्मान मुझे दे रहे हो तो इसका मतलब है, तुम आदमी से उस व्यवहार की उम्मीद नहीं रखते, जो मैंने किया।" भी काबिले-गौर है। लेखक की कहानियाँ वैविध्य से संपन्न हैं। कहानी 'कहाँ जाओगे बाबा?' में एक टीस जो मानो ऑटोरिक्शा चालक से नहीं, यह समय हमसे प्रश्न कर रहा है जो पूंजीवादी विकास की पीठ पर लादकर शोषण को लाया है। इसी प्रकार 'उल्टा पहाड़' साम्प्रदायिकता को एक नितान्त अलग कोण से देखती है। जिसमें सुमेर सिंह गहलोत का सुरूर साहब बनने का सफ़र जीवन की कलई खोलता चलता है। सुमेर सिंह के सुरूर साहब बनने से जहाँ मालियों को उनपर गर्व है तो शायरी की दुनिया का बड़ा नाम बनने पर मुस्लिम समाज उन्हें मुसलमान समझने लगता है, यहाँ यदि देखा जाए तो उर्दू को जातीय गर्व व इस पूर्वग्रह से देखना भी परिलक्षित होता है कि इस पर धर्म विशेष का ही एकाधिकार है। हालाँकि सुरूर साहब ने भी लोगोँ की यह ग़लतफ़हमी दूर करने का कभी कोई प्रयास नहीं किया और अंत इस पूरे प्रपंच का अंत इस रूप में होता है कि सुमेर सिंह गहलोत उर्फ़ सुरूर साहब को भुला दिया जाता है। अंत में सांखल साहब और सुरूर साहब की बातचीत का यह संवाद जो सुरूर साहब के द्वारा व्यक्त की गई पीड़ा को प्रकट करता है- "और वैसे भी उनके ज़ेहन पर जड़े खिड़की-दरवाज़ों के चौखट इतनी सख़्ती और पाबन्दी से सील हो चुके हैं कि उन्हें कोई नहीं खोल सकता। सिवाय वक़्त की ठोकरों के। और मैं वक़्त नहीं हूँ साहब। वक़्त के हाथों मारा एक इंसान हूँ।" यहाँ यह भी सोचना ज़रूरी हो जाता है कि जिन सुरूर साहब को भुला दिया गया वह एक पहाड़ के समान वज़ूद वाला व्यक्ति एक दलदल भरी खाई में बदल गया। इसके लिए कौन उत्तरदायी है- यह व्यवस्था, यहाँ का समाज या हम स्वयं।



स्वयं प्रकाश की कहानी 'ढलान पर' वरिष्ठ नागरिकों के साथ किये जाने वाले अवज्ञापूर्ण व्यवहार की शिकायत दर्ज़ करती कहानी है। साथ ही बढ़ती उम्र के साथ खुद को इस नई पीढ़ी के बीच स्वयं को 'मिसफिट' पाना जीवन की सबसे बड़ी जद्दोजेहद बन जाती है। इसमें इनके प्रति असम्मान प्रकट करते हुए 'इट वाज फन ओल्डमैन' जैसे जुमले फब्तियाँ अधिक लगते हैं जो जीवन को और अधिक अकेलेपन एवमं खालीपन की ओर ढकेल देते हैं। कथाकार स्वयं प्रकाश की 'अगले जनम' कहानी केवल स्त्री होने की पीड़ा को ही प्रकट नहीं करती बल्कि इस व्यथा और शोषण की प्रक्रिया की पहचान करती हुई लैंगिक-असमानता और हिंसा के विरुद्ध आवाज़ उठाने को प्रेरित भी करती है।

कथाकार स्वयं प्रकाश का यह कहानी-संग्रह जीवन-मूल्यों को अपने चिंतन के दायरे में रखता है जिसमें उनकी हर कहानी में कमोबेश यही चिंता बनी हुई है। उनकी इस पुस्तक को पठनीय इसकी अद्भुत रूप से सरल और प्रभावशाली भाषा भी बनाती है जो भाषिक आडम्बरों से मुक्त है तथा जिसका झुकाव देशज शब्दों की ओर अधिक है। इस रूप में यह पुस्तक पठनीय एवं संग्रहणीय है।



पुस्तक- मेरी प्रिय कहानियाँ 

लेखक- स्वयं प्रकाश 

प्रकाशक- राजपाल एंड सन्ज़

सामाजिक सरोकारों के सन्दर्भ में स्वयं प्रकाश की कहानियाँ



साहित्य की रचना एक जटिल प्रक्रिया भले ही हो पर इतनी भी नहीं कि उस पर कुछ कहा ही न जा सके। साहित्य-रचना में समय बुनियादी महत्त्व रखता है। रचनाकार एक सफल और सार्थक रचना तभी दे पाता है जब वह अपने मौज़ूदा समय और उसके सरोकारों को उसमें उकेर सके। स्वयं प्रकाश की कहानियाँ भारतीय जीवन के हर्ष-विषाद, उथल-पुथल और मामूली समझी जाने वाली स्थितियों का सटीक विश्लेषण करती हैं जो जीवन सत्य की उन घटनाओं और परिस्थितियों को उदघाटित करती चलती हैं जिनका केंद्र सामान्य जन और उसका जीवन-संघर्ष है। स्वयं प्रकाश पिछले चालीस वर्षों से लिख रहे हैं। उनकी कहानियाँ यथार्थ को उसकी पूर्णता और कटुता के साथ प्रस्तुत करती हैं। उनकी इसी विशिष्टता के कारण उन्हें प्रेमचंद की परम्परा का महत्वपूर्ण कथाकार कहा गया किन्तु वे स्वयं कहते हैं कि - "कहानी की दुनिया में मैं प्रेमचंद को पढ़कर नहीं, चेखव को पढ़कर आया था।" [1] यदि गहरे स्तर पर देखा जाए तो स्वयं प्रकाश चेखव की कहानियों के समान ही वातावरण की सृष्टि करते हैं जिसमें प्रवेश करते ही पाठक खुद-बखुद सब समझने लगता है।



कौन लेखक कितना बड़ा है इसकी पहचान सबसे पहले इस बात से ही होती है कि उसकी दुनिया कितनी बड़ी है। उसके लेखन के दायरे में मनुष्य और उसकी दुनिया का कितना बड़ा हिस्सा चित्रित हुआ है. उस दृष्टि से स्वयं प्रकाश बड़े लेखक ठहरते हैं. वे अपनी कहानियों में अनेक युगीन समस्याओं का वर्णन करते हैं, जिनका सीधा सम्बन्ध आमजन और उसकी बेहतरी की इच्छा से है. स्वयं प्रकाश कहानी में किस्सागोई के बहाने ही गहरी चिंताएँ प्रकट करते हैं। कहानी 'बिछुड़ने से पहले' में उन्होंने अपनी पर्यावरण के प्रति जागरूकता और चिंता दोनों को प्रकट किया है जिसमें उन्होंने मुनाफे के लिए पृथ्वी को, उसके पर्यावरण को नष्ट करने की प्रवृति को उघाड़ा है. यह कहानी हमें हमारी जड़ों से दूर होते जाने की ओर संकेत करती है और यदि जड़ें ही न हो तो हवाएँ बरगद तक को बहा ले जाये. मानवीकरण के माध्यम से खेत व पगडंडी की बातचीत ग्रामीण स्त्री-पुरुष की तरह दिखाई गई है जिसमें पगडंडी की जगह आठ किलोमीटर की सड़क बन रही है और दोनों इस पर विकास और बदलाव की सार्थकता पर बातचीत कर रहे हैं - "एक दिन खेत ने पगडंडी से कहा - सुना तेरी जगह आठ किलोमीटर की सड़क बन रही है पक्की? चालीस फुट चौड़ी? डिवाइडर वाली? ...आज तक किसी सड़क ने खेत से दोस्ती की है जो मेरे से करेगी? ...दिल को कौन पूछता है मितवा! विकास तो होके रहेगा। पगडंडी ने उसांस छोड़ी। दोनों चुपचाप रोने लगे।" यह संवाद भूमि अधिग्रहण क़ानून के कागज़ी पुर्ज़ों पर सवालिया निशान लगाता है। सन 2013 में भूमि अधिग्रहण विधेयक जिसका नाम बदलकर उचित मुआवजा तथा भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास, पुनर्स्थापन में पारदर्शिता का अधिकार विधेयक रखा गया, उसे 29 अगस्त 2013 को लोकसभा तथा 04 सितम्बर 2013 को राज्यसभा में संशोधनों के साथ पारित कर दिया गया.[2] यह कानून अंग्रेजी शासन के दौरान 1894 में लागू करीब 120 साल पुराने कानून का स्थान लेगा। लेकिन सड़क मार्गों के लिए ली जाने वाली उपजाऊ भूमि का उपाय तो इसमें भी कहीं नहीं है। सरकार अपने हाथ सदा खुले रखती है. इस भूमि पर सरकार द्वारा उसके स्वयं के लाभ, नियंत्रण, सार्वजनिक-निजी भागीदारी परियोजनाएं शामिल हैं लेकिन राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर राजमार्ग परियोजनाएं सम्मिलित नहीं है, साथ ही जनता के भविष्य की चिंता की आड़ में उपजाऊ भूमि का निजी कंपनियों को हस्तांतरण करना भी इस अध्यादेश का हिस्सा है। पगडंडी का लोप इस बात की पूर्व सूचना है कि खेत के अस्तित्व का भी अंत अब निकट भविष्य में ही निर्धारित है। यह विवशता दोनों अनुभव करते हैं, दोनों कमजोर हैं यानी उनसे संबंधित किसान। और जो बचा है, वह है- विकास के बावजूद उनकी वीरान और उजाड़ होती जिंदगी। अभी वर्तमान में चल रहा अन्ना आन्दोलन भी सत्ता और कॉर्पोरेट के इसी गठजोड़ की कलई खोल रहा है जहाँ किसानों के हितो को पूरी तरह से दरकिनार कर बाज़ार को केंद्र में लाया जा रहा है.


स्वयं प्रकाश की कहानियाँ कई बार पढने में जितनी सरलता का बोध कराती है उतनी ही ज्यादा वे भीतर झकझोरती हैं. वे पाठक से अपने समय और समाज की अभिज्ञता की मांग करती हैं। उनकी कहानी- ‘जंगल का दाह’ है जो पढ़ने में भी सुनने का-सा आनंद देती है। यह कहानी लोककथात्मक शैली में लिखी होने के साथ-साथ इसके पात्र आज के आधुनिक परिवेश और परिस्थितियों में ढले हुए हैं। धनुर्धर मामा सोन की प्रसिद्धि सुनकर राजकुमार का शिक्षा के लिए उनके पास आना, अभ्यास में सफल न होने पर मामा सोन को मारने की कोशिश करना जिससे उस विद्या का लाभ कोई और न उठा सके, मामा सोन, शिष्यों और वन के पशु-पक्षियों द्वारा मिल कर सैनिकों को खदेड़ना, और जाते-जाते उनके द्वारा जंगल में आग लगाना केवल कथा के क्रम को ही आगे नहीं बढ़ाते बल्कि मामा सोन के माध्यम से आदिवासी संस्कृति के लुप्त होते जाने की व्यथा को भी प्रकट करते हैं. किसी के हुनर को जब सत्ता चाहने लगती है तो वह मानती है कि जो अपना नहीं हो सकता वो दूसरे का भी नहीं हो सकता। सत्ता के इस रूप को इस कहानी में दिखाया गया है जो विस्थापन संबंधी वर्तमान संदर्भों से सम्पृक्त होकर इसे न केवल प्रासंगिक बनाता है वरन् एक लोककथा की शैली में कही जाने के कारण इसके कथ्य को सर्वकालिक भी बना देता है।[3] इस कथा का मुख्य पात्र ‘मामा सोन’ सम्पूर्ण आदिवासी संस्कृति का प्रतीक है। स्वयं प्रकाश कहानी का यहीं अंत नहीं करते, अपितु उसे आगे ले जाते है और कहानी को आज के सत्ता वर्ग के द्वारा आदिवासियों को उजाड़ने की संकेत-कथा बना देते है। कथा के अंत का संवाद महत्वपूर्ण है- "अफसोस कि न मामा सोन को बचाया जा सका न उनकी धनुर्विद्या को। जो वहाँ बचा वह बस राख ही राख थी। ...आज मामा सोन के वंशज शहर में बांस की टोकरियाँ, तार के छींके और गत्ते के तोते-चिड़ियाँ आदि बनाकर बेच रहे हैं। सुना है उनके इलाके में कोई बड़ा बाँध बन रहा है जिससे देश की बड़ी तरक्की होगीं। ...सुना है... मामा सोन के वंशजों और शिष्यों को जंगल से हकाल दिया गया है।" यह कहानी हमारी विकासशील सभ्यता की बर्बरता को सामने लाती है। यह लेखकीय हस्तक्षेप कहानी को अन्याय के इतिहास क्रम में रखते हुए उसे समकालीन राजनीतिक यथार्थ का एक पाठ बना देता है।


स्वयं प्रकाश अपने समय और समाज की तमाम तरह की विद्रूपताओं से पर्दा हटाते चलते है. 'उल्टा पहाड़' साम्प्रदायिकता को एक नितान्त अलग कोण से देखती है। जिसमें सुमेर सिंह गहलोत का सुरूर साहब बनने का सफ़र जीवन की परतें खोलता चलता है। सुमेर सिंह के सुरूर साहब बनने से जहाँ मालियों को उनपर गर्व है तो शायरी की दुनिया का बड़ा नाम बनने पर मुस्लिम समाज उन्हें मुसलमान समझने लगता है, यहाँ यदि देखा जाए तो उर्दू को जातीय गर्व व इस पूर्वग्रह से देखना भी परिलक्षित होता है कि इस पर धर्म विशेष का ही एकाधिकार है। हालाँकि सुरूर साहब ने भी लोगों की यह ग़लतफ़हमी दूर करने का कभी कोई प्रयास नहीं किया और इस पूरे प्रपंच का अंत इस रूप में होता है कि सुमेर सिंह गहलोत उर्फ़ सुरूर साहब को भुला दिया जाता है। अंत में सांखल साहब और सुरूर साहब की बातचीत का यह संवाद जो सुरूर साहब के द्वारा व्यक्त की गई पीड़ा को प्रकट करता है- "और वैसे भी उनके ज़ेहन पर जड़े खिड़की-दरवाज़ों के चौखट इतनी सख़्ती और पाबन्दी से सील हो चुके हैं कि उन्हें कोई नहीं खोल सकता। सिवाय वक़्त की ठोकरों के। और मैं वक़्त नहीं हूँ साहब। वक़्त के हाथों मारा एक इंसान हूँ।" यहाँ यह भी सोचना ज़रूरी हो जाता है कि जिन सुरूर साहब को भुला दिया गया वह एक पहाड़ के समान वज़ूद वाला व्यक्ति एक दलदल भरी खाई में बदल गया। इसके लिए कौन उत्तरदायी है- यह व्यवस्था, यहाँ का समाज और उसका धर्म या हम स्वयं। यह लेखक की साम्प्रदायिकता पर अकेली कहानी नहीं है बल्कि स्वयं प्रकाश ने साम्प्रदायिकता पर कई कहानियाँ लिखी, लेकिन प्रत्येक एक भिन्न दृष्टिकोण से. ‘पार्टीशन’ भी उनकी एक ऐसी ही कहानी है जो पूरी तरह से दंगो की पृष्ठभूमि पर लिखी कहानी नहीं है किन्तु इस विषय पर लिखी एक बेजोड़ कहानी है जिस पर बाद में टेलीफिल्म भी बनी. बहुत ऊपरी अर्थों में यह कहानी कुर्बान भाई के फिर से मस्जिद जाने की कहानी है. कुर्बान भाई लाखों ऐसे मुसलमानों की तरह भारत में रह गया मुसलमान है जो जान-बूझकर मौका होते हुए भी पाकिस्तान नहीं गए. दंगे हो गए, पार्टीशन हो गया, दुकान जला दी गई. रिश्तेदार पाकिस्तान भाग गए. दो भाई क़त्ल कर दिए गए. कहाँ जाए? कहाँ सर छुपाए? क्या पाकिस्तान चले जाए? कुर्बान भाई को अच्छे लगने वाले बहुत से लोग नहीं गए, तो कुर्बान भाई क्यों जाते? एक स्तर पर यह कहानी भीष्म साहनी की ‘अमृतसर आ गया है’ का विस्तार भी है और मुक्ति भी. यह घटना की नहीं, प्रक्रिया की कहानी है. सुधीश पचौरी के शब्दों में- “कुर्बान भाई ‘अमृतसर आ गया है’ का मानो वह बंदा है जो चलती रेल में दो गठरियाँ लेकर चढ़ने की कोशिश कर रहा है, जिसे बाबू लगने वाले उस कमजोर आदमी ने बाहर फेंक दिया है मगर जो फिर भी बच गया है.!! लेखक ने एक सामान्य अल्पसंख्यक कुर्बान भाई के संकट को यह कहकर व्यक्त किया है- "स्थिति मगर यह थी कि हिन्दुओं में निभने की कोशिश करते तो शक शुबहे की बर्छियों से छेद-छेद दिए जाते, और मुसलमानों में खपने की कोशिश करते तो लीगियों के धार्मिक उन्माद का जवाब देते-देते दो टूक हो जाते."[4] एक सवाल जो ज़ेहन में आता है कि क्या यह सन 47 के विभाजन तक ही सीमित रह गया, वहीँ रुक गया या इसकी कड़ियाँ आज भी सन 92 और 2002 की घटनाओं के रूप में बदस्तूर ज़ारी है. ‘पार्टीशन’ में कुर्बान भाई इतिहास के किसी अध्यापक से कहते हैं, “आप क्या ख़ाक हिस्ट्री पढ़ाते हैं? कह रहे हैं पार्टीशन हुआ था! हुआ था नहीं, हो रहा है, ज़ारी है…”

एक साहित्यकार के सरोकार केवल साहित्य से ही जुड़े नहीं होते और न ही हो सकते हैं। साहित्य अनिवार्यतः सामाजिक वस्तु है। ये जीवन की किसी एक संवेदना को लेकर चलती हैं और उससे जुड़ी अन्य विडंबनाओं को भी अभिव्यक्त करती चलती हैं. 'उज्ज्वल भविष्य' भी एक ऐसी ही कथा है जो बेरोजगारी में व्यक्ति की मानसिक उलझनों को प्रकट करती है। इसमें एक संवाद आता है कि - "काबिल आदमी अच्छा काम कर सकता है, पर होशियार आदमी के मुकाबले में आता है तो बौखला जाता है और हार जाता है। होशियार आदमी चाहे उतना काबिल न हो, काबिल लोगों से अपना काम निकलवाना जानता है।" इस समय के यथार्थ के आईने में आदर्श जब भरभराकर टूटने को विवश हो रहे हैं और जब लड़का अपनी ईमानदारी की कसमें खाता है तो मालिक का यह कहना- "अब तक तुम मुझे हँसा रहे थे, पर अब तो तुम मुझे डरा रहे हो। मैंने इतने साल में जो एंपायर खड़ी की है, उसे एक ईमानदार आदमी पर भरोसा करके मिट्टी में मिल जाने दूँ? ...आज तो इंडस्ट्री को ऐसे यंगस्टर्स चाहिए जो बेईमानी से काम करने में कुशल हो।... अचानक लड़का उठ खड़ा हुआ..., 'सर! मैं सक्सेसफुल बनूँगा। मैं बेईमान बनूँगा! बहुत बड़ा बेईमान..." उसका यह जवाब इस व्यवस्था और उससे पनपी बेरोजगारी की प्रताड़ना पर करारा तमाचा है जहाँ व्यक्ति को मूल्यों और आदर्शों से विमुख होने को विवश किया जा रहा है। 



‘प्रतीक्षा’ भी इनकी एक उल्लेखनीय लम्बी कहानी है जिसमें भी 'भ्रष्ट व्यवस्था-तंत्र' के प्रति विद्रोह का भाव बड़ी सहजता के साथ लेखक ने उभारा है। यह सैमुअल बैकेट के नाटक ‘वेटिंग फॉर गोडो’ नाटक की कथावस्तु का लेखक द्वारा किया गया एक पाठांतर है. जहाँ बैकेट का नाटक आत्मिक या वैयक्तिक प्रतीक्षा का एक अंतहीन उवाच है, तो स्वयं प्रकाश की कहानी पिछली सदी के आखिरी दौर में युवा वर्ग की हताश प्रतीक्षा को लेकर दिया एक बयान है जो साथ ही शिक्षा तंत्र का कितना ह्रास हो चुका है, को प्रकट करती है। जिसमें आर्थिक उदारीकरण के साथ बढ़ती बेरोजगारी से त्रस्त शिक्षित युवा वर्ग भविष्य की प्रतीक्षा करने के लिए तो विवश है ही, जीविका के अभाव के कारण और साथ ही सामाजिक रूढ़िवाद के चलते युवक-युवती का प्रेम भी एक अंतहीन प्रतीक्षा में बदल जाता है। कहानी में कॉलेज शिक्षा और खासकर हिंदी शिक्षण में व्याप्त जड़ता और भ्रष्टता को भी उजागर किया गया है- छात्रों को पहले से ही पता है कि प्रोफेसर पिता के लड़के उदयवीर की प्रथम श्रेणी आने वाली है और उसका पिता उसके माथे पर प्रथम श्रेणी का तिलक लगाकर उसे विश्वविद्यालय में प्रोफेसर की नौकरी पर आसीन कर देगा. बकौल मुक्तिबोध 'बौध्दिक वर्ग है क्रीतदास' इसी बात को कहानीकार ने भी 'प्रतीक्षा' कहानी में चित्रित किया है कि पूँजीपति वर्ग किस तरह बौध्दिक वर्ग की पीठ पर सवार होकर चलता है।


कथाकार स्वयं प्रकाश की कई कहानियाँ बगैर कुछ कहे बहुत कुछ कह देती हैं ऐसी ही कहानी है 'एक यूँ ही मौत', जो व्यक्ति के जीवन के अकेलेपन की बेआवाज़ त्रासदी को तो प्रकट करती ही है साथ ही विद्वता की समाज में निरुपायता को भी चिन्हित करती है। इस कहानी का नायक जो बचपन में अपनी असाधारण प्रतिभा के लिए विख्यात हो गया था समय और समाज ने उसे एक असफल व्यक्ति में तब्दील कर दिया। यह इस समाज पर प्रश्नचिह्न लगाने वाली स्थिति है जिसमें जो व्यक्ति एक सफल और सार्थक जीवन जीकर समाज को बहुत कुछ दे सकता था पर वह एक निरर्थक जीवन जीते हुए एक नाराज़ आदमी की चुपचाप मौत मर गया। उसने कभी ऐसे समाज को बदलने का प्रयास भी नहीं किया जिसकी व्यवस्था ने उसे ऐसे जीने को अभिशप्त कर दिया। स्वयं प्रकाश ऐसी समूची अकर्मण्यता पर कटाक्ष करते हुए कहते भी हैं - "इस बेहूदा दुनिया की बेहूदगी समझने के बावज़ूद उसने इसके ख़िलाफ़ न तो आवाज़ उठाई, न उन लोगों को ढूंढने की कोशिश की जो उसी की तरह 'जानते' थे। क्योंकि तब ये सब मिलकर शायद-शायद इस दुनिया को कुछ कम बेहूदा बनाने की तरक़ीब कर सकते थे।" स्वयं प्रकाश की कहानियाँ विषय वैविध्य से भरपूर है पर जिनमें वे क्षण भर के लिए भी अपनी प्रतिबद्धताओं को नहीं भूलते है. जहाँ एक ओर अकर्मण्यता को निशाना बनाते है तो वहीँ मनुष्य की समाज में भागीदारी को भी कहानी का विषय बनाते है- 'उस तरफ' कहानी में स्वयं प्रकाश ने पुरस्कार तथा तिरस्कार की मूल्यहीनता पर प्रकाश डाला है। जिसमें नख्त सिंह के द्वारा अपनी जान पर खेलकर बारह स्कूली बच्चों को आग के मुँह से बचाना। उस पर चटर्जी को दिए साक्षात्कार में उसका यह कथन कि- "यह सम्मान मुझे दे रहे हो तो इसका मतलब है, तुम आदमी से उस व्यवहार की उम्मीद नहीं रखते, जो मैंने किया।" भी काबिले-गौर है.


स्वयं प्रकाश की दृष्टि से समाज का कोई भी वर्ग जो त्रस्त है, अछूता नहीं रहता. वे हर आयु-वर्ग को, उनकी समस्याओं को अपने विशिष्ट कहन का हिस्सा बनाते है. कहानी 'ढलान पर' वरिष्ठ नागरिकों के साथ किये जाने वाले अवज्ञापूर्ण व्यवहार की शिकायत दर्ज़ करती कहानी है। यह कहानी भीष्म साहनी की ‘चीफ़ की दावत’ और उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ से आज तक के समय की यात्रा को तय करती कहानी है जो समय के साथ नित्य प्रति बदल रहे संबंधों को तो प्रकट करती ही है साथ ही बढ़ती उम्र के साथ इस नई पीढ़ी के बीच स्वयं को 'मिसफिट' पाना जीवन की सबसे बड़ी जद्दोजेहद बन जाती है, को भी रेखांकित करती है. इसमें इनके प्रति असम्मान प्रकट करते हुए 'इट वाज फन ओल्डमैन' जैसे जुमले फब्तियाँ अधिक लगते हैं जो जीवन को और अधिक अकेलेपन एवं खालीपन की ओर ढकेल देते हैं।





कथाकार स्वयं प्रकाश ने आज की स्त्री की समस्या को नितान्त भिन्न दृष्टिकोण से देखा है उनकी कहानी 'मंजू फालतू’ योग्यता प्राप्त नई लड़की की कहानी है। वह समर्थ है किन्तु फिर भी जीवन की जटिलताएँ उसे घेरे हैं। वह नौकरी और मातृत्व के बीच खटती नज़र आती है। मंजू की कहानी पुरुष वर्चस्व की एक स्टीरियो कहानी नहीं है अपितु वह जो भी निर्णय लेती है अपनी इच्छा से लेती है। फिर भी शादी के बाद उसे अपने भीतर के द्वंद्व से गुज़रना पड़ता है- "लेकिन नितिन का घर? तो क्या यह उसका घर नहीं? यह घर उसने नहीं बनाया। रेडीमेड कपड़े या खाने जैसा है। उसे मिल गया है। फिट भी नहीं है। कहीं से ढीला है कहीं फंसता है। अल्टर करने का टाइम भी नहीं है। करेगी कभी टाइम मिला तो।’’ शादी के बाद बच्चे और फिर गृहस्थी की जिम्मेदारियों के प्रति जवाबदेही में अपने ही द्वारा हासिल मुकाम का त्याग भी करती है। बच्चों के कुछ बड़ा होने के बाद फिर से नौकरी करनी चाही तो पाया कि ज्ञान और तकनीक के नए होते उसकी योग्यता क्षेत्र में अब एप्लीकेशन के कॉलम में उसके पास ‘फालतू’ लिखने के अलावा कुछ नहीं बचा है। लेखक ने मंजू को न एक नाराज औरत बनाया है और न दयनीय। बस इस सामाजिक ताने-बाने में उसके उलझाव को प्रस्तुत किया है।


स्वयंप्रकाश की कहानियों में पर्याप्त वैविध्य मौजूद हैं। 'नाचने वाली कहानी' में लचर सरकारी तंत्र और नौकरशाही की जड़ता पर निशाना साधा गया है तो 'बाबूलाल तेली की नाक' में जातिवाद पर प्रहार किया गया है। कहानी 'कहाँ जाओगे बाबा?' में एक टीस जो मानो ऑटोरिक्शा चालक से नहीं, यह समय हमसे प्रश्न कर रहा है जो पूंजीवादी विकास की पीठ पर लादकर शोषण को लाया है और 'गौरी का गुस्सा' कहानी में उपभोक्तावाद के दौर में चारों तरफ दौड़ती मानवीय लालसाओं को केन्द्र में रखा गया है। जो शिव-पार्वती की मिथकीय छवि के माध्यम से उजागर होती हैं। उपभोक्तावाद को इसमें दिखाया गया है “क्रेडिट कार्ड से दूध नहीं निकलता, गैस भी नहीं, उसे निचोड़ो तो एक बूँद पेट्रोल न निकले और चबाओ तो एक गेहूँ जितना स्वाद भी न आये। ...वहाँ सब कुछ था, लेकिन कुछ नहीं था। भोजन था लेकिन भूख नहीं थी, सूचनाएँ अपार थी, बोध गायब था। समुदाय थे, लेकिन सामाजिकता नदारद थी, दर्दनाशक बहुत थे, हमदर्द एक भी नहीं। सम्पर्क था, लेकिन संवाद नहीं था। मनुष्य थे, लेकिन मनुष्यता ढूंढनी पड़ती थी, बस्तियाँ थी, लेकिन बसावट नहीं थी, लोग थे, लेकिन लगावट गायब थी।“ स्पष्ट है कि सबकुछ अव्यवस्थित है किन्तु यह भी साथ ही दर्ज़ है कि मनुष्य को अपनी कोशिशें स्वयं करनी है। दुनिया खराब है तो हमारी वजह से, सुन्दर बनेगी तो भी हमारे ही प्रयासों से. यह कहानी यही व्यंजना देती प्रतीत होती है इसमें रतनलाल अशान्त उपभोक्तावाद के दौर का वह मनुष्य है जिसे भगवान भी शान्ति व तोष प्रदान नहीं कर सकते। 


इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि स्वयं प्रकाश ने अपनी कहानियों में अनेक युगीन समस्याओं जातिवाद, लाल फीताशाही, साम्प्रदायिकता, आदिवासी संस्कृति, बेरोजगारी, विस्थापन, स्त्री-आत्मनिर्भरता से लेकर स्त्री-मुक्ति से जुडी अनेक समस्याओं का चित्रण किया हैं जो अपने समय की जटिल और उलझी हुई सच्चाइयों को समझने का अवसर देती हैं। इन कहानियों में अपने समय के जटिल और मानवता विरोधी स्थितियों के सच को विषय बनाने का काम स्वयं प्रकाश द्वारा बखूबी किया गया है. यहाँ यह भी दृष्टव्य है कि जब भी कोई कहानीकार कहानी में अपने समय के प्रति प्रतिबद्ध हो उसकी जटिलताओं एवं विद्रूपताओं की शिनाख़्त करता है तब वह पाठक से भी उनके समाधान और जवाबदेही की प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मांग करता है. स्वयं प्रकाश की ये कहानियां इसी रूप में पाठक के लिए समस्या और उसके समाधान तक पहुँचने की यात्रा में मध्यस्थ का कार्य करती हैं. 

मूल स्रोत:

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*स्वयं प्रकाश की प्रतिनिधि कहानियाँ/ किताबघर प्रकाशन



* मेरी प्रिय कहानियाँ: स्वयं प्रकाश/ ज्योतिपर्व प्रकाशन 



सन्दर्भ सूची:

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[1] मेरी प्रिय कथाएँ: स्वयं प्रकाश/ भूमिका/ ज्योतिपर्व प्रकाशन
[3]http://www.aksharparv.com/artcile_desc.php?issue_no=175&article_id=508#.VNNZIJ2Uend 24.02.2015/ 19.07
[4] उत्तर यथार्थवाद/ सुधीश पचौरी/ पृष्ठ- 79/ वाणी प्रकाशन, 2004

Saturday, April 25, 2015

केदारनाथ सिंह की कविताओं का वैविध्य संसार



जिस समय इराक के बगदाद में भीषण नरसंहार चल रहा हो उस समय एक भारतीय पुरबिहा कवि ‘एक पुरबिहा का आत्मकथ्य’ नाम से कविता लिख रहा है- "इस समय यहां हूं/ पर ठीक इसी समय/ बगदाद में जिस दिल को/ चीर गई गोली/ वहां भी हूं/ हर गिरा ख़ून/ अपने अंगोछे से पोंछता/ मैं वही पुरबिहा हूं/ जहां भी हूं’‘ केदारनाथ सिंह अपने समय के एक ऐसे ही संवेदनशील कवि है जो कविता में सारे संसार की परिक्रमा कर आते हैं. इनका असली संसार यह पुरबिया दुनिया ही है जो उनकी आत्मा में बसी है. हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह अस्सी वर्ष की आयु में पिछले साठ वर्षों से लिख रहे हैं. साठ वर्षों से अधिक की इस लंबी काव्य यात्रा में इनके आठ कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं। उनकी कविताओं से गुजरते हुए ऐसा महसूस होता है जैसे हम चुने हुए शब्दों से बनी भावों की ऐसी दुनिया में प्रवेश कर जाते हैं जो यथार्थ की दुनिया से बिलकुल भिन्न न हो। 1960 में आए काव्य संग्रह ‘अभी बिल्कुल अभी' से लेकर उनके हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह ‘सृष्टि पर पहरा’ तक की कविताओं में हमें उनकी ऐसी ही यथार्थपूर्ण कोमल कविताई देखने को मिलती है जो कई बार कोमलकांत होते हुए भी नक्कारखाने में तूती की आवाज़ सी लगती है. जिसमें कम से कम व सरल शब्दों में, जीवन का यथार्थ, समाज की सच्चाई, राजनीति का कड़वापन, सभी कुछ, बड़े ही सटीक बिम्बों के सहारे, मन को सीधा उद्वेलित करते हुए, सपाटबानी से सायास एकदम दूर रहते हुए तथा काव्य - शिल्प के नए मानदंड गढ़ते हुए, कुछ यूँ कह दिया जाता है, जो लम्बे समय के लिए हमारे मानस पर अपनी छाप छोड़ जाता है. उनकी काव्य - पंक्तियाँ प्राय: अँधेरे को कोमलता से चीरते हुए प्रकाश ओर जाती हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि इस उम्र में भी उनके भीतर का कवि कहीं से भी थका हुआ नहीं लगता और वे आज भी निरन्तर काव्य - रचना में संलग्न हैं, वह भी वर्तमान समय के यथार्थ - बोध, सामाजिक व राजनीतिक सरोकारों, भाषायी विकास, शिल्प की विशिष्टताओं आदि को अपनी कविताओं में पूरी ताक़त के साथ समेटते हुए। उनकी कविताओं में आधुनिकता और परंपरा दोनों को एक साथ अपने में समेट लेने की विशिष्टता एवं वैचारिक सान्द्रता मौज़ूद होती है.


केदारनाथ सिंह की कविताएँ वैविध्य से भरी हुई हैं, उनकी कविता समाज के तमाम सरोकारों को खुद में समेटे हुए है. यदि कविता में केंद्रीकरण की धारणा को अपदस्थ न माना जाए तो उनकी कविताएं मूलत: ‘दानों’ के महत्व, ‘रोटी’ की चिन्ता, और ‘मानवीय संवेदनाओं’ की महक को केंद्र में रखती और रेखांकित करती कविताएँ हैं. बीसवीं सदी के अंतिम तीन दशकों में जब मुक्तिबोध, धूमिल, नागार्जुन व त्रिलोचन जैसे बड़े कवियों की परम्परा में रघुवीर सहाय व कुँवर नारायण जैसे समकालीन कवि जुड़ रहे थे, ऐसे में इस कड़ी को आगे बढ़ाते हुए उनके बरक्स उन्होंने मुख्यत: इन्हीं तीन बातों से जुड़कर हिन्दी काव्य - साहित्य को एक नया आयाम दिया। हालांकि उन्होंने इन विषयों से इतर भी कविताएँ रची हैं किन्तु जहाँ भी उनकी कविताओं में दानों का उल्लेख आया है, वहाँ वे परम्परा की ओर जाते हुए, मनुष्य और उसके अस्तित्व के उद्गम की ओर बढ़ते हुए, किसी प्रवृत्ति के मूल की ओर जाने का प्रयास करते हुए दिखते हैं. उनकी कविता 'आवाज़' में- "पकते हुए दानों के भीतर / शब्द के होने की पूरी संभावना थी/ मुझे लगा मुझे एक दाने के अन्दर/ घुस जाना चाहिए/ पिसने से पहले मुझे पहुँच जाना चाहिए/ आटे के शुरू में"

या फिर उनकी 'दाने' शीर्षक कविता में – "नहीं/ हम मंडी नहीं जाएँगे/ खलिहान से उठते हुए/ कहते हैं दाने/ जाएँगे तो फिर नहीं आएँगे/ जाते-जाते/ कहते जाते हैं दाने/ अगर आए भी/ तो तुम हमें पहचान नहीं पाओगे/ अपनी अंतिम चिट्ठी में लिख भेजते हैं दाने". जहाँ भी रोटी, अनाज, दानों की बात आती है तो उनका संकेत भूख की ओर, आर्थिक विषमता की ओर, संघर्ष की ओर होता है, जैसे उनकी 'रोटी' कविता में – "वह पक रही है और आप देखेंगे/ यह भूख के बारे में आग का बयान है/ जो दीवारों पर लिखा जा रहा है" साथ ही अपनी एक और कविता में वह कहते है- ‘रात को रोटी जब भी तोड़ना/ तो पहले सिर झुकाकर/ गेहूँ के पौधे को याद कर लेना’. ये कविताएं भले ही मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति हों किन्तु जिस तरलता के साथ केदारनाथ सिंह की कविताओं में इन संवेदनाओं की अभिव्यक्ति होती है और उसके लिए वे जैसे बिम्ब गढ़ते हैं, उसका आधुनिक हिन्दी साहित्य में कहीं कोई सानी नहीं। जैसे "यह मां की आवाज़ है - मैंने कहा/ चक्की के अन्दर माँ थी" अथवा 'हाथ' कविता में "उसका हाथ/ अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा/ दुनिया को/ हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए." 

केदारनाथ सिंह की ज्यादातर कविताओं में बिम्ब प्राय: प्रकृति पर आधारित हैं जिनका उद्देश्य मानवीय संवेदना के साथ साथ विचारों का गहराई तक संचार करना है। ‘बाघ’ कविता में बाह्य जगत की भयावहता, बिम्ब के साथ ही जुड़ी है, अत: वह हमें एक अलग ढंग से सोचने पर मजबूर करती है और संवेदना से कहीं ज्यादा, विचारों को उद्वेलित करने का काम करती है. 'बाघ' कवि केदारनाथ सिंह की एक लम्बी एवं प्रसिद्ध कविता-श्रृंखला है, जिसमें छोटे-बड़े इक्कीस खंड हैं। 'प्रतिनिधि कविताएँ' के अन्तर्गत बाघ-श्रृंखला में छोटे-बड़े सोलह खंड हैं। 'बाघ' को लिखने की प्रेरणा कवि को हंगरी भाषा के रचनाकार यानोश पिलिंस्की की एक कविता पढ़ने के बाद मिली थी। यानोश पिलिंस्की की उस कविता में कवि को अभिव्यक्ति की एक नई संभावना दिखी थी। वह कविता 'पशुलोक' से संबंधित थी. 'बाघ' पर बातचीत के पहले हम, केदारनाथ सिंह का पशु-जगत् के साथ काव्य-बर्ताव कैसा रहा है यह देख लें। साहित्य में और आम-जीवन में भी बन्दरों की जो छवि चित्रित है वह चंचल,उछल-कूद करने वाले, दूसरे के हाथों से कुछ छीना-झपटी करने वाली छवियाँ ही चित्रित हैं लेकिन यह कवि केदारनाथ सिंह की आखें हैं जो, ''सीढ़ियों पर बैठे बन्दरों की आँखों'' की 'एक अजीब-सी नमी'' को लक्षित कर ले जाती है। इसी तरह 'बैल' कविता में वह 'बैल' के बारे में लिखते हैं, -''वह एक ऐसा जानवर है जो दिनभर / भूसे के बारे में सोचता है / रात भर / ईश्वर के बारे में'' 'बाघ' कविता में भी जब बाघ का सामना बुद्ध से होता है वहाँ कवि लिखता है, ''जहाँ एक ओर भूख ही भूख थी / दूसरी ओर करुणा ही करुणा।'' बाघ कवि के लिए 'भूख ही भूख' है। कहने का आशय यह है कि पशु-जगत् के साथ केदारनाथ सिंह बड़ी कोमल एवम् कारुणिक बर्ताव करते हैं। दूसरी चीज यह कि ये सभी पशु उनकी कविता में अपनी 'प्राकृतिक सत्ता' नहीं खोते। वे बिम्ब, प्रतीक, मिथक बाद में है, उनका प्राकृतिक अस्तित्व पहले है। 'बाघ के बारे में' केदारनाथ लिखते हैं- ''बाघ हमारे लिए आज भी हवा-पानी की तरह एक प्राकृतिक सत्ता है, जिसके होने के साथ हमारे अपने होने का भवितव्य जुड़ा हुआ है।'' 'बाघ' पढ़ते समय सबसे पहली उत्सुकता यह होती है कि 'बाघ' है क्या? बाघ की कई-एक छवियाँ इस कविता में हैं। कभी हिंसा बाघ के रूप में तो कभी अपने स्वभाव के विपरीत समस्त करुणा से युक्त बाघ. 

यह एक विडंबना ही है कि शहर और बाजार - जिसको मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए रचाया-बसाया है वह आज मनुष्य और मनुष्यता को लील लेने के स्थल में परिवर्तित होता जा रहा है। केदारनाथ सिंह अपनी कविता में निरंतर शेष होती उन चीजों को बचा लेना चाहते हैं जो शहरीकरण और बाजारीकरण की प्रक्रिया में उसके ग्रास बनते जा रहे हैं। 'बाघ' में कवि 'बुनते हुए हाथ' और 'चलते हुए पैर' को बचा लेना चाहता है। कवि की पूर्व उल्लिखित कविता 'दाने' में दानों का मंडी जाने से इंकार की अनुगूँज 'बाघ' में भी सुनाई पड़ती है। इस एक बड़ी कविता में पूर्ववर्ती कई कविताओं की अनुगूंजे साफ सुनी जा सकती हैं। 'बाघ' पढ़ते समय कवि की ही 'दाने' के अलावा, 'यह पृथ्वी रहेगी', 'जो एक स्त्री को जानता है', 'टूटा हुआ ट्रक', 'बीमारी के बाद', 'महानगर में कवि' और 'पड़रौना उर्फ शहर बदल' की याद ताजा हो जाती है. 'बाघ' कविता के तेरहवें खंड में बाघ बैलगाड़ियों को देखता है। बैलगाड़ियाँ हमेशा की तरह इस बार भी, ''बस्ती से शहर की ओर / कुछ-न-कुछ ढोती हुई / और अपने हिस्से की जमीन / लगातार-लगातार खोती हुई।'' चली जा रही हैं। 'बाघ' कविता में 'बस्ती' से 'शहर' की यात्रा सदैव कुछ गँवाने और लुटाने की यात्रा लगती है। इसलिए इस कविता में शहर के बारे में बाघ के विचार अच्छे नहीं हैं। वह पहली बार जब 'शहर' आता है तो 'शहर' को 'गहरे तिरस्कार' और 'घृणा' से देखकर उससे बाहर चला जाता है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि केदारनाथ सिंह अपनी कविता में निरंतर रीतते लोक-जनपदीय जीवन और लोक-संस्कृति को बचा लेना चाहते हैं, यहाँ बैलगाड़ियों को शहर की ओर जाते देख बाघ का यह कहना कि, ''मुझे कुछ करना चाहिए / कुछ करना चाहिए।' स्वयं कवि का कथन लगता है। 'बाघ' कविता का बाघ कई जगहों पर अपने रचयिता कवि से एकाकार हो गया है।

कवि की ये कविताएँ समय की दृष्टि से भले ही कोई साम्य न रखती हो किन्तु उनकी हर कविता बिम्बों की तलाश तथा उनकी प्रयुक्ति में एक विस्मित कर देने वाला ऐक्य पाया जा सकता है. जब वे अपनी ‘चींटियों की रुलाई’ कविता में - ‘मैं तो बस इस शहर की/ लाखोंलाख चींटियों की मूक रुलाई का/ हिन्दी में अनुवाद करना चाहता हूँ/ सुनो,क्या तुम सुन रहे हो उसे?’ अथवा ‘पानी की प्रार्थना’ कविता में - ‘समय ही कुछ ऐसा है / पानी नदी में हो/ या किसी चेहरे पर/ झाँककर देखो तो तल में कचरा/ कहीं दिख ही जाता है’, या फिर ‘पानी था मैं’ कविता में – ‘कभी पानी था मैं/ बस इतना याद है/ कि एक दिन एक कटोरे से गिरा/ और ज़मीन ने मुझे पी लिया/ जबकि एक बकरी उदास ताकती रही मुझे’ कहते हैं, तब वे अपनी संवेदना की अभिव्यक्ति के लिए ऐसे अनूठे बिम्बों का इस्तेमाल कर रहे होते हैं, जो हमें अन्यत्र कहीं नहीं दिखते। केदारनाथ सिंह का यह अनूठा बिम्ब - विधान ही उन्हें श्रेष्ठ एवं मानवीय संवेदनाओं का बेजोड़ कवि बना देता है। मुक्तिबोध, शमशेर , केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन और त्रिलोचन के बाद जिन कवियों ने हिन्‍दी में नयी जमीन तोडी है उनमें रघुवीर सहाय, केदारनाथ सिंह और कुँवर नारायण प्रमुख हैं. इनमें रघुवीर सहाय जहां इस जनतंत्र में तंत्र की भूमिका को आलोचनात्‍मक ढंग से अपनी कविता के केन्‍द्र में रखते हैं वहीं केदारनाथ सिंह इस लोकतंत्र में लोक की चेतना को उसकी सादगी, स्‍फूर्ति और उसके विस्‍मयबोध के साथ प्रस्तुत करते हैं.

केदार जी भोजपुरी भाषी हैं और उनकी भोजपुरी बलिया, छपरा की मीठी भोजपुरी है. यह मिठास केदार जी के व्‍यक्तित्‍व का भी एक हिस्‍सा है. एक सरल सी आत्‍मीयता जो उनकी कविताओं में अमूमन मिलती है आपको धीरे धीरे अपने साथ लेती चलती है और फिर जीवन जगत के अपने अनुभवों को हमसे साझा करती है. अपनी एक कविता ‘भोजपुरी’ में केदार जी लोकभाषा भोजपुरी के सकारात्‍मक पक्ष को जिस संवेदनशीलता के साथ सामने रखते हैं वह अनोखा है – "लोकतन्‍त्र के जन्‍म से बहुत पहले का/ एक जिन्‍दा ध्‍वनि लोकतंत्र है यह/ जिसके एक छोटे से ‘हम ’ में/ तुम सुन सकते हो करोडों/ ‘मैं ’ की घडकनें". लोक की और लोकभाषा की, जिसे अक्‍सर बोली कहकर हम सीमित करने की कोशिशें करते हैं, ताकत और व्‍यापकता को यहां जिस तरह से केदार जी ने सामने रखा है वह महत्‍वपूर्ण है. यह कविता मात्र भोजपुरी की ही बात नहीं करती. यह तमाम लोकभाषाओं की जरूरत की भी पैरवी करती है जिसकी अंग्रेजी से लडने के तर्क से हम उपेक्षा करते हैं और भूल जाते हैं कि हिन्‍दी की सारी थाती इन्‍हीं लोकभाषाओं की देन है जिस लोक की ताकत से यह तंत्र चलता है वह इन्‍हीं लोकभाषाओं और उसके धारकों की जबान से अपनी प्रासंगिकता को सिद्ध करता है साथ ही यह कविता . इस लोकजन की व्‍यापकता का भी बोध कराती हैदेखा जाए तो केदारनाथ सिंह की तमाम कविताएं इन्‍हीं लोकभाषी जन की बातें करती हैं. ‘कपास के फूल’ 'कवि कुम्‍भनदास के प्रति’, ’हिन्‍दी’ आदि कविताएं इसी लोकजन की ताकत और मिजाज को कई तरह से अभिव्‍यक्‍त करती हैं- "वह जो आपकी कमीज है/ किसी खेत में खिला/ एक कपास का फूल है" केदार जी की कविता लोक के जीवट को तमाम तरह से अभिव्‍यक्‍त करती है. लोक की संवेदना को प्रकट करते हुए ‘घास’ कविता में घास लोक जनों का ही प्रतीक है.आम जन की इस जिद और ताकत को घास के माध्यम से ही उन्होंने अभिव्‍यक्‍त किया है - "कभी भी/ कहीं से भी उग आने की/ एक जिद है वह"

केदारनाथ सिंह जी की कविताओं का दायरा बेहद व्यापक एवं विशद है. समाज की किसी भी चिंता एवं सरोकारों पर प्रकाश डालने में उनकी कलम चूकी नहीं है. किसानों की आत्‍महत्‍या को लेकर केदार जी की एक मार्मिक कविता है ‘ फसल' इसमें वे उनकी लगातार बिगडती हालत को बयां करते हैं. कवि की निगाह में आज भी किसान ‘सूर्योदय और सूर्यास्‍त के विशाल पहियों वाली‘ गाडी से चलता है पर विकास के इस मोड पर उसकी यह गाडी अटक जाती है और किंकर्तव्‍यविमूढ वह इस नई और अंधी सभ्‍यता के चक्‍कों तले कुचल दिया जाता है पर कवि यहां इस हत्‍यारी सभ्‍यता की परिभाषाओं से सहमत नहीं है इसलिए वह तय नहीं कर पाता कि यह ‘हत्‍या थी या आत्‍महत्‍या’ यह आप पर छोडता हूं. आज किसान का शोषण सर्वत्र हो रहा है। खेती घाटे का सौदा हो गई है, फिर भी छोटी से छोटी जोत का किसान भी इसी इरादे से खेती करता रहता है कि ज़मीन से उसे खाने के लिए कुछ तो मिलेगा ही। वह अपनी पुश्तैनी ज़मीन से बेदखल नहीं होना चाहता। उसकी ज़मीन छीनने को हज़ारों ताकतें लगी हुई हैं। जगह जगह भू माफिया उसकी ज़मीन पर नज़र गड़ाए बैठे हैं, व्यवस्था ज़मीन हड़पने वालों के साथ खड़ी दिखाई देती है। ऐसे में प्रतिरोध की चेतना और साहस कहाँ से पैदा हो? कविता में किसान के भीतर वह साहस एक साँप की चमकती हुई आँखों को देखकर पैदा होता है। ‘आज नरकट की पत्तियों में / उसने एक साँप की चमकती हुई/ आँखें देखीं/ उसने जोखिम में देखी/ एक अद्भुत सुन्दरता/ और कुछ पल अवाक/ देखता रहा उसे’ कहकर केदारनाथ सिंह इस साहस के पैदा होने का अद्भुत बिम्ब खींचते हैं। साहस के पैदा होते ही किसान विद्रोही हो जाता है, ‘वह कचहरी गया/ वहाँ उसके सामने रखा गया/ एक सादा काग़ज़/ कहा गया - 'यहाँ … यहाँ … / एक दस्तख़त करो' और यह विद्रोह उसे चेतन बना देता है, - ‘उसने इनकार किया/ और उसे लगा/ वह दस गुना/ बीस गुना/ सौ गुना और ज़िन्दा हो गया!’ प्रतिरोध की इस चेतना में ही उस क्रांति के बीज छिपे हैं, जो किसी मरे हुए समाज को ज़िन्दा कर सकती है।


केदारनाथ सिंह की कविताओं में परम्परा की महत्ता तथा उसकी ताक़त का अहसास कराए जाने के साथ साथ आधुनिकता की आहट और परम्परा से होने वाली उसकी टकराहट का भी विशिष्ट चित्रण है। जब परम्‍परा आधुनिकता से टकराती है तो जहाँ जरूरी होता है, वहाँ परम्‍परा ठहर जाती है और आधुनिकता को अपने ढंग से परिस्थितियों को बदलने देती है। इसी से परम्‍परा और आधुनिकता के बीच एक तालमेल बनता है। जीवन में दोनों का अपना अपना महत्व है।कवि स्वयं को अपने समय के प्रति, अपने विश्वास के प्रति, अपने विचार के प्रति समर्पित करता है। ‘गमछा और तौलिया’ कविता में जब केदारनाथ सिंह - ‘तौलिया गमछे से कह रहा था/ तू हिन्दी में सूख रहा है/ सूख/ मैं अंग्रेजी में कुछ देर झपकी लेता हूँ’ कहते हैं, तब वे परम्परा और आधुनिकता के बीच के द्वंद्व तथा उनके बीच बिठाए जाने वाले सामंजस्य की ओर इशारा कर रहे होते हैं. परम्‍परा और आधुनिकता के बीच की टकराहट में हमेशा सब कुछ बदल ही नहीं जाता. हर आदमी समाज में अपनेअपने तरीके से जीता है अपने अपने तरीके से सोचता है और अपने तरीके से आगे की दिशा निर्धारित करता है। कुछ लोग परम्‍परा का हाथ पकड़कर जीते हैं और कुछ अपने अतीत को भुलाकर समय के साथ आगे निकल जाते हैं। ‘समय से पहली मुलाकात’ शीर्षक कविता में केदारनाथ सिंह ने कहा है ‘अब किससे पूछूँ/ यह मेरा तो नहीं/ आखिर किसका समय है/ जो बजता रहता है मेरी घड़ी में?’ यहाँ कवि अपने समय को खो देने की पीड़ा को अभिव्यक्त करता है। उसकी घड़ी में जो समय बज रहा है वह उसका नहीं है। वह यह भी नहीं जानता कि वह किसका समय है। आज का समय ऐसा ही है, जहाँ व्‍यक्‍ति अपनी परम्‍परा से कटा हुआ है। अपने को पूरी तरह बदल भी नहीं पाया है। उसका अपना कोई स्‍थापित संस्‍कार नहीं बन पाया है। वह कहीं बीच में ही त्रिशंकु सा लटका हुआ है जो समय के संधिकाल में जी रहा है। समय की संकरता का यह दायरा विस्‍थापन के विस्तार के साथ व्यापक होता चला जाता है। ‘देश और घर’ कविता में केदारनाथ सिंह विस्‍थापन के कारण पैदा हुई इस संकरता से जूझने की स्‍थिति का बड़ी ही संवेदना के साथ चित्रण करते हैं। इस कविता में ‘हिन्दी मेरा देश है/ भोजपुरी मेरा घर/ घर से निकलता हूँ/ तो चला जाता हूँ देश में/ देश से छुट्टी मिलती है/ तो लौट आता हूँ घर’ जैसी पंक्तियों के माध्यम से वे अपनी विडंबना का उल्‍लेख करते हैं. उनका जन्‍म भोजपुरी प्रदेश में हुआ है, इसलिए भोजपुरी उनका घर है। किन्‍तु समय ने उन्‍हें अपने घर से उठाकर देश भर में घुमा दिया है, इसलिए वे देश के हो गए हैं, जहाँ उनकी भाषा हिन्‍दी है लेकिन उन्होंने भोजपुरी का वह घर. कभी खाली नहीं किया है. कभी वे हिन्‍दी में रमते हैं तो कभी भोजपुरी के घर लौट जाते हैं। इस आवाजाही में वे बार - बार कुछ खोते और कुछ पाते रहते हैं। अपनी इस पीड़ा को वे ‘देश और घर’ में - ‘इस आवाजाही में/ कई बार घर में चला आता है देश/ देश में कई बार/ छूट जाता है घर’ कहकर अभिव्‍यक्‍त करते हैं। उन्‍हें यह आशंका है कि इस आवाजाही की प्रक्रिया में वे किसी एक के नहीं हो पा रहे हैं और दोनों को ही खोते जा रहे हैं। अपनी इस विडंबना को वे इन शब्दों में अभिव्यक्त करते हैं, - "मैं दोनों को प्यार करता हूँ/ और देखिए न मेरी मुश्किल/ पिछले साठ बरसों से/ दोनों में दोनों को/ खोज रहा हूँ."

मनुष्य जहाँ - जहाँ भी जाता है, अपने पारम्परिक परिवेश को, उसकी गंध को, उसकी अच्छाइयों - बुराइयों को अपने संग समेटे हुए चलता है। वह जहाँ भी रहता है, परम्परा अदृश्य रूप से उसके साथ बनी रहती है। वह परम्परा की खुशबू को बचाए रखने की कोशिश करता है। उस पर गर्व महसूस करता है। । व्यक्ति कभी भी अपनी मौलिक पहचान को, अपनी अस्मिता को खोना नहीं चाहता। लेकिन विस्थापन और समय के परिवर्तन के साथ वह धीरे - धीरे उससे विलग होता चला जाता है। परम्परा उसके वर्तमान में चुपके से कहीं खो जाती है। केदारनाथ सिंह की कविता ‘काली सदरी’ इस दृष्टि से अत्यधिक उल्लेखनीय है। इस कविता में वे - ‘बरसों पहले/ इस महानगर में जब पहली बार आया था/ मेरे बदन पर एक कुर्ता था/ जिसे गाँव के बूढ़े दर्ज़ी ने सिला था/ कुर्ते में एक जेब भी थी छोटी - सी/ जिसमें मकई के लावा की/ गन्ध भरी थी/ वह मेरे साथ - साथ रही कई हफ़्तों तक/ इस महानगर में’ कहकर दिल्ली में अपने साथ सँजोकर लाई गई अपनी विरासत का जिक्र करते हैं। आगे इस कविता में वे अपनी काली सदरी और उसके धागों में छिपकर कस्बे से आई हुई धूल का जिक्र करते हुए - ‘और हाँ - मेरे सफ़ेद कुर्ते पर/ एक काली सदरी भी थी/ जिसके धागों में छिपी थी/ एक छोटे - क़स्बे की ज़रा - सी धूल/ मैंने कोशिश बहुत की/ कि वह ज़रा - सी धूल/ मेरे संग - संग बची रहे महानगर में/ पर पता नहीं कैसे/ धीरे - धीरे झरती रही वह/ झरती रही मेरी पहचान/ मेरी देह से धीरे - धीरे/ और एक दिन मैंने पाया/ अब मेरी पहचान/ 88/3 दिल्ली है’ कहकर अपनी उस अस्मिता के दिल्ली में खो जाने की पीड़ा का बयान करते हैं। इसमें अपनी पहचान के खो जाने का, उसके बदल जाने का दर्द छिपा है। विस्थापन की यह पीड़ा, यह वास्तविकता, यह परिणति सार्वभौमिक है, केदारनाथ सिंह की अकेले की नहीं है।



केदारनाथ सिंह हिन्दी के उन गिने चुने वरिष्ठ कवियों में से हैं, जो कविता की वर्तमान स्थिति से न तो दुखी हैं और न उसके भविष्य के प्रति निराश। उनसे जब भी बात होती है, वे नए व युवा कवियों की कविताओं पर बात करते हैं। वे हमेशा उस उम्मीद का जिक्र करते हैं, जो उन्होंने कविता के भविष्य के बारे में पाल रखी है। वे सदैव परिवर्तन की बात पर बल देते हैं। कविता में समय के अनुरूप जो बदलाव आना चाहिए, वे उसके प्रबल पैरोकार हैं। ‘शोध’ कविता में वे कवियों को अपेक्षित बदलाव की तैयारी के लिए अपने में गहरी समझ पैदा करने का आह्वान करते हैं, - ‘और मुझे रुकना होगा वहीं/ उस भाषा का अध्ययन करने के लिए/ जो मछलियाँ बोलती हैं/ बहते हुए जल से/ और वह विलाप जो गूँजता है उनकी आँखों से/ चमक में और वह तकनीक/ जो बाज़ार करता है इस्तेमाल/ उनके जल से/ जाल तक पहुँचने की यात्रा में।’ आज के आलोचकों द्वारा कविता को मृतप्राय घोषित कर दिए जाने की बात से वे कतई सहमत नहीं और इस संबन्ध में वे अपना मंतव्य ‘कविता’ शीर्षक कविता में स्पष्ट रूप से प्रकट करते हैं ‘और वह आज भी ज़िन्दा है/ मृत्यु की सारी घोषणाओं के बाद/ लोग अब भी उसे सुनते हैं।’ उनका मानना है कि कविता की सार्थकता जिनके लिए है, वही कविता के आराधक होते हैं। आज की कविता की मुख्यधारा प्रतिरोध की है, हाशिए पर पड़े वंचित, दलित स्त्री समाज की पीड़ा व संघर्ष की है। तभी तो वे ‘कविता’ कहते हैं, - ‘पता लगा लो - जो मारे जाते हैं जंगलों में/ उन युवा होठों पर/ अक्सर होती है कोई न कोई कविता।’ प्रलोभन, किसी दबाव, किसी प्रकार के दमन के आगे झुके बिना पूरी जीवंतता के साथ आगे बढ़ रही है।

केदारनाथ सिंह अन्य वैश्विक मुद्दों को भी अपनी कविता में जगह देते है. हमारे विश्व-समाज का सर्वस्व प्रदूषित होते जाने की पीड़ा भी उनकी कविता का स्वर बनता है इसका इलाज सुझाती केदारनाथ सिंह की कविता की पंक्तियां हैं- "इतनी गर्द भर गई है दुनिया में/ कि हमें ख़रीद लाना चाहिए एक झाड़ू/ आत्मा के गलियारों के लिए/ और चलाना चाहिए दीर्घ एक अभियान/ अपने सामने की नाली से/ उत्तरी ध्रुवान्त तक." उदारीकरण से सबसे अघिक लाभ पूंजीपति वर्ग को हुआ है। यह वर्ग चांदी काट रहा है। पूरी दुनिया में ‘ताप और ऊर्जा’ के रूप में आग और पानी का खेल खेलकर पृथ्वी पर ही नहीं, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड पर उस ‘सम्पन्न सौदागर’ का एकाधिकार होता जा रहा है, कवि इस बात को ख़ूब अच्छी तरह जानता है- "मैं उसे इसलिए भी जानता हूं/ ब्रह्माण्ड का/ सबसे सम्पन्न सौदागर है/ जो मेरी पृथ्वी के साथ/ ताप और ऊर्जा का तिजारत करता है/ ताकि उसका मोबाइल/ होता रहे चार्ज।" इसके साथ ही कवि वैश्विक शान्ति से जुड़े मुद्दे भी उठाता है और वाज़िब सवाल खड़े करता है. भारत पाक बांग्लादेश को लेकर आतंक की नीति पर कवि सवाल खड़े करता है इसके खिलाफ अपना प्रतिरोध दर्ज कराता है - ‘अगर सरहद जरूरी है/ पडी रहने दो उसे/ पर हाथों को हक दो/ कि मिलते रहें हाथों से’ कवि चाहता है चाहे जैसे भी हो इन मुल्कों में एक पतली सी झिर्री खुली रहे जिससे संभव हो सके खुली हवा में साँस लेना, सत्ताएँ कितना ही कागज़ी हिसाब रखें पर बची रहे एक मुट्ठी आसमां की ख्वाहिश .एक ‘वृहत्तर भारत’ का सपना कवि देखता है. परन्तु वह अपने सपने को साकार होता नहीं देखता । इसलिए इस सपने को वह अपने भीतर बसी एक पागल स्त्री का सपना मानता है, समाज में अन्याय, अत्याचार के खि़लाफ़ आवाज़ उठाने वालों की संख्या आटे में नमक के बराबर रह गई है । इसलिए उन सारी जगहों पर भी चुप्पियों का साम्राज्य है, जहां बोलना ज़रूरी है. "चुप्पियां बढ़ती जा रही हैं/ उन सारी जगहों पर/ जहां बोलना ज़रूरी था"





उनके यहाँ सीखने के लिए बहुत कुछ है। उनकी रचनाशीलता अभी बूढ़ी नहीं हुई है और हमें सिखाने के लिए वे अभी और भी बहुत कुछ रचने वाले हैं। उनकी कविताओं का बिम्ब - विधान निराला है। उनके अद्भुत बिम्ब शब्दों की शक्ति को कई गुना बढ़ा देते हैं। उनके बिम्ब हमारे आस - पास ही उपस्थित और हमारे जीवन से गहराई से जुड़ी चीज़ों से संबद्ध होते हैं। वे कविता में इस तरह से घुले - मिले होते हैं कि हम उन्हें किसी भी तरीके से उनकी पंक्तियों से विलग नहीं कर सकते। उनके बिम्ब शब्दों की आत्मा में पैठे हुए - से लगते हैं। केदारनाथ सिंह ने स्वयं ही कहा है, - ‘कविता में बिम्ब की बुनावट महत्वपूर्ण है, बिम्ब की प्रमुखता नहीं।’ वे अपनी कविताओं में इस सिद्धान्त को पूरी तरह से अपनाकर चलते हुए दिखते हैं। आधुनिकता की दृष्टि से केदारनाथ सिंह हमेशा संकीर्ण वैज्ञानिक आधुनिकता अथवा सामाजिक व राजनीतिक चेतना तथा परम्परा के प्रति नकार की भावना से सम्पन्न उत्तरआधुनिकता से ऊपर उठकर सोचने वाले कवि के रूप में दिखाई पड़ते हैं। उनकी कविता हमें परम्परा के श्रेष्ठ सोपानों पर टिके रहने का आह्वान करती हुई, नवाधुनिकता के उस ठोस प्रस्थान - बिन्दु तक पहुँचाती है, जहाँ मानवीय चेतना अपने चरम पर पहुँच हमारे जीवन संघर्ष को सही दिशा में आगे ले जाने के लिए प्रेरित करने लगती है। यह टकराहट उस समन्वयवादी दृष्टि से उपजी प्रतीत होती है, जो उनके भीतर के शहर तथा गाँव, वर्तमान तथा अतीत के बीच निरन्तर चलता रहता है। यह नवाधुनिकता देशज है, पश्चिम से प्रभावित नहीं। उन्होंने अपने लेख ‘हिन्दी आधुनिकता का अर्थ’ में स्वयं कहा है, - "मेरी आधुनिकता में मेरे गाँव और शहर के बीच का सम्बन्ध किस तरह घटित होता है, इस प्रश्न की विकलता मेरे भाव - बोध का एक अनिवार्य हिस्सा है। ये दोनों मेरे भीतर हैं और दोनों में जो एक चुपचाप सहअस्तित्व है, उसका सन्तुलन हमेशा एक जैसा बना रहता है। इससे भारतीय कवि के भीतर एक नए ढंग का भाव - बोध विकसित होता है, जो पश्चिम से काफी भिन्न है।" केदारनाथ सिंह की ही पीढ़ी के कवि कुँवर नारायण ने कहा है, - "बदलते संदर्भों में मनुष्य के सबसे कम उद्घाटित या विलुप्त होते, जीवन - स्रोतों की खोज और भाषा में उनके संरक्षण की क्षमता शायद आज भी कविता की सबसे बड़ी ताक़त है." इस कठिन दौर में भी हमें उम्मीद और आश्वस्ति से भर देती है। अपनी बनावट में ये कविताएँ सहज सम्प्रेष्य हैं। यह कवि अपने समय के संकटों से रूबरू होता है, पर एक उम्मीद के साथ। यह कवि की संवेदना का एक ऐसा महीन धागा है जो सारी कविताओं में फैला हुआ है डॉ॰ बच्चन सिंह के शब्दों में, "छायावादोत्तर कवियों में केदारनाथ सिंह सबसे अधिक सचेत कवि हैं वाक् और अर्थ दोनों के प्रति। .जीवन का इतना वैविध्य, प्रतिपत्तिमूलक (जेनेरिव) भाषा का किंश्चित् जटिल, किन्तु सरस और लयात्मक प्रयोग अन्यत्र कम मिलेगा।


मूल स्रोत 

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* प्रतिनिधि कविताएं : केदारनाथ सिंह/ राजकमल प्रकाशन 

* सृष्टि पर पहरा/ केदारनाथ सिंह/ राजकमल प्रकाशन 





सहायक सन्दर्भ ग्रन्थ 

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* आधुनिक हिन्दी साहित्य का इतिहास/ बच्चन सिंह 

* हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास/ बच्चन सिंह

* कविता और समय/ अरुण कमल 

* 'तद्भव' पत्रिका, अंक जून 2014