Saturday, March 5, 2016

पुरुषार्थ, त्याग और स्वराज

गांधी पर लिखना और बोलना मेरे लिए हमेशा से बहुत कठिन रहा है, इसका एक बहुत बड़ा कारण  उनको सम्पूर्णता में पढने का अभाव भी रहा. जितना कम जाना-समझा उनमें भी उनकी बहुत सी बातों पर मेरी असहमति ही दर्ज़ हुई. इन असहमतियों के बीच भी एक सत्य हमेशा यह भी  रहा कि मैं गांधी के दर्शन पर आक्षेप करती हूँ, पर उसी दर्शन को आधार मान उसके समान्तर अपने  एक दर्शन विशेष की निर्मिति करती हूँ जो उसी गाँधी की बनी ज़मीन पर उपजता है. आप गांधीवादी हो भी सकते हैं, नहीं भी हो सकते हैं. पर इस सत्य को झुठला नहीं सकते कि गांधीवाद एक दर्शन है, एक जीवन-पद्धति है, ऐसी जीवन पद्धति जिसका यदि कालांतर में विश्व अनुसरण कर पाता है तो यह मानवता के उस सुन्दर स्वप्न का साकार होना होगा, जिसे गाँधी ज़ामा पहनाना चाहते थे. 


गाँधी को पढना सत्य को शोधना जैसा है. जिस प्रकार सत्य के शोधन के बाद हमारे भीतर एक प्रकार की विवेक-संपन्नता एवं पवित्रता आती है कि हम समय के सत्य को स्वीकार कर पाते है, उन्हें झटके में खारिज़ नहीं करते, दुत्कारते नहीं. पिछले दिनों राजीव रंजन गिरि के सम्पादन में  मोहनदास करमचंद गाँधी पर निकली एक पुस्तक ‘पुरुषार्थ, त्याग और स्वराज’ पढ़ी, जिसमें गाँधी के समय समय पर दिए गए वक्तव्यों-भाषणों-लेखों को एकसाथ समाहित किया गया है. यह संकलन इस मायने में भी अनूठा है कि इसमें संग्रहीत लेख व भाषण कुछ कभी गुजराती में लिखे या दिए गए, कभी अंग्रेजी में. वे सभी अनुदित रूप में इस पुस्तक में समाहित किए गए है. इसमें उनके बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में दिए वक्तव्य, यंग इंडिया, सर्चलाईट, हिन्दू, हिन्दुस्तान टाइम्स एवं हरिजन में छपे अंग्रेजी लेखों, गुज़राती पत्र नवजीवन में छपे लेख, उनके जब-तब दिए गए भाषणों-वक्तव्यों को माला में पिरोने का काम किया गया है. इसके लिए सम्पादक राजीव रंजन गिरि साधुवाद के पात्र हैं. भिन्न-भिन्न अवसरों एवं विषयों पर लिखे ये लेख गाँधी एवं गांधीवाद को समझने में प्रेरक-सूत्र का काम करते हैं. इसमें पुरुषार्थ, असहयोग, अनुशासन, दृढ़ता, वीरता, चरित्र, स्वराज, स्वतंत्रता, सत्य, ईश्वर, लोकतंत्र, अहिंसा विषयक गाँधी के विचार हैं, जो हमें एक दिशा देने में सार्थक भूमिका निभाते है. गाँधी को मानने के लिए उन्हें जानना बेहद ज़रूरी है, यह पुस्तक उसका एक अच्छा एवं सफल माध्यम हो सकती है.  

गाँधी के इन दिए भाषणों एवं लिखे लेखों में कई बार उनकी ही स्वयं की बातों में विरोधाभास भी प्रकट होता है, उन्होंने स्वयं कहा कि वे प्रयोग की प्रक्रिया पर है, इसीलिए जहाँ ज़रूरी लगा, अपना मत-परिवर्तन करने से घबराए नहीं. उनका चिंतन एक जगह ठहरा हुआ नहीं, कदम-दर-कदम बढ़ता गया, इस शर्त पर कि उनके आदर्शों पर आधारित नई मानवीय सभ्यता की रचना हो सके. उन्होंने स्वयं कहा भी- “जब किसी पाठक को मेरे दो लेखों में विरोध जैसा लगे, तब अगर उसे मेरी समझदारी पर विश्वास हो, तो वह एक ही विषय पर लिखे हुए दो लेखों में से, मेरे बाद के लेख को प्रमाणभूत माने.”

  
 आलोचक राजीव रंजन गिरि ने पुस्तक को संपादित करते हुए ‘राष्ट्रपिता का प्रत्यय’  शीर्षक से भूमिका अध्याय लिखा है, जिसमें असल में गाँधी के गाँधी बनने की प्रक्रिया है, कि किन-किन पडावों को पार करते, किन दुर्गम पहाड़ों को चढ़कर गाँधी ने जीवन की गहरी सतहों का अर्जन किया था. किस प्रकार मोहनदास करमचंद ने महात्मा गाँधी बनने तक की यात्रा तय की है. भूमिका में सम्पादक ने गाँधी जीवन के दक्षिण अफ्रीका प्रवास के प्रारम्भिक संघर्षों को बताते हुए लिखा है-   “गाँधी ने संघर्ष की राह चुनी. वे सार्वजनिक जीवन की तरफ कदम-दर-कदम बढ़ने लगे. लोगों से जुड़ते गए. संस्था बनाई, संगठन बनाया. सामने आने वाली चुनौतियों को स्वीकार करते चले. एक ओर रंगभेदी निजाम की नीतियों के विरुद्ध संघर्ष था, तो दूसरी ओर इस रंगभेद के मार्फ़त विशेषाधिकार प्राप्त लोगों से, उनके दृष्टिकोण से संघर्ष. इस संघर्ष के पक्ष में लोगों को बनाए रखने के लिए गाँधी ने कई भाषण दिए, लेख लिखे. नतीज़ा यह हुआ कि दक्षिण अफ्रीका में हुए संघर्ष में, गांधीजी केन्द्रीय शख्सियत के रूप में उभरे.”

इस पुस्तक में कई लेख गाँधी के स्वर्णिम संकल्पना ‘हिन्द स्वराज’ की पूर्वपीठिका के रूप में हैं. ‘पुरुषार्थ से ही मिलेगा स्वराज’, ‘स्वराज के लिए त्याग’, ‘स्वराज के लिए आवश्यक है निर्भयता’ उसी कड़ी से जुड़ते लेख हैं. गांधीजी ने सत्ता के स्वरूप, सत्य और उसकी साधना, समकालीन जीवन में परिव्याप्त गुण-दोष, समकालीन विश्व में भारत की भूमिका और भारत का स्वधर्म, तथा राज्य और समाज के आपसी संबंधों, समाज के मर्म तथा विस्तार की गहरी मीमांसा 'हिन्द स्वराज' में प्रस्तुत की है. ‘हिन्द स्वराज’ की रचना तो मात्र दस दिन में हुई, परन्तु इसका गर्भकाल बहुत लंबा लगभग बीस वर्ष का है.  इसका प्रमाण यह भी है कि इसकी अभिव्यक्ति में एक सामाजिक दायित्वबोध,  प्रश्नाकुलता,  वैज्ञानिकता और भविष्यद्रष्टा होने के जितने परिपक्व अभिप्राय प्रकट होने थे,  हुए,  या कम से कम उनकी नींव पड़ी. गांधी देख रहे थे कि इन दिनों मानव सभ्यता एक आंतरिक क्रूरता की दिशा में बढ़ रही है और उसकी आंतरिक कोमलता की कुर्बानी देकर तथाकथित सभ्यता का ठाठ रचा जा रहा है. इसलिए गांधीजी ने यह बार-बार कहा कि ''मानव परिवार को आंतरिक कोमलता का बलिदान नहीं करना चाहिए.'' 


अपनी सोच को अमलीजामा पहनाने के लिए गाँधी ने कई प्रयोग भी किए. जो सोचा, उस पर अपने विचार ज़ाहिर किए, उस मार्ग पर स्वयं पहला कदम बढ़ाया. अपने मूल दृष्टिकोण सत्य एवं अहिंसा का पक्ष अनेक अवसरों पर स्पष्ट किया. इस पुस्तक में भी सम्पादक राजीव रंजन गिरि ने कुछ लेख इन प्रयोगों पर भी संग्रहीत किए है, जिनमें बिम्बित होता चलता है कि गाँधी जिनके लिए लड रहे थे और जिनसे संघर्ष कर रहे थे, उन्हें समझाने का भरपूर प्रयास करते कि वे एक नई सभ्यता की रचना के लिए संघर्ष कर रहे हैं. कोई उनका दुश्मन नहीं है. अपने विचार को ज़ाहिर करने के लिए ही गांधी ने हिन्द-स्वराज रचा.  जिसमें उन्होंने हिंदुस्तान की वास्तविक दशा बताई और अपने विचार की दिशा भी दिखाई. यह किताब गाँधी दर्शन का मौलिक-सूत्र है, जो गाँधी की चेतना एवं चिंतन की बुनियाद भी है और बुलंदी भी. तभी तो 20 वीं सदी के प्रसिध्द लेखक मिडल्टन मेरी को कहना पड़ा-  ''मुझे लगता है कि आधुनिक ज़माने में लिखी गई पुस्तकों में 'हिन्द स्वराज' सबसे महान पुस्तक है. मैं इसे दुनिया के आध्यात्मिक महाग्रन्थों में एक महाग्रन्थ मानता हूं.”


गाँधी आतंरिक जकडबंदियों से तो लड़ ही रहे थे, पर एक पक्ष बाह्य भी था कि भारतीय मानस औपनिवेशिक मूल्यों को आत्मसात करता जा रहा था. इससे संघर्ष करना बेहद मुश्किल उपक्रम था. उपनिवेशवादी मूल्य आधुनिक शिक्षा, आधुनिकता और इससे उत्पन्न विभिन्न विचारधारात्मक संरचनागत निर्मितियों की मार्फ़त, औपनिवेशिक हुकूमत से संघर्ष करने वाले भारतीयों की मानसिक बुनावट में जगह बना रहे थे. इसकी शिनाख्त के बाद ही आधुनिकता की समूची संकल्पना को गाँधी मानव-विरोधी समझकर इसके भौतिक आधार और सांस्कृतिक-आध्यात्मिक अधिरचना को खारिज़ करते हैं. चूँकि गाँधी भौतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र को एक-दुसरे से काटकर नहीं देखते. आधुनिकता की संकल्पना जिस मनुष्य का निर्माण करती है, उसमें स्वायत्त आध्यात्म के लिए स्थान नहीं है. गाँधी के अनुसार सम्पूर्ण मनुष्य की रचना के लिए भौतिक विकास के साथ ही आध्यात्मिक उन्नति भी आवश्यक है. गाँधी भावी खतरों को भांप गए थे. उनके डर आज साक्षात आँखों के आगे है. एक ओर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का हुजूम खड़ा है तो दूसरी ओर मैक्ड़ोनाल्ड संस्कृति मुँह बाए खड़ी है. जिनकी गिरफ़्त में आज पूरा समाज है. गाँधी भविष्यदृष्टा थे, उनके डर आज घटित हो रहे हैं, भारतीय पूँजी का निरंतर होता दोहन आज इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण है. गाँधी ने यूँही हस्तकला-शिल्प, लघु-कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने की, खादी-धारण करने की पैरवी अकारण ही नहीं की थी. वे भविष्य में आ पड़ने वाली इन चुनौतियों को देख एवं समझ रहे थे. 





गांधीजी ने सदा यह माना कि समाज राज्य से बड़ा है और राज्य समाज की सेवा के लिए है. इसी प्रकार उन्होंने यह भी माना कि समाज और मनुष्य की सेवा के लिए उद्योग हैं. उद्योग का विस्तार और उद्योगवाद में बहुत बड़ा फर्क है. उद्योगवाद का अर्थ है, किसी खास तरह के उद्योग-तंत्र को ही मानव जाति का लक्ष्य मान लेना. व्यवहार में इसका अर्थ यह होता है कि एक खास तरह की उद्यमशीलता यानी पुरुषार्थ के पक्ष में शेष सब तरह के पुरुषार्थों की यानी उद्यमशीलता की स्वतंत्र संभावनाओं को नष्ट कर देना और इस प्रकार मानव समाज के स्वत्व का अपहरण कर उसे मुट्ठी भर लोगों की अधीनता में ले आना. गांधीजी ऐसी उद्योगवादी सभ्यता को शैतानी सभ्यता और पापपूर्ण सभ्यता कहते हैं. इसी प्रकार जो राज्य समाज की सेवा का एक माध्यम न होकर स्वयं ही लक्ष्य बन जाए, वह राज्यवादी राज्य कहलाएगा और उसकी रक्षा तथा विस्तार के लिए कोशिश में जुटे लोग राष्ट्रभक्त नहीं बल्कि राज्यवादी राज्यभक्त कहलाएंगे. यह राज्यवाद भी पापपूर्ण ही है.


स्वतंत्र भारत में यूरोपीय सभ्यता नाम की कोई सीधी चीज नहीं है. यदि स्वयं गांधीजी की बात को मानें तो सभ्यता का अर्थ है श्रेष्ठ आचरण की शक्ति. लेकिन दूसरी ओर वे यह भी दिखाते हैं कि यूरोपीय सभ्यता तो अधर्म और विकृति को ही बढ़ाती है. अत: स्पष्ट है कि सभ्यता का अर्थ है आचरण की शक्ति. इसलिए स्वाधीन भारत में जो लोग आज जैसा आचरण कर रहे हैं वह समकालीन भारतीय सभ्यता की ही शक्ति या विकृति है. यह शक्ति या विकृति यूरोप से सीखी हुई हो सकती है, लेकिन सीखने वाले भारतीय ही हैं. अत: उनका दोष समकालीन भारतीय सभ्यता का ही दोष है. भारत में आज भारतीय सभ्यता के ही अच्छे और बुरे, श्रेष्ठ और निकृष्ट रूपों के बीच टकराहट है. इसीलिए इस टकराहट को पहले से भी अधिक बौद्धिक तथा संवादपूर्ण होना चाहिए. भारत के विभिन्न राजनैतिक दलों को आपस में उससे अधिक बातचीत करते दिखना चाहिए जितनी कि उन दिनों भारतीय राजनैतिक दल अंग्रेजों से करते दिखते थे. सच्चाई तो यह है कि आज के बड़े राजनैतिक दल आपसी बातचीत का केवल अवैध या छिपा हुआ रिश्ता ही रखते हैं. गाँधी के लिखे ये लेख चरित्र की शुद्धि पर विशेष महत्व देते हैं. सम्पादक राजीव रंजन गिरि की सदाशयता इस रूप में भी प्रकट होती है कि उन्होंने समय की इस आवश्यकता को समझते हुए ही गाँधी के इन विषयक लेखों का चयन किया है.



जो असहमति का रास्ता चुनता है, उसके लिए स्पेस यानी जगह कम से कमतर होती चली जाती है. राजसत्ता का दायित्व है कि वो असहमति के स्पेस को फलने-फूलने दे.  गाँधी अकेले अपनी राह पर चलते जा रहे थे, वे जानते थे कि भले ही वे अकेले हों किन्तु सही राह पर है, यही रास्ता मुक्ति का एवं स्वराज का मार्ग प्रशस्त करेगा. शायद अकेला पड़ जाना ही किसी भी गांधी की नियति है. गांधी ने नोआखली में प्रोफेसर निर्मल कुमार बोस से यह बात कही थी कि- "मैं सफल होकर मरना चाहता हूं, विफल होकर नहीं. पर हो सकता है कि विफल ही मरूं." असफल होना भी गांधी होने की नियति है. मगर गांधी के बिना न तो गांधी हुआ जा सकता है न लोकतांत्रिक. इसीलिए वो असफल आदमी आज भी हमारे अंदर ज़िंदा बचा हुआ है. यह अनायास नहीं है कि बुद्ध के बाद गाँधी को वही महत्व दिया गया. 


राजीव रंजन गिरि द्वारा संपादित इस पुस्तक के सभी लेख गाँधी की सोद्देश्यता को ही प्रकट करते हैं, गाँधी वस्तुत उस नयी सभ्यता के खिल़ाफ थे, जो आत्मवंचना पर टिकी हुई है. वे पश्चिम और विकसित के नाम पर विश्व पर छा जाने की कामना रखने वाली उस सभ्यता और जीवन-पद्धति में बुनियादी परिवर्तन लाना चाहते थे,  जो अबाध भोग,  घोर हिंसा,  आतंकवाद,  क्रूरता,  शोषण,  रंगभेद,  स्वार्थपरता आदि की भावना पर आश्रित थी. तमाम सुख-सुविधाओं की उपलब्धता के बावजूद आज मनुष्य अपने को जितना असहाय पाता है, उतना शायद ही उसने कभी अनुभव किया हो. गाँधी इससे बेखबर नहीं थे. इस दृष्टि से गाँधी के ये लेख आज के अंधकारमय समय में एक नई रोशनी देने का कार्य करते हैं.


पुस्तक- पुरुषार्थ, त्याग और स्वराज
लेखक- मो. क. गाँधी
सम्पादक- राजीव रंजन गिरि
प्रकाशन- गाँधी स्मृति एवं दर्शन समिति, नई दिल्ली
मूल्य- 50 रूपए

अनुपमा शर्मा
anupamasharma89@gmail.com








Monday, September 28, 2015

ट्रांसक्शन कम्पलीट


इस वीडियो को हिलेरियस कह लो, दहाड़ मार-मार, पेट पकड़-पकड़ हँस लो। फेसबुक पर हैजे की तरह वायरल कर दो.! क्या ही फर्क़ पड़ता है। विवाह संस्था पर ऊँगली उठाना या उसमें ऊँगली घुसाना किसी को रास नहीं आता, उन्हें ही कौन सा कोई ख़ास फर्क़ पड़ता है। लड़की वाले हों या लड़के वाले, वे अपना 'ट्रांसक्शन ऑफ रिचुअल्स' सदियों से बखूबी कर रहे हैं। पर सच तो यही है कि फूलदान पर कोहनी टिकाई हुई तस्वीरों और कुंडलियों के एक्सचेंज का ज़माना भी पीछे छूटा, डोरबेल बजते ही पहला बेहयाई से भरा हुआ सवाल तपाक से लड़की वालों पर फेंक दिया जाता है कि 'आपका बजट क्या है?' लड़की वाला भी हैसियत के हिसाब से कोई कन्धे चौडे करके तो कोई कंधे बिचका कर जवाब देता ही है। लड़के वाले साथ ही यह भी ताक़ीद कर देते हैं कि हमने आजतक अपने बेटे पर इतना पैसा इन्वेस्ट किया है और उसकी वसूली का बिल तुम्हारे नाम पर फटा है और इस लम्बी से भी ज्यादा लम्बी परम्परा उर्फ़ विधान से समझौता यह सोच कर कर लिया जाता है कि कोई बात नहीं जितना बेटी के ब्याह में लगा रहे हैं उससे ज्यादा बेटे के में कमा लेंगे। बेटियाँ उर्फ़ लाइबिलिटीस क्या है कैसी है कितनी पढ़ी है कहाँ टॉप किया है कितने गोल्ड मेडल जीते हैं - 'नोबडी गिव्स ए शिट'.... 15 मिनट में ये सोलमेट बनाने की प्रक्रिया बड़ी मानीख़ेज़ होती जा रही है। बात तो ये है कि उन 15 मिनट में भी 'व्हॉट अबाउट योर हाइमेन?' पूछना नहीं भूला जाता। यह शुचिता।!! क्या विवाह 'सेक्स' को वैधानिकता देने का एक माध्यम भर बन कर नहीं रह गया है और यह सब कुछ लेन-देन तय हो जाने के बाद में ये एक्सप्रेस ऑफ़ खुशियाँ, शादी-ब्याह के ये बेसिर-पैर के हुड़दंग और रमझोल। बाप रे..... ! 


पार्ट टू - 

Sunday, September 27, 2015

उड़ान की अकुलाहट



प्रेमचंद ने वर्षों पहले कहा था कि कोई भी समाज तब तक विकास या प्रगति नहीं कर सकता जब तक उस समाज के किसानों, दलितों एवं स्त्रियों की दशा नहीं सुधरती। उन्हें मनुष्य नहीं माना जाता, प्रेमचंद के इस कहन की जबकि हम हीरक जयंती मना चुके हैं तब भी स्थिति यह है कि हाशिए की पट्टी निरन्तर चौड़ी होती जा रही है. मुक्ति की चाह लिए हुए समाज का यह हिस्सा आज भी शोषण-अन्याय से पीड़ित है. जब पंछी धरती के गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध अपनी पहली उड़ान भरता है तब जिस ऊर्जा से वह संचालित होता है, वह होती है - मुक्ति की चाह और उड़ान की अकुलाहट. समाज के इस हिस्से की आँखों में आज भी मुक्ति का स्वप्न और उन्मुक्त आकाश में उड़ पाने की अकुलाहट बनी हुई है. आलोचक राजीव रंजन गिरी की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘अथ साहित्य पाठ और प्रसंग’ पढ़ी जिसका छठा खंड है- ‘उड़ान की अकुलाहट’ यह मुख्यतः स्त्री-दलित विमर्श पर केंद्रित खंड है। जिसमें आठ लेखों के माध्यम से पितृसत्तात्मक संरचना के बीच में गढ़ती नई स्त्री छवि का बारीक़ी से विश्लेषण करने के साथ-साथ दलित अस्मिताओं पर भी विचार किया गया है. महादेवी वर्मा, पंचतंत्र, बेबी हालदार पर आधारित आलेखों के अलावा अरूण कमल की कविता पर आधारित आलेख लेखक की स्त्री विमर्श पर गहरी पकड़ को दर्शाते हैं. 'मुक्ति-आकांक्षा की रचनाकार' लेख जिसमें महादेवी वर्मा की रचनाओं की बाबत कई अनसुलझे सवालों पर गौर किया गया है. एक लम्बे इतिहास की पैठ में महादेवी को जिस स्टीरियो में क़ैद कर दिया गया तथा "मैं नीर भरी दुःख की बदली" तक ही सीमित कर दिया गया, जबकि वे अपने विचारों में स्त्री पराधीनता को, उनके मुक्ति के स्वप्न को चरम पर रखती हैं. ऐसे में महादेवी को पढ़ने की एक नई दृष्टि प्रस्तावित करना काबिलेगौर है. महादेवी को स्त्री अधिकारों के पक्षधर के रूप में इस आलोक में देखने की कोशिश करना कि जिस समय वे 'श्रृंखला की कड़ियाँ' लिख रही थीं उस समय कालांतर में स्त्री मुक्ति का बिगुल बजाने वाली सिमोन द बोउवार महज़ बच्ची थीं, भी महादेवी के विचारों के विश्लेषण, अंतर्विरोधों एवं सीमाओं को जानने-समझने का प्रस्थान बिंदु हो सकता है. लेखक अपने इन लेखों में उन सभी पशोपेशों से गुज़रता नज़र आता है जिनसे होकर एक स्त्रीत्व गुज़रता है. 'सौंदर्य का मिथक निर्माण' लेख में स्त्री छवि से लेकर सेक्स और जेंडर की तमाम तरह की बहसें समाहित हैं जो स्त्री को कभी बायोलॉजिकल कन्स्ट्रक्ट मानती है तो कभी सोशियोलॉजिकल. ग़ौर करने पर दिखता है कि पितृसत्ता ने जेंडर को भी प्राकृतिक, स्वाभाविक गुण के रूप में प्रचारित किया है असल मायने में स्त्री विमर्श की सबसे बड़ी चुनौती स्त्री मुक्ति के लिए इसी 'जेंडर' से मुक्ति है. 


बकौल लेखक ‘‘पितृसत्तात्मक संरचना अपने को नये रूप में ढ़ालकर स्त्री-देह का वस्तुकरण कर रही है। संभव है इसके पक्ष में ऊ परी तौर पर स्त्री की मर्जी भी दिखे। पर सोचने की बात है कि इस ‘मर्जी’ को कौन सी सत्ता परिचालित कर रही है, नियंत्रित कर रही है? लिहाजा पितृसत्ता की दहलीज को खुद लॉंघने के बावजूद स्त्री-देह किसके नियंत्रण में है, कौन सी ताकत इस दिशा में ठेल रही है, यह पहलू नजरअंदाज करके स्त्री-मुक्ति का न तो यथार्थ समझा जा सकता है और न ही यूटोपिया की रचना हो सकती है’’ स्त्री मुक्ति पर ही लिखा हुआ लेख ‘स्वप्न भी एक शुरुआत है’ भी अरुण कमल की कविता ‘स्वप्न’ को आधार बनाकर कविता जगत में स्त्रीवादी दृष्टिकोण एवं स्त्री मुक्ति के विषय पर हस्तक्षेप करता एवं साथ ही ‘सेक्स’ और ‘जेंडर’ की धारणाओं के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को प्रकट करता लेख है. जहाँ पितृसत्तात्मक समाज के बीच स्त्री की जद्दोजेहद प्रकट होती है. अरुण कमल की कविता में एक स्त्री है जो बार-बार ससुराल से मार खाकर भागती है और फिर अँधेरा होने पर उसी जगह लौट आती है और फिर मार खाती है. इस लेख में मुक्ति का स्वप्न है, जिसमें स्त्री जीवन से मृत्यु की ओर नहीं अपितु मृत्यु से जीवन की ओर भाग रही है. इसकी पंक्तियाँ भी हैं- "मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न और बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न." इस कविता में स्त्री के पास कहीं कोई रास्ता नहीं है और कहीं कोई अंतिम विकल्प के रूप में आसरा भी नही. ज़ाहिर है उसे अपना रास्ता खुद बनाना होगा, विकल्पहीनता में खुद विकल्प बनकर उभरना होगा. भले ही आज वह यूटोपिया लगे पर इस उम्मीद के साथ कि कल यह हकीक़त होगा. इस लेख के अंत में वेणु गोपाल की एक कविता उदधृत है- “न हो कुछ भी/ सिर्फ सपना हो/ तो भी हो सकती है शुरुआत/ और यह एक शुरुआत ही तो है/ कि वहां एक सपना है.”


‘उड़ान की अकुलाहट’ में स्त्री विषयक एवं दलित विमर्श से जुड़े लेख हैं ‘अबकी जाना बहुरि नहीं आना’ शीर्षक अध्याय दलित और स्त्री आत्मकथाओं पर केंद्रित है जिसमें बेबी हालदार के रोज़नामचे के रूप में लिखी आत्मकथा के बहाने परिवार के भीतर पनपने वाली उपनिवेशवादी मानसिकता को बेबाक़ी से उघाड़ा गया है. 'यातना का यथार्थ और मुक्ति का स्वप्न'लेख भी दलित आत्मकथाओं पर केंद्रित लेख है. कुल मिलाकर राजीव रंजन गिरी के लिखे ये सभी स्त्री एवं दलित विषयक लेख यातना और दंश के कटु यथार्थ और इससे मुक्ति के स्वप्न को चित्रित करते हैं. ये लेख जिस उम्मीद से लिखे गए हैं वो है इन्सान को इन्सान समझे जाने की उम्मीद, शोषण से मुक्त समाज का स्वप्न लिए हुए जहाँ सभी के लिए समान रूप से उड़ान के लिए अथाह एवं उन्मुक्त आकाश हो, हाशिया बनाने के लिए जगह न हो.

2014

आज तुम बड़े याद आए
कुछ किताबों में बसी
तुम्हारी खुशबू की मानिंद....!!

2013

तमाम अनिश्चिंतताओं निराशाओं में
नफ़रत से रिसते मवाद में
जीने को अभिशप्त हो चुके हैं
पर
नाउम्मीदी के इस अंधड़ में भी
ज़िंदा रखी है उम्मीद की लौ..!

2013



चलते चलते थक चुके हैं
चुभती धूप
गर्म हवा के थपेड़े
दूर दूर तक कोई दरख़्त नहीं
छाँव का निशाँ नहीं
ज़मीन से निकलते भभके से तलवे जल रहे हैं
फिर भी चले जा रहे हैं
जाने किस मृग मरीचिका के सहारे..!

2012

उसे जीना था
इसीलिए मर गया
और मरकर भी जी गया /
मैंने चुना तिल तिल मरना
इसलिए जी रही हूँ..!